Gyan Ganga: कथा के जरिये विदुर नीति को समझिये, भाग-28

By आरएन तिवारी | Sep 27, 2024

मित्रो ! आज-कल हम लोग विदुर नीति के माध्यम से महात्मा विदुर के अनमोल वचन पढ़ रहे हैं, विदुर जी ने धृतराष्ट्र को लोक परलोक की कल्याणकारी नीतियो के बारे में बताया है। इन सभी नीतियों को पढ़कर आज के समय में भी कुशल नेतृत्व और जीवन के कुछ अन्य गुणों को निखारा जा सकता है। 

नीति धर्म का उपदेश देते हुए विदुरजी महाराज धृतराष्ट्र को समझा रहे हैं कि --- 

अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविनः ।

चत्वारि सम्प्रवर्धन्ते कीर्तिरायुर्यशोबलम् ॥ 

जो नित्य गुरुजनों को प्रणाम करता है और वृद्ध पुरुषों की सेवा में लगा रहता है, उसकी कीर्ति, आयु, यश और बल-ये चारों बढ़ते है ॥ 

अतिक्लेशेन येऽर्थाः स्युर्धर्मस्यातिक्रमेण च ।

अरेर्वा प्रणिपातेन मा स्म तेषु मनः कृथाः ॥

जो धन अत्यन्त क्लेश उठाने से, धर्म का उल्लङ्गन करने से अधवा शत्रु के सामने सिर झुकाने से प्राप्त होता हो, उसमें आप मन न लगाइये ॥ 

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अविद्यः पुरुषः शोच्यः शोच्यं मिथुनमप्रजम् ।

निराहाराः प्रजाः शोच्याः शोच्यं राष्ट्रमराजकम् ॥ 

विद्याहीन पुरुष, सन्तानोत्पत्ति रहित स्त्री प्रसंग, आहार न पाने वाली प्रजा और यदि  राजा के बिना राष्ट्र हो तो शोक करना चाहिये ॥ 

अध्वा जरा देहवतां पर्वतानां जलं जरा ।

असम्भोगो जरा स्त्रीणां वाक्षल्यं मनसो जरा ॥ 

अधिक राह चलना देहधारियों के लिये दुःखरूप बुढ़ापा है, बराबर पानी गिरना पर्वतों का बुढ़ापा है, सम्भोग से वंचित रहना स्त्रियों के लिये बुढ़ापा हैं और वचनरूपी बाणों का आघात मन के लिये बुढ़ापा है॥ 

न स्वप्नेन जयेन्निद्रां न कामेन स्त्रियं जयेत् ।

नेन्धनेन जयेदग्निं न पानेन सुरां जयेत् ॥ 

अधिक सयन करके नींद को नहीं जीता जा सकता है। काम वासना के द्वारा स्त्री को नहीं जीता जा सकता । लकड़ी डालकर आग को जीतने की आशा नहीं करनी चाहिए और अधिक मदिरा पान करके पीने की आदत नहीं छोड़ी जा सकती  ॥ 

यस्य दानजितं मित्रममित्रा युधि निर्जिताः ।

अन्नपानजिता दाराः सफलं तस्य जीवितम् ॥ 

जिसका मित्र धन-दान के द्वारा वश में आ चुका है, शत्रु युद्ध में जीत लिये गये हैं और स्त्रियाँ खान-पान के द्वारा वशीभूत हो चुकी हैं, उसका जीवन सफल है 

सहस्रिणोऽपि जीवन्ति जीवन्ति शतिनस्तथा ।

धृतराष्ट्रं विमुञ्चेच्छां न कथं चिन्न जीव्यते ॥ 

जिनके पासं हजार (रुपये) हैं, वे भी जीवित हैं तथा जिनके पास सौ (रुपये) हैं, वे भी जीवित हैं, अतः महाराज धृतराष्ट्र ! आप अधिक धन पाने  का लोभ छोड़ दीजिये।  

राजन्भूयो ब्रवीमि त्वां पुत्रेषु सममाचर ।

समता यदि ते राजन्स्वेषु पाण्डुसुतेषु च ॥ 

राजन् ! मैं, फिर कहता हूँ, यदि आपका अपने पुत्रों और पाण्डवों में समान भाव है तो उन सभी पुत्रों के साथ एक सा बर्ताव कीजिये ।॥ 

योऽभ्यर्थितः सद्भिरसज्जमानः करोत्यर्थं शक्तिमहापयित्वा।

क्षिप्रं यशस्तं समुपैति सन्तमलं प्रसन्ना हि सुखाय सन्तः ॥ १ ॥

विदुरजी कहते हैं- जो व्यक्ति सज्जन पुरुषों से आदर पाकर आसक्तिरहित हो कर अपनी शक्ति के अनुसार अर्थ-साधन करता रहता है, उस श्रेष्ठ पुरुष को शीघ्र ही सुयश की प्राप्ति होती है, क्योंकि सन्त जिस पर प्रसन्न होते हैं, वह सदा सुखी रहता है ॥ 

अनृतं च समुत्कर्षे राजगामि च पैशुनम् ।

गुरोश्चालीक निर्बन्धः समानि ब्रह्महत्यया ॥

झूठ बोलकर उन्नति करना, राजा से चुगली करना, गुरू से भी मिथ्या आग्रह करना-ये तीन कार्य ब्रह्महत्या के समान हैं ।। 

असूयैक पदं मृत्युरतिवादः श्रियो वधः ।

अशुश्रूषा त्वरा श्लाघा विद्यायाः शत्रवस्त्रयः ॥ 

गुणों में दोष देखना एकदम मृत्यु के समान है । कठोर बोलना या निन्दा करना लक्ष्मी का वध है। सुनने की इच्छा का अभाव या सेवा का अभाव, उतावलापन और आत्मप्रशंसा-ये तीन विद्या के शत्रु हैं ।। 

सुखार्थिनः कुतो विद्या नास्ति विद्यार्थिनः सुखम् ।

सुखार्थी वा त्यजेद्विद्यां विद्यार्थी वा सुखं त्यजेत् ॥ 

सुख चाहने वाले को विद्या कहाँ से मिले ? विद्या चाहने वालो के लिये सुख नहीं है। सुख की चाह हो तो विद्या को छोड़े और यदि विद्या चाहिए तो सुख का त्याग करे ।। 

नाग्निस्तृप्यति काष्ठानां नापगानां महोदधिः ।

नान्तकः सर्वभूतानां न पुंसां वामलोचना ॥ 

ईधन से आग की, नदियों से समुद्र की, समस्त प्राणियों से मृत्यु की और पुरुषों से कुलटा स्त्री की कभी तृप्ति नहीं होती ॥ 

अजोक्षा चन्दनं वीणा आदर्शो मधुसर्पिषी ।

विषमौदुम्बरं शङ्खः स्वर्णं नाभिश्च रोचना ॥ 

गृहे स्थापयितव्यानि धन्यानि मनुरब्रवीत् ।

देव ब्राह्मण पूजार्थमतिथीनां च भारत ॥ 

हे भरत श्रेष्ठ ! मनुजी ने कहा है कि देवता, ब्राह्मण तथा आतिथियों की पूजा के लिये बकरी, बैल, चन्दन, वीणा, दर्पण, मधु, घी, जल, ताँबे के बर्तन शंख सालग्राम और गोरोचन --- ये सब वस्तुएँ घर पर रखनी चाहिये ॥ 


नित्यो धर्मः सुखदुःखे त्वनित्ये नित्यो जीवो धातुरस्य त्वनित्यः।

त्यक्त्वानित्यं प्रतितिष्ठस्व नित्ये सन्तुष्य त्वं तोष परो हि लाभः ॥ 

धर्म नित्य है, किन्तु सुख-दुःख अनित्य हैं, जीव नित्य है, पर इसका कारण (अविद्या) अनित्य हैं। आप अनित्य को छोड़कर नित्य में स्थित होइये और सन्तोष धारण कीजिये; क्योंकि सन्तोष ही सबसे बड़ा लाभ है॥ 

महाबलान्पश्य मनानुभावान् प्रशास्य भूमिं धनधान्य पूर्णाम् ।

राज्यानि हित्वा विपुलांश्च भोगान् गतान्नरेन्द्रान्वशमन्तकस्य ॥

धन-धान्यादि से परिपूर्ण पृथ्वी का शासन करके अन्त में समस्त राज्य और विपुल भोगों को यहीं छोड़कर यमराज के वश में गये हुए बड़े-बड़े बलवान् एवं महानुभाव राजाओं की ओर दृष्टि डालिये और धर्म का अनुसरण कीजिए।  

शेष अगले प्रसंग में ------

श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारे हे नाथ नारायण वासुदेव ----------

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।

- आरएन तिवारी

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