INDIA गठबंधन में आई दरार, Vande Mataram पर विवाद खड़ कर रही Congress को अब्दुल्ला पिता-पुत्र ने दिखाया आईना

By नीरज कुमार दुबे | Sep 10, 2026

जम्मू-कश्मीर में आयोजित इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल के उद्घाटन समारोह में वंदे मातरम् के पूरे छह अंतरों के गायन ने जिस तरह कांग्रेस और उसकी सहयोगी नेशनल कॉन्फ्रेंस के बीच राजनीतिक खींचतान पैदा की है, उसने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या आजादी की लड़ाई के प्रतीकों को भी दलगत राजनीति के चश्मे से देखा जाएगा? हम आपको बता दें कि मामला तब गरम हुआ, जब समारोह में वंदे मातरम् का पूर्ण संस्करण गाया गया। इसके बाद कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल ने नेशनल कॉन्फ्रेंस से अपने फैसले पर विचार करने की अपील करते हुए कहा कि विपक्षी INDIA ब्लॉक को वंदे मातरम् की केवल पहले दो अंतरों तक सीमित रहना चाहिए। कांग्रेस का तर्क है कि गीत के बाद के अंतरों में हिंदू धार्मिक प्रतीकों का उल्लेख है और इसका पूर्ण संस्करण भारत के “समन्वयवादी और बहुलतावादी” चरित्र के अनुकूल नहीं है। यहीं से कांग्रेस से कुछ कड़े सवाल बनते हैं।

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सवाल उठता है कि अगर पार्टी की मौजूदा नीति केवल पहले दो अंतरों की है, तो कांग्रेस शासित राज्यों के संवैधानिक पदों पर बैठे नेता पूर्ण वंदे मातरम् के दौरान क्यों खड़े रहे? क्या कर्नाटक और तेलंगाना में राष्ट्रगीत के लिए अलग राजनीतिक व्याकरण है और जम्मू-कश्मीर में अलग? क्या राष्ट्रीय प्रतीक का सम्मान राज्य की सीमा और राजनीतिक परिस्थिति देखकर तय होगा? मामला यहीं खत्म नहीं होता। 15 अगस्त को कांग्रेस मुख्यालय में भी वंदे मातरम् का पूर्ण संस्करण गाया गया, जहां सोनिया गांधी, राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे सहित कांग्रेस के शीर्ष नेता मौजूद थे। यही नहीं, मई 2026 में केरल के मुख्यमंत्री वीडी सतीशन के शपथ ग्रहण समारोह में भी पूर्ण वंदे मातरम् बजाया गया था, जिसमें कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, राहुल गांधी, प्रियंका गांधी, कर्नाटक के सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार तथा तेलंगाना के रेवंत रेड्डी समेत कई कांग्रेस नेता मौजूद थे।

सवाल उठता है कि ऐसे में जम्मू-कश्मीर में नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेताओं के सामने यही गीत गाया गया तो अचानक यह “सांप्रदायिकता” का सवाल कैसे बन गया? राजनीति में सुविधा के हिसाब से राष्ट्रगीत की स्वीकार्यता तय नहीं हो सकती। कांग्रेस का यह कहना कि स्वतंत्रता सेनानियों के “विवेकपूर्ण निर्णय” का सम्मान होना चाहिए, अपने आप में सही बात है। लेकिन क्या स्वतंत्रता सेनानियों की विरासत को केवल राजनीतिक सुविधा के अनुसार चुनकर प्रस्तुत किया जा सकता है?

इस पूरे घटनाक्रम का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि कांग्रेस और नेशनल कॉन्फ्रेंस दोनों INDIA गठबंधन का हिस्सा हैं, फिर भी एक राष्ट्रगीत के सवाल पर दोनों की राह अलग दिखाई दे रही है। जम्मू-कश्मीर में जहां नेशनल कॉन्फ्रेंस इसे राष्ट्रीय भावना के संदर्भ में देख रही है, वहीं कांग्रेस उसके पूर्ण संस्करण को लेकर असहज है। यह विरोधाभास विपक्षी गठबंधन की वैचारिक एकता पर भी सवाल खड़ा करता है।

सवाल उठता है कि क्या INDIA ब्लॉक में राष्ट्रगीत के सम्मान की भी कोई साझा नीति नहीं है? क्या गठबंधन के सहयोगी दल इस बात पर भी सहमत नहीं हो सकते कि देश के स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े प्रतीकों का सम्मान दलगत सीमाओं से ऊपर होना चाहिए? और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अगर देश के करोड़ों लोग वंदे मातरम् के पूरे संस्करण को सम्मान के साथ सुनना चाहते हैं, तो राजनीतिक दल उन्हें यह बताने वाले कौन होते हैं कि उन्हें राष्ट्रगीत का कौन-सा हिस्सा गाना चाहिए?

वंदे मातरम् को लेकर राजनीतिक मतभेद हो सकते हैं, ऐतिहासिक विमर्श हो सकता है और संवैधानिक बहस भी हो सकती है। लेकिन किसी राष्ट्रप्रतीक को लेकर सवाल उठाते समय राजनीतिक दलों को अपने ही अतीत और अपने नेताओं के आचरण का भी हिसाब देना होगा। कांग्रेस को यह स्पष्ट करना चाहिए कि उसका विरोध सैद्धांतिक है या राजनीतिक? क्योंकि यदि पूर्ण वंदे मातरम् गलत है, तो उसके गायन में शामिल रहे अपने नेताओं से भी वही सवाल पूछना होगा। और अगर वह स्वीकार्य है, तो फिर जम्मू-कश्मीर में इसके पूर्ण गायन पर आपत्ति क्यों?

बहरहाल, राष्ट्रगीत किसी एक पार्टी की संपत्ति नहीं है। वंदे मातरम् पर राजनीति करने से पहले राजनीतिक दलों को यह समझना होगा कि राष्ट्रभावना को वोट-बैंक की सीमाओं में बांधने की कोशिश अंततः उसी राजनीति पर भारी पड़ सकती है।

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