संघ प्रमुख मोहन भागवत के शताब्दी संदेशों के सामाजिक-सांस्कृतिक मायने को समझिए

By कमलेश पांडे | Aug 30, 2025

देश दुनिया का सबसे बड़ा सामाजिक संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) अपनी स्थापना के 100 वर्ष पूरे होने के अवसर पर अगले एक वर्ष तक विभिन्न प्रबुद्ध कार्यक्रम व अभियान चलाने वाला है ताकि भारतीय सभ्यता-संस्कृति पर आधारित हिन्दू राष्ट्र के व्यापक दर्शन और उसमें अंतर्निहित महान सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक जनसरोकारों से जन-जन को  सुपरिचित कराया जा सके। इस नजरिए से नई दिल्ली के प्रतिष्ठित विज्ञान भवन सभागार में अपने कर्मठ समाजसेवी लोगों को संबोधित करते हुए संघ प्रमुख मोहन भागवत ने जो कुछ भी कहा, उन शताब्दी संदेशों के सामाजिक-सांस्कृतिक मायने को समझने-समझाने की जरूरत है ताकि भव्य व मजबूत भारत का पुनरूत्थान संभव हो सके। यही बात शेष दुनिया पर भी लागू हो सकती है। इसलिए उन पर न केवल भारत सरकार बल्कि संयुक्त राष्ट्र संघ से जुड़े सभी देशों के राष्ट्राध्यक्ष को भी गौर करना चाहिए और अपनी प्रशासनिक नीतियों में उन्हें वरीयता दी जानी चाहिए। 

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मोहन भागवत ने 'हिंदुत्व' की परिभाषा पर भी विस्तार से बात करते हुए समझाया कि, हिंदुत्व या हिंदुपन क्या है? अगर इसे संक्षेप में कहना हो तो दो शब्द हैं सत्य और प्रेम। दुनिया का संचालन एकता से होता है, सौदेबाजी और अनुबंधों से नहीं। चूंकि हिंदुस्तान का जीवन मिशन विश्व कल्याण है। उनका कहना था कि विकास की दौड़ में दुनिया ने भीतर झांकना छोड़ दिया है। अगर भीतर खोज होगी तो ऐसी अनंत खुशी मिलेगी जो कभी खत्म नहीं होगी। यही मानव जीवन का अंतिम लक्ष्य है। इससे ही पूरी दुनिया में शांति और सौहार्द का माहौल बनेगा। उन्होंने यह भी कहा कि हिंदुत्व किसी एक संप्रदाय या समुदाय की विचारधारा नहीं है, बल्कि यह वह सोच है जो सत्य और प्रेम पर आधारित होकर सबको साथ लेकर चलती है। अगर यही मार्ग अपनाया जाए तो दुनिया के संघर्ष खत्म हो जाएंगे और सच्चा सुख-शांति स्थापित होगी।

लिहाजा, सम्भव है कि भागवत के सम्पूर्ण शताब्दी उपदेश का भविष्य में कुछ सकारात्मक असर हो सकता है। पहला, भाजपा-विरोधी दलों का आरोप कमजोर हो सकता है कि हिंदू राष्ट्र सिर्फ सत्ता हथियाने का औजार है, जबकि भाजपा की प्राथमिकता राष्ट्रीय सुरक्षा और विकास है। दूसरा, भाजपा को अपनी भाषा और नीतियों में “समावेशिता” दिखानी पड़ सकती है। इससे उत्तर के साथ साथ दक्षिण में भी उसका विस्तार संभव है। तीसरा, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह संदेश भी जाएगा कि भारत का राष्ट्रवाद अधिनायकवादी नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और समावेशी है। इसमें ग्लोबल साउथ का भी हित निहित है जो कि दलित-पिछड़े देशों का समूह है।

सामाजिक विविधता और उससे संघर्ष की आशंका पर सवाल उठते हुए मोहन भागवत ने स्पष्ट कहा कि समाज में जीवन में विविधता है, लेकिन कई बार इनमें संघर्ष भी दिखाई देता है, लेकिन सबको साथ लेकर चलना है और इसके लिए सबके बीच समन्वय स्थापित करना है। इसके लिए कई बार कुछ त्याग भी करना पड़ता है जिसके लिए सदैव तैयार रहना चाहिए। उन्होंने कहा कि धर्म सदैव सार्वकालिक सुखदाई होता है। यदि कोई वस्तु दुखदाई है तो वह धर्म नहीं हो सकता। उन्होंने कहा कि मरने के बाद अलग-अलग वर्गों के लिए अलग श्मशान होने की सोच को स्वीकार नहीं किया जा सकता। सबको साथ लेकर देश को मजबूत बनाएंगे।

बढ़ते उपभोक्तावाद पर हमलावर होते हुए उन्होंने कहा कि उपभोक्तावाद की वृद्धि के कारण दुनिया में पाप, दुःख और संघर्ष बढ़ रहा है। वोक कल्चर पूरी दुनिया पर छा रहा संकट है। क्योंकि लोग अपने अलावा किसी दूसरे की ओर नहीं देख रहे हैं। इससे बचने के लिए लोगों को केवल धर्म का मार्ग अपनाना चाहिए। यह धर्म लोगों को हमेशा मध्यम मार्ग पर बनाए रखता है और इससे आपस में संघर्ष पैदा नहीं होता। उन्होंने स्वामी विवेकानंद के शब्दों में दोहराया कि, भारत के पास धर्म है जिसे उसे समय-समय पर दुनिया को देनी चाहिए। धर्म शाश्वत है। उन्होंने कहा कि धर्म मूल तत्व है जो स्वभाव होता है। इसका धर्मांतरण नहीं किया जा सकता।

आरएसएस के जनोपयोगी सोच को जन जन तक पहुंचाने की बात करते हुए मोहन भागवत ने कहा है कि आरएसएस का लक्ष्य यह है कि जो संघ में हो रहा है, वह परिवार और समाज में भी हो। इसके लिए प्रयास करना चाहिए। उन्होंने व्यंग्यात्मक लहजे में कहा कि समाचारों की दुनिया से भारत को नहीं समझा जा सकता। समाचारों में जितना गलत दिखाई देता है, उससे 40 गुना अधिक अच्छा समाज के बीच हो रहा है। इसलिए समाज को संगठित करने के लिए जातिगत भेदभाव को यथाशीघ्र समाप्त करना चाहिए। इसके लिए स्वयंसेवकों को अपने आसपास की बस्तियों तक पहुंचना चाहिए। क्योंकि जब तक समाज में आपसी अविश्वास और भेदभाव हो, उसे समाप्त किए बिना संबंध मजबूत नहीं हो सकता।

समाज के पददलितों की चिंता को स्वर देते हुए भागवत ने कहा कि समाज के कमजोर वर्गों का सहयोग एक स्वाभाविक कार्य हो जाना चाहिए। पारस्परिक दूरियों को पाटने के लिए दोनों वर्गों से काम किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि हमारा इतिहास और संस्कृति एक ही है। केवल नक्शे पर रेखाएं खिंचने से नए-नए देश बन गए हैं, लेकिन पूर्व में उनकी संस्कृति भी एक ही रही है। दूसरे देशों को जोड़ने का कार्य सबसे पहले पड़ोसी देशों से शुरू होना चाहिए। उनके साथ भी आत्मीय संबंध बनाकर उनके विकास की भी चिंता होनी चाहिए।

युवाओं को लक्षित करते हुए मोहन भागवत ने ठीक ही कहा है कि आज युवाओं की सोच निजी स्तर पर केंद्रित होती जा रही है, जिसके दुष्परिणाम दिखाई दे रहे हैं। लिहाजा इसे ठीक करना है तो इसके लिए कुटुंब प्रबोधन करना चाहिए। इसके अंतर्गत सप्ताह में एक बार एक समय पर बैठकर भोजन करना और अपनी धर्म-संस्कृति पर चर्चा करनी चाहिए। इस बैठक में यह भी चिंता करनी चाहिए कि जिस धर्म और समाज से हम हैं, उसके लिए हम क्या कर रहे हैं। उन्होंने आगे कहा कि सामाजिक समरसता के लिए परिवारों को आपस में जोड़ने की कोशिश करनी चाहिए। मरने के बाद श्मशान का भेद समाज के लिए सही नहीं है। उन्होंने कहा कि अपने घर में भोजन, भजन, वस्त्र सब कुछ अपनी परंपरा के अनुसार होना चाहिए। युवाओं का आह्वान करते हुए मोहन भागवत ने कहा कि अपनी बातों को मनवाने के लिए हिंसात्मक तरीका नहीं अपनाना चाहिए। क्योंकि इसका उपयोग करके लोग देश को तोड़ने का काम करते हैं।

- कमलेश पांडेय

वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक

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