By दिव्यांशी भदौरिया | Sep 22, 2026
हिंदू धर्म में वामन जयंती का विशेष महत्व माना जाता है। वामन जयंती भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को मनाई जाएगी। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस तिथि पर श्रवण नक्षत्र के अभिजीत मुहूर्त में भगवान विष्णु ने वामन अवतार लिया था।
वामन जयंती 2026 कब है?
हिंदू पंचांग के अनुसार, भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि का आरंभ 22 सितंबर, मंगलवार के दिन रात में 9 बजकर 44 मिनट पर होगा। वहीं, अगले दिन यानी 23 सितंबर, बुधवार को रात 10 बजकर 51 मिनट पर द्वादशी तिथि समाप्त होगी। उदया तिथि के अनुसार, वामन जयंती का व्रत 23 सितंबर को रखा जाएगा।
वामन जयंती पूजा विधि
- व्रत रखने वाले इस दिन सुबह जल्दी उठकर स्नानादि करने के बाद ही साफ वस्त्र धारण करें।
- इसके बाद नित्यकर्म करने के बाद पूजा घर में एक लड़की की चौकी पर लाल या पीले रंग का साफ वस्त्र बिछाएं।
- इसके बाद चौकी पर भगवान श्रीवामन की प्रतिमा स्थापित करें। अब चारों ओर गंगाजल का छिड़काव करें।
- भगवान वामन का पंचोपचार विधि और षोडशोपचार से पूजन करें। अब 52 पेड़े और 52 दक्षिणा अर्पित करके पूजा करें।
- भोग लगाने के बाद ब्राह्मण को दही-चावल, चीनी और दक्षिणा दान करके व्रत का पारण करें।
श्रीहरि के वामन अवतार की कथा
एक समय की बात है जब असुरराज दैत्य बलि ने देवलोक को हड़प लिया था। तब भगवान विष्णु ने इंद्र को देवलोक में दोबारा अधिकार दिलवाने के लिए यह अवतार लिया था। बलि विरोचन के पुत्र और प्रह्लाद के पौत्र थे। जिन्हें दयालु असुर राजा के रूप में जाना जाता था। ऐसी भी कहते हैं कि अपनी तपस्या और ताकत से बलि ने त्रिलोक पर आधिपत्य प्राप्त किया था। श्रीहरि वामन अवतार, एक बौने ब्राह्मण के वेश में बलि के पास पहुंचे। वहां बलि से भगवान वामन ने अपने रहने के लिए तीन कदम बराबर भूमि मांगी। उनके हाथ में एक लकड़ी का छाता था। गुरु शुक्राचार्य के चेताने के बाद भी बलि ने श्रीवामन को यह वचन दे दिया।
ऐसा कहते ही श्रीवामन ने अपना आकार इतना अधिक बढ़ा लिया कि पहले ही कदम में पूरा भूलोक नाप लिया। फिर, दूसरे कदम में देवलोक नापा। इसके बाद, ब्रह्मा ने अपने कमंडल के जल से भगवान वामन के पांव धोए थे और इसी जल से गंगा उत्पन्न हुई थीं। इसके बाद, तीसरे कदम आगे बढ़ाने के लिए कोई भूमि नहीं बची। ऐसी स्थिति में बलि ने अपना वचन पूर्ण करने के लिए वामन देव को तीसरा कदम आगे बढ़ाने के लिए अपना सिर आगे प्रस्तुत कर दिया। बलि की इस वचनबद्धता को देखकर श्रीवामन अत्यंत प्रसन्न हुए। चूंकि बलि के दादा प्रह्लाद विष्णुजी के परम भक्त थे। ऐसे में वामन देव ने बलि को पाताल लोक देने का निश्चय किया। फिर, अपना तीसरा कदम बलि के सिर में रखा। इसके फलस्वरूप बलि पाताल लोक पहुंच गए।
मान्यता है कि बलि के सिर पर अपना पैर रखकर श्रीवामन ने उन्हें अमरत्व प्रदान किया था। साथ ही, राजा को महाबलि की उपाधि भी दी क्योंकि, उन्होंने अपनी धर्मपरायणता और वचनबद्धता के चलते अपने आपको महात्मा साबित किया था। श्रीहरि ने बलि को आध्यात्मिक आकाश जाने की अनुमति दी जहां उनका अपने सद्गुणी दादा प्रहलाद और अन्य दैवीय आत्माओं से मिलना हुआ था।
व्रत रखने वाले साधक को इस कथा का पाठ अवश्य करना चाहिए।