By अशोक भाटिया | Sep 19, 2026
उत्तर प्रदेश के राजनीतिक इतिहास में साल 2024 का लोकसभा चुनाव एक ऐसे मोड़ के रूप में दर्ज हो चुका है, जिसने सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की अजेय मानी जाने वाली छवि को गहरा धक्का पहुँचाया। दिल्ली की सत्ता पर लगातार तीसरी बार काबिज होने के बावजूद, देश के सबसे बड़े और राजनीतिक रूप से सबसे महत्वपूर्ण राज्य उत्तर प्रदेश में पार्टी की सीटों का आंकड़ा लगभग आधा रह जाना एक ऐसी चेतावनी थी, जिसे नजरअंदाज करना आत्मघाती साबित हो सकता था। इस चुनावी झटके ने जहाँ एक ओर समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के गठबंधन को नई ऊर्जा दी, वहीं दूसरी ओर भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को आत्ममंथन और अपनी रणनीतियों को नए सिरे से परिभाषित करने पर मजबूर कर दिया। अब जबकि राज्य साल 2027 के विधानसभा चुनाव के मुहाने पर खड़ा है, भाजपा का पूरा ध्यान केवल सत्ता बचाने पर नहीं, बल्कि अपनी खोई हुई राजनीतिक जमीन को वापस पाने और 'मिशन हैट्रिक' को सफल बनाने के लिए एक व्यापक, आक्रामक और बहुआयामी 'डैमेज कंट्रोल' (क्षति नियंत्रण) अभियान पर केंद्रित हो चुका है। यह संपादकीय विश्लेषण इसी बात की पड़ताल करता है कि कैसे भाजपा अपनी पिछली गलतियों से सीखकर 2027 के महासंग्राम के लिए एक अभेद्य चक्रव्यूह रचने का प्रयास कर रही है।यदि 2027 में लखनऊ की गद्दी पर दोबारा भगवा ध्वज लहराना है, तो संगठन की बुनियादी कमियों को दूर करना और सामाजिक व सांगठनिक समीकरणों को नए सिरे से साधना पहली और अनिवार्य शर्त बन चुकी है।
सांगठनिक कसावट के साथ-साथ भाजपा का यह डैमेज कंट्रोल केवल पार्टी कैडर तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सहयोगियों और प्रमुख चेहरों को जोड़े रखने के लिए एक आक्रामक राजनीतिक घेराबंदी में बदल चुका है। इसी कड़ी में हाल ही में दो बेहद महत्वपूर्ण राजनीतिक घटनाक्रम सामने आए हैं, जो भाजपा की इस गंभीर रणनीति को स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं। पहला घटनाक्रम रायबरेली सदर से भाजपा विधायक अदिति सिंह का है। पिछले कुछ समय से राजनीतिक गलियारों में अदिति सिंह की कांग्रेस में संभावित वापसी को लेकर तरह-तरह की अटकलें और कयास लगाए जा रही थे। इन अटकलों को पूरी तरह खारिज करते हुए और विपक्ष के मनोबल को तोड़ने के लिए अदिति सिंह ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से एक उच्च स्तरीय मुलाकात की। इस बैठक ने न केवल सभी अफवाहों पर पूरी तरह विराम लगा दिया, बल्कि यह भी साफ कर दिया कि रायबरेली जैसे गांधी परिवार के पारंपरिक गढ़ में भाजपा अपने किले को अभेद्य रखने के लिए पूरी तरह मुस्तैद है।