UP Elections: कांग्रेस से लेकर भाजपा तक, उत्तर प्रदेश में राजनीतिक दलों ने ऐसे पाई सत्ता

By अनुराग गुप्ता | Dec 24, 2021

उत्तर प्रदेश में अगले साल विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। ऐसे में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा), समाजवादी पार्टी और कांग्रेस, बहुजन समाज पार्टी समेत राजनीतिक दल मतदाताओं को लुभाने की कोशिश कर रहे हैं। इसी बीच हम आपको उत्तर प्रदेश के प्रमुख राजनीतिक दलों के बारे में विस्तृत जानकारी देंगे। आपको बता दें कि विधानसभा चुनाव में राष्ट्रीय दल के साथ-साथ प्रांतीय दल भी हिस्सा लेते हैं। ऐसे में चुनाव आयोग राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त दलों को राष्ट्रीय स्तर पर चुनाव चिन्ह और प्रांतीय दलों को प्रांत स्तर पर चुनाव चिन्ह का आवंटन करता है। 

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भारतीय जनता पार्टी

साल 1980 में जनता पार्टी के समाप्त होने के बाद स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी ने पूर्व जनसंघ के नेताओं के साथ मिलकर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का निर्माण किया था। हालांकि श्यामा प्रसाद मुखर्जी इसके जनक माने जाने हैं। क्योंकि साल 1951 में भारतीय जनसंघ से भाजपा के निर्माण की कहानी शुरू हो गई थी और फिर 1977 में आपातकाल के खत्म होने के बाद जनता पार्टी में जनसंघ का विलय हो गया। इसके बाद जब जनता पार्टी खत्म हुई तो भाजपा का उदय हुआ।

उत्तर प्रदेश में भाजपा की बात की जाए तो पार्टी मौजूदा समय में योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में सरकार में विराजमान है। 403 सीट वाली विधानसभा में भाजपा के 303 विधायक मौजूद हैं। ऐसे में भाजपा फिर से सत्ता में वापसी की पुरजोर कोशिश कर रही है। आपको बता दें कि साल 1991 में पहली बार उत्तर प्रदेश में भाजपा की सरकार बनी थी लेकिन वो 1.5 साल ही चल सकी थी। साल 1991 में पहली बार सत्ता पाने वाली भाजपा को दूसरी बार सत्ता में आने में करीब 5 साल का समय लग गया और साल 1997 में तेरहवीं विधानसभा में भाजपा सत्ता में आई और इस बार भी कल्याण सिंह की ही ताजपोशी हुई। लेकिन भाजपा को जल्दी-जल्दी अपने मुख्यमंत्री बदलने पड़े। जिसकी वजह से राम प्रकाश गुप्ता के बाद राजनाथ सिंह को भी मुख्यमंत्री बनने का मौका मिला। इसके बाद भाजपा को 15 साल का इंतजार करना पड़ा। 2017 का चुनाव पार्टी ने रिकॉर्ड मतों से जीता और फिर योगी आदित्यनाथ की ताजपोशी हुई। जिनके नाम पर पार्टी 2022 का विधानसभा चुनाव लड़ रही है।

समाजवादी पार्टी

समाजवादी पार्टी का उत्तर प्रदेश की राजनीति से सीधा संबंध है। समाजवादी पार्टी या तो सरकार में रहती है या फिर विपक्ष में लेकिन इसकी भूमिका जरूर होती है। साल 1992 में स्थापित हुई समाजवादी पार्टी के संस्थापक व संरक्षक मुलायम सिंह यादव हैं। जो उत्तर प्रदेश के तीन बार मुख्यमंत्री रह चुके हैं। फिलहाल अखिलेश यादव इस दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं जो योगी आदित्यनाथ से पहले प्रदेश के मुखिया थे। इस दल को मुसलमानों और पिछली जातियों का आशीर्वाद मिलता है। आज प्रदेश में समाजवादी पार्टी की जो भी साख है वो मुलायम सिंह और उनके भाई शिवपाल यादव ने गांव-गांव साइकिल से यात्रा कर बनाई है। जिसे ठुकराया नहीं जा सकता है। फिलहाल शिवपाल यादव प्रगतिशील समाजवादी पार्टी की सियासत करते हैं लेकिन 2022 के चुनावों में अखिलेश के साथ मिलकर भाजपा के खिलाफ लड़ने वाले हैं। दोनों के बीच लंबे समय से बातचीत चल रही थी, जो पूरी हो गई। माना जाता है कि समाजवादी पार्टी एक समाजवादी समाज बनाने में विश्वास करती है, जो समानता के सिद्धांत पर काम करता है। इसके अलावा पार्टी राममनोहर लोहिया और चौधरी चरण सिंह के आदर्शो में चलने में विश्वास रखती है। 

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बहुजन समाज पार्टी

कांशीराम ने साल 1984 में बहुजन समाज पार्टी की स्थापना की थी। जिसका लक्ष्य बहुजन हिताय और बहुजन सुखाय पर आधारित है। बसपा एक राष्ट्रीय राजनीतिक दल है लेकिन उत्तर प्रदेश के अलावा दूसरे राज्यों में इसका प्रभाव लगातार कम होते जा रहा है या यूं कहें कि बचा ही नहीं है। महज साल 2007 का विधानसभा चुनाव छोड़ दिया जाए तो पार्टी किसी भी विधानसभा चुनाव में 100 सीटों का भी आंकड़ा पार नहीं कर पाई है। साल 2002 के चुनाव में पार्टी 98 सीटों तक जरूर पहुंची थी और अगले विधानसभा चुनाव में सर्वाधिक 206 सीटें प्राप्त की थी लेकिन बसपा का करिश्मा फिर दिखाई नहीं दिया।

मौजूदा समय में बसपा की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती हैं। जिनके कंधों पर कांशीराम की विरासत को आगे बढ़ाने का जिम्मा है और वो चार बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बन चुकी हैं। हालांकि 1995, 1997 और 2002 में मायावती कार्यकाल पूरा नहीं कर पाई थीं। सवर्ण समाज का विरोध कर जन्मी बसपा ने अपने वोट बैंक में सवर्ण समाज को भी जोड़ा है। साल 2022 के विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए बसपा ने अयोध्या में सवर्ण सम्मेलन किया था। जिसकी पूरी रणनीति सतीश मिश्रा ने बनाई थी और उसे जमीन पर उतारने का काम भी किया था।

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस

कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा छत्तीसगढ़ मॉडल के आधार पर उत्तर प्रदेश में 32 साल से वनवास झेल रही कांग्रेस की सरकार बनाने की कोशिशों में जुटी हुई हैं। पिछले 50 सालों में कांग्रेस प्रदेश में 50 सीटें भी नहीं जीत पाई हैं। आखिरी बार 1989 में कांग्रेस ने 94 सीटें जीती थी। उस वक्त जनता पार्टी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी और जनता पार्टी को 208 सीटें मिली थी। उसके बाद 1991 में कांग्रेस को 46, 1996 में 33, 2002 में 25, 2007 में 22, 2012 में 28 और 2017 में 7 सीटें ही मिल सकीं।

आजाद भारत में कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश को दिया था पहला मुख्यमंत्री और आखिरी बार 1988 में एनडी तिवारी को सौंपी थी जिम्मेदारी। इसके बाद से पार्टी वनवास और अज्ञातवास में है। एक तरफ कमजोर होती पार्टी के सामने अपने नेताओं को बचाने की चुनौती है तो दूसरी तरफ महिला कार्ड के जरिए वापसी की कोशिश कर रही है।

राष्ट्रीय लोक दल

उत्तर प्रदेश में किसान नेता के तौर पर अपनी पहचान बनाने वाले चौधरी चरण सिंह की विचारधारा को मानने वालों की कमी नहीं है और हालही में पश्चिमी उत्तर प्रदेश ने दिखाया भी। कांग्रेस मंत्रिमंडल में इस्तीफा देने के बाद चौधरी चरण सिंह ने अपना मोर्चा बनाया था। फिर उसका नाम बदल दिया। इसके बाद 1977 में जनता दल में अपनी पार्टी का विलय भी कर दिया। 1980 में पार्टी टूट भी गई और नया दल भी बन गया फिर पार्टी का नाम बदला गया। इसके बाद पार्टी के भीतर चौधरी चरण सिंह के बेटे अजीत सिंह के हस्तक्षेप से विवाद खड़ा हो गया और 1987 में लोकदल के दो भाग हो गए और 1988 में लोकदल (अ) का जनता पार्टी में विलय हो गया। साल 1993 में लोकदल (अ) का कांग्रेस में विलय हो गया। मोटा मोटी तौर पर लोकदल कई बार बनी और टूटी भी। लेकिन 1998 में चौधरी अजीत सिंह ने पार्टी का नाम बदलकर राष्ट्रीय लोक दल कर दिया। जो चौधरी चरण सिंह की विचारधारा को आगे बढ़ाने का काम कर रही थी। 

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राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि प्रदेश की कुर्सी अगर किसी को हासिल करनी है तो पश्चिमी उत्तर प्रदेश में उन्हें मजबूत होना पड़ेगा या यूं कहें कि यहां के वोट की उन्हें जरूरत होगी और यहां पर चौधरी अजीत सिंह के निधन के बाद जयंत चौधरी ने मोर्चा संभाल रखा है। जिनका समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन है और उनकी किसानों के बीच में अच्छी पकड़ भी है। ऐसे में यह चुनाव काफी दिलचस्प होने वाला है।

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