अमेरिकी धरती पर खड़े होकर ट्रंप को घेरना आसान नहीं, मगर मैक्रों, पेजेशकियन, अहमद अल-शरा और सिल्वा ने ये कर दिखाया

By नीरज कुमार दुबे | Sep 24, 2026

संयुक्त राष्ट्र महासभा के वार्षिक अधिवेशन में इस बार एक अनोखी तस्वीर देखने को मिली। अमेरिकी धरती न्यूयॉर्क पर खड़े होकर कई देशों के राष्ट्राध्यक्षों ने जिस तरह अमेरिका की नीतियों को ही आड़े हाथ लिया, उससे वैश्विक राजनीति में बढ़ती बेचैनी साफ दिखाई दी। ईरान ने सीधे अमेरिका को चुनौती दी, फ्रांस ने महाशक्तियों के तकनीकी और सामरिक वर्चस्व पर सवाल उठाए, सीरिया ने गोलान पहाड़ियों पर अमेरिकी नीति को खारिज किया, जबकि ब्राजील और तुर्किये जैसे देशों ने संप्रभुता, विदेशी हस्तक्षेप और मौजूदा वैश्विक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए। संदेश साफ है कि दुनिया की अनेक सरकारें मौजूदा अंतरराष्ट्रीय संकटों के लिए अमेरिकी नीतियों और व्यापक शक्ति आधारित राजनीति को जिम्मेदार ठहराते हुए अब ज्यादा मुखर दिखाई दे रही हैं।

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गाजा के मुद्दे पर भी मैक्रों ने पश्चिमी देशों की नीतियों को कठघरे में खड़ा किया। उन्होंने गाजा की मानवीय स्थिति को बेहद गंभीर बताते हुए मौजूदा शांति प्रयासों पर सवाल उठाया। पश्चिमी तट में बस्तियों से जुड़ी हिंसा की आलोचना करते हुए उन्होंने कहा कि पड़ोसी देशों की संप्रभुता का उल्लंघन इजराइल के भविष्य को सुरक्षित नहीं कर सकता। यूक्रेन युद्ध को लेकर उन्होंने नागरिक और ऊर्जा ढांचे पर हमले रोकने तथा काला सागर से अनाज परिवहन की सुरक्षा के लिए दोहरी अस्थायी युद्धविराम व्यवस्था का प्रस्ताव भी रखा।

लेकिन संयुक्त राष्ट्र में अमेरिका को सबसे सीधी चुनौती ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन की ओर से मिली। 23 सितंबर को पेजेशकियन ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के एक दिन पहले दिए गए कड़े बयान का जवाब देते हुए कहा कि ईरान दबाव के आगे नहीं झुकेगा। उन्होंने अमेरिका और इजराइल पर ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई का आरोप लगाते हुए ईरान को आतंकवाद का दोषी नहीं, बल्कि आतंकवाद का पीड़ित बताया।

पेजेशकियन ने ईरान के खिलाफ सैन्य और आर्थिक दबाव को लेकर कहा कि उनका देश “घुटने नहीं टेकेगा।” उन्होंने परमाणु हथियार हासिल करने की इच्छा से इंकार किया, लेकिन शांतिपूर्ण परमाणु तकनीक, विशेषकर चिकित्सा और कृषि के लिए, इन पर किसी तरह की पाबंदी स्वीकार करने से भी साफ इंकार कर दिया। होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर भी उन्होंने ईरान के नौवहन अधिकारों पर जोर दिया और अमेरिकी नाकेबंदी समाप्त करने की मांग रखी।

हालांकि ईरानी राष्ट्रपति ने युद्ध के बीच कूटनीति का दरवाजा पूरी तरह बंद नहीं किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि बातचीत संभव है, लेकिन इसके लिए अमेरिका को धमकी, बल प्रयोग और प्रतिबंधों की भाषा छोड़नी होगी। इसी बीच ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची और अमेरिकी विशेष दूत स्टीव विटकॉफ के बीच कतर की मध्यस्थता से अप्रत्यक्ष बातचीत भी हुई, लेकिन तत्काल कोई बड़ी सफलता सामने नहीं आई। ईरानी पक्ष आर्थिक और समुद्री प्रतिबंध हटाने तथा फ्रीज हुए धन से जुड़े मुद्दों पर अपनी शर्तों पर कायम रहा।

इस टकराव का सबसे नाटकीय दृश्य तब देखने को मिला जब पेजेशकियन के भाषण के दौरान अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल संयुक्त राष्ट्र महासभा कक्ष से बाहर चला गया। एक ओर मंच पर ईरान अमेरिका को चुनौती दे रहा था, दूसरी ओर पर्दे के पीछे दोनों पक्षों के बीच बातचीत भी चल रही थी। यानी युद्ध और कूटनीति एक साथ आगे बढ़ते दिखाई दिए।

वहीं सीरिया के राष्ट्रपति अहमद अल-शरा ने भी अमेरिकी नीति पर खुला प्रहार किया। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र में स्पष्ट कहा कि गोलान पहाड़ियां सीरिया की भूमि हैं और किसी भी बाहरी शक्ति को सीरियाई क्षेत्र किसी दूसरे देश को सौंपने का अधिकार नहीं है। उनका यह बयान अमेरिका द्वारा गोलान पहाड़ियों पर इजराइली संप्रभुता को मान्यता देने वाली नीति के सीधे विरोध में था। साथ ही अल-शरा ने इजराइली सैन्य कार्रवाइयों का उल्लेख करते हुए सैकड़ों हवाई हमलों, बड़ी संख्या में घुसपैठ और गिरफ्तारियों का आरोप लगाया तथा इजराइली सेना की वापसी और 1974 के अलगाव समझौते के पालन की मांग की। साथ ही उन्होंने युद्ध के बाद सीरिया के पुनर्निर्माण की तस्वीर भी पेश की। उन्होंने सरकारी संस्थाओं को स्थिर करने, हथियारों को केंद्रीय सरकार के नियंत्रण में लाने, संक्रमणकालीन न्याय लागू करने और मादक पदार्थों की तस्करी पर कार्रवाई की बात भी कही।

उधर, ब्राजील के राष्ट्रपति लुइज इनासियो लूला दा सिल्वा ने भी विदेशी हस्तक्षेप और राष्ट्रीय संप्रभुता के सवाल को प्रमुखता दी। उन्होंने कहा कि ब्राजील किसी बाहरी शक्ति का पिछलग्गू नहीं है और विदेशी हस्तक्षेप को स्वीकार नहीं किया जाएगा। वहीं तुर्किये के राष्ट्रपति रेचेप तैयप एर्दोगान ने भी संयुक्त राष्ट्र व्यवस्था और सुरक्षा परिषद की मौजूदा संरचना पर सवाल उठाए तथा गाजा के मुद्दे पर इजराइल को मिल रहे समर्थन की आलोचना की।

देखा जाये तो इस पूरे घटनाक्रम को केवल अमेरिका-विरोधी भाषणों की श्रृंखला नहीं माना जा सकता। असली मुद्दा तेजी से बदलती विश्व व्यवस्था का है। संयुक्त राष्ट्र के मंच पर अलग-अलग देशों की आवाजें यह सवाल उठा रही हैं कि क्या सैन्य ताकत, आर्थिक प्रतिबंध, तकनीकी वर्चस्व और कूटनीतिक दबाव के दम पर विश्व व्यवस्था चलाई जा सकती है।

न्यूयॉर्क में इस बार अमेरिका के सामने सवाल केवल ईरान का नहीं था। सवाल यह था कि क्या दुनिया कुछ शक्तिशाली देशों और बड़ी तकनीकी कंपनियों के निर्णयों से चलेगी या फिर संप्रभुता, अंतरराष्ट्रीय कानून और बहुपक्षीय संस्थाओं की भूमिका दोबारा मजबूत होगी। संयुक्त राष्ट्र महासभा का यह अधिवेशन इसी टकराव को बेहद तीखे ढंग से दुनिया के सामने रख रहा है।

-नीरज कुमार दुबे

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