By प्रभासाक्षी न्यूज़ डेस्क | Oct 04, 2026
(गुंजन शर्मा) नयी दिल्ली, चार अक्टूबर विद्यार्थियों की आत्महत्या रोकने की कोशिशों के बीच भारतीय शिक्षण संस्थान अपने यहां पंखों में भी बदलाव कर रहे हैं। कहीं स्प्रिंग लगे ‘आत्महत्या रोधी’ पंखे लगाए जा रहे हैं, तो कहीं पंखों को जाली से ढका जा रहा है और कुछ संस्थान छत की जगह दीवार वाले पंखे लगा रहे हैं। इन कदमों को भले ही ‘तात्कालिक उपाय’ कहकर आलोचना का सामना करना पड़ रहा हो, लेकिन कई विदेशी विश्वविद्यालय भी पहले ऐसे भौतिक बदलाव अपना चुके हैं।
एक महीने के भीतर विश्वविद्यालय के तीन छात्रों ने ‘ईस्ट हिल’ के पुलों से या उनके आसपास से कूदकर आत्महत्या कर ली थी। इसके बाद परिसर के आसपास की गहरी खाइयों पर बने पुलों पर स्टील की सुरक्षा जालियां लगाई गईं। बाद में विश्वविद्यालय ने आठ पुलों पर स्थायी अवरोध लगाए और कुछ खड़ी चट्टानों के किनारों पर भी बाड़ लगा दी।
हार्वर्ड विश्वविद्यालय के ‘मीन्स मैटर’ दिशानिर्देशों में भी आत्महत्या रोकने के उपायों के तहत घातक साधनों तक पहुंच सीमित करने की सिफारिश की गई है। यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन (यूसीएल) और ब्रुनेल यूनिवर्सिटी ऑफ लंदन में भी छात्रावासों की खिड़कियों पर ऐसे अवरोधक लगाने की नीति है, जिनसे खिड़कियों को एक निश्चित सीमा से अधिक खोला नहीं जा सकता। ऑक्सफोर्ड के वेडहम कॉलेज में छात्रों को खिड़कियों पर लगे इन अवरोधकों के साथ छेड़छाड़ करने की अनुमति नहीं है।
इसके अलावा, छतों, मुंडेरों और छज्जों तक पहुंच प्रतिबंधित है। बालकनी पर सुरक्षा रेलिंग भी लगाई गई हैं। मुंबई स्थित भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) के एक छात्र द्वारा 18 सितंबर को परिसर में स्थित छात्रावास के कमरे में फंदा लगाकर आत्महत्या किए जाने की घटना के बाद विरोध-प्रदर्शन शुरू हो गए।
इस घटना ने एक बार फिर छात्र आत्महत्याओं के मुद्दे को चर्चा के केंद्र में ला दिया है। चिंता संबंधी विकारों की विशेषज्ञ मनोचिकित्सक वैशाली षणमुगम ने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा कि घातक साधनों तक पहुंच सीमित करना विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की सिफारिशों का भी हिस्सा है, लेकिन इसे छात्रों को सार्थक सहयोग देने के विकल्प के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा, ‘‘परिसर के भौतिक वातावरण में बदलाव पर जरूरत से ज्यादा जोर देने का खतरा यह है कि इससे मानसिक स्वास्थ्य के बड़े संकट से ध्यान हट सकता है।
पंखे हटाने से अल्पावधि में कुछ जानें बच सकती हैं। लेकिन अगर हम वास्तव में छात्रों का साथ देना चाहते हैं तो हमें ऐसी व्यवस्थाएं बनानी होंगी, जहां उन्हें लगे कि उनकी बात सुनी और समझी जा रही है और उनकी परवाह की जा रही है। अब समय आ गया है कि हम गंभीर समस्या पर महज तात्कालिक उपाय करना बंद करें।