अफ्रीकी देश माली में तीन भारतीयों के अपहरण के आतंकी व वैश्विक मायने को ऐसे समझिए

By कमलेश पांडे | Jul 05, 2025

अफ्रीकी देश माली में तीन भारतीयों के अपहरण के आतंकी मायने स्पष्ट हैं और साफ तौर पर भारत सरकार को आगाह करने वाले हैं। आखिर यह महज संयोग है या फिर कोई अभिनव प्रयोग, कि एक तरफ गत 1 जुलाई को भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पश्चिम अफ्रीका के देशों की यात्रा पर रवाना हुए, और दूसरी तरफ़ पश्चिमी अफ्रीका के ही पश्चिमी माली में गत 1 जुलाई को ही कई जगहों पर आतंकवादी हमले हुए। इन हमलों के बाद तीन भारतीय नागरिकों को बंधक भी बना लिया गया है। 

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इस अजीबोगरीब अफ्रीकी आतंकी अपहरण की घटना के मायने स्पष्ट हैं, जो इस बात का इशारा करते हैं कि भारत विरोधी अमेरिका-चीन-पाकिस्तान-ईरान की आतंकी पकड़ कितनी ज्यादा है। कारण कि उनके इशारे के बिना भारत के प्रधानमंत्री की यात्रा के ठीक पहले ऐसी दुस्साहसिक कार्रवाई करने की जुर्रत किसी आतंकी संगठन में हो ही नहीं सकती है। इसलिए भारत सरकार को सजग हो जाना चाहिए और ऐसी वारदातों के बाद त्वरित सैन्य प्रतिक्रिया देने की गुंजाइश तलाशी जानी चाहिए। अन्यथा सम्बन्धित देश के मिलीभगत से भी इंकार नहीं किया जा सकता है।

प्राप्त जानकारी के मुताबिक, यह हमला कायेस में डायमंड सीमेंट फैक्ट्री में हुआ, जहां हथियारबंद लोगों के एक समूह ने साइट में प्रवेश किया और वहां कार्यरत मजदूरों का अपहरण कर लिया। भारतीय विदेश मंत्रालय यानी एमईए के मुताबिक, पीड़ित इस फैक्ट्री के कर्मचारी थे और उन्हें जानबूझकर हिंसक घुसपैठ के दौरान निशाना बनाया गया है। एमईए ने कहा है कि "यह घटना 1 जुलाई को हुई, जब हथियारबंद हमलावरों के एक समूह ने फैक्ट्री परिसर में एक कॉर्डिनेटेड हमला किया था और तीन भारतीय नागरिकों को जबरन बंधक बना लिया।" 

हालांकि अब तक किसी आतंकी संगठन ने इस अपहरण की जिम्मेदारी नहीं ली है, लेकिन हमले के दिन ही जिस प्रकार से माली के कई हिस्सों में कॉर्डिनेटेड आतंकवादी हमले हुए, उससे संदेह की सुई सीधे अल-कायदा समर्थित संगठन जमात नुसरत अल-इस्लाम वल-मुस्लिमीन की तरफ जाती है। ऐसा इसलिए कि जेएनआईएम ने उसी दिन कई अन्य शहरों जैसे कायेस, डिबोली और सांडरे में भी हमलों की जिम्मेदारी ली थी। 

समझा जाता है कि पहलगाम आतंकी हमले के बाद शुरू किए गए ऑपरेशन सिंदूर के घातक प्रभावों के डर से आतंकियों ने इस घटना की सीधी जिम्मेदारी नहीं ली, क्योंकि इसमें ही भारतीयों का अपहरण किया गया था। यूँ तो भारत सरकार ने भी इस घटना की कड़ी निंदा की है। भारत सरकार ने माली सरकार से बंधकों की तत्काल रिहाई सुनिश्चित करने की मांग की है। बताया गया है कि भारतीय दूतावास बमाको में स्थानीय अधिकारियों और फैक्ट्री प्रबंधन के संपर्क में है। उसके द्वारा पीड़ितों के परिवारों को लगातार जानकारी दी जा रही है।

उल्लेखनीय है कि नुसरत अल-इस्लाम वल-मुस्लिमीन यानि जेएनआईएम एक कट्टर इस्लामिक संगठन है, जिसका मकसद एक कट्टर इस्लामिक शासन की नींव रखना है। ईयाद अग घाली और अमादौ कूफा इस संगठन का नेतृत्व करते हैं। बताया गया है कि ईयाद एक टुआरेग जातीय नेता है जबकि कूफा फुलानी, स्थानीय मुस्लिम समुदाय का प्रभावशाली इस्लामी उपदेशक हैं। इस प्रकार दोनों की घातक साझेदारी से पता चलता है कि जेएनआईएम सिर्फ इस्लामिक कट्टरता ही नहीं, बल्कि क्षेत्रीय और जातीय समीकरणों को भी रणनीति का हिस्सा बनाता है। 

उल्लेखनीय है कि जेएनआईएम ने खुद को अल-कायदा के आधिकारिक प्रतिनिधि के तौर पर स्थापित किया है। इससे साफ है कि यह भी उसी तरह का खुराफाती संगठन है। समझा जाता है कि जब से अमेरिका का पाकिस्तान प्रेम जगा है, तब से आतंकियों की चांदी हो गई है और वे अपना पुनः विस्तार कर रहे हैं। हालांकि, पिछले कुछ सालों में इसके कुछ बयानों में अल-कायदा का जिक्र नहीं होने से अटकलें हैं कि संगठन अपनी वैचारिक दिशा में बदलाव पर विचार कर रहा है।

जानकारों के मुताबिक, जेएनआईएम के पास इस समय तकरीबन 5-6 हजार लड़ाके हैं। इसकी संरचना काफी विकेंद्रित है, जिसकी वजह से ये अलग-अलग स्थानीय परिस्थितियों के मुताबिक खुद को ढाल लेता है। यह संगठन अलकायदा की "फ्रेंचाइज" शैली में काम करता है। जिसका अभिप्राय यह हुआ कि विभिन्न इलाकों में इसके स्थानीय कमांडर स्वतंत्र रूप से फैसले लेते हैं। 

गौरतलब है कि जेएनआईएम ना सिर्फ हथियारों से सुसज्जित संगठन है, बल्कि यह उन इलाकों में भी शासन करता है, जहां पर सरकार की पहुंच कमजोर है। यह इस्लाम के आधार पर अलग-अलग गांवों से समझौता करता है और इस्लामिक कानून को मानने वाले गांवों की सुरक्षा करता है। इसके बदले संगठन जकात (मजहबी टैक्स) वसूल करता है। वहां पर यह इस्लामी शरीया कानून भी लागू करता है, जिसमें महिलाओं की पढ़ाई पर सख्त प्रतिबंध है।

बताते चलें कि पिछले एक दशक में साहेल क्षेत्र, खास तौर पर माली, बुर्किना फासो और नाइजर कुख्यात आतंकवाद का केंद्र बन गया है। समझा जाता है कि यूरोपीय देश फ्रांस और संयुक्त राष्ट्र जैसी अंतरराष्ट्रीय संगठनों की नकारात्मक भूमिका को लेकर यहां नाराजगी है। स्थानीय सरकारों की तानाशाह रवैये ने भी स्थिति को और ज्यादा खराब ही किया है। जेएनआईएम ने लोगों के इसी गुस्से और सरकार के नकारेपन का फायदा उठाया है और अपने प्रभाव का आशातीत विस्तार किया है। 

उल्लेखनीय है कि मई 2025 में इसने बुर्किना फासो के डजीबो में हमला कर लगभग 100 लोगों की हत्या कर दी थी। इतना ही नहीं, जेएनआईएम अब पश्चिमी माली से लेकर बेनिन, नाइजर और यहां तक कि नाइजीरिया की सीमा तक एक 'जिहादी बेल्ट' बनाने में जुटा हुआ है। यह बेल्ट संगठन के नियंत्रण वाले इलाकों को जोड़ती है, जहां वह टैक्स वसूलने का साथ साथ शरीया कानून के तहत शासन करता है। 

बताया जाता है कि अफ्रीका महादेश के विभिन्न देशों में अमेरिका, रूस, इंग्लैंड, फ्रांस, जर्मनी, इटली, जापान के अतिरिक्त भारत और चीन की दिलचस्पी बढ़ रही है। इसलिए पारस्परिक प्रतिस्पर्धा में एक दूसरे को मात देने व उनकी राहों में कांटे बोने के लिए ऐसे ही आतंकी समूहों को गुप्त मदद दी जाती है। इसलिए अफ्रीकी देश माली की सरकार को तीनों अपहृत भारतीयों की बरामदगी सुनिश्चित करना चाहिए। साथ ही इस अपहरण के आतंकी मायने वैश्विक नजरिए से विश्लेषित करते हुए एहतियाती उपाय भी किया जाना चाहिए। अन्यथा विकास अवरूद्ध होगा और विनाश तेज! जो किसी के हक में नहीं होगा।

वहीं, भारत सरकार को चाहिए कि वह संयुक्त राष्ट्र संघ, जी- 7, ब्रिक्स, जी-20 आदि सभी मंचों पर विकसित देशों की मदद से आतंकी उत्पादक देशों की बढ़ती खुराफाती प्रवृति पर लगाम लगवाए, अन्यथा फैसला ऑन द स्पॉट कर देने की नसीहत दे, क्योंकि बिनु भय होहिं न प्रीति वाली कहावत सब जगह पर लागू होती है।

- कमलेश पांडेय

वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक

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