वरुथिनी एकादशी व्रत करने से भगवान विष्णु भक्तों के सभी संकटों को करते हैं दूर

By प्रज्ञा पाण्डेय | Apr 25, 2022

वरुथिनी एकादशी का हिन्दू धर्म में खास महत्व है। वरुथिनी एकादशी पवित्र बैसाख महीने में आती है। तो आइए भक्त को सभी दुखों से मुक्ति दिलाने वाली वरुथिनी एकादशी व्रत की पूजा-विधि और महत्व के बारे में बताते हैं।

हिन्दू धर्म में प्रचलित वरुथिनी एकादशी श्री हरिविष्णु को समर्पित है। ऐसी मान्यता है कि एकादशी का व्रत करने से कई वर्षों के तप और कन्या दान करने के समान पुण्यफल की प्राप्ति होती है। हिन्दू शास्त्रों के अनुसार यह व्रत रखने से मनुष्य के सभी दुख दूर हो जाते हैं और सुखों की प्राप्ति होती है। इस साल वरुथिनी एकादशी 26 अप्रैल को पड़ रही है। दरिद्रता, दुख और दुर्भाग्य दूर करने हेतु एकादशी तिथि पर आप भी इस व्रत कथा का श्रवण कर सकते हैं।

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वरुथिनी एकादशी है विशेष

वरुथिनी एकादशी व्रत से प्राप्त होने वाला फल विशेष होता है। यह फल सूर्य ग्रहण के दौरान किए गए दान के समान होता है। इस व्रत के प्रभाव से सभी दुखी प्राणियों को सुख मिलता है तथा राजा को स्वर्ग प्राप्त होता है। वरुथिनी एकादशी में वरुथिनी शब्द संस्कृत भाषा के वरूथिन से बना हुआ है जिसका अर्थ होता है प्रतिरक्षक या कवच। पंडितों की मान्यता है कि वरुथिनी एकादशी व्रत करने से विष्णु भगवान भक्तों की सभी प्रकार के संकट से रक्षा करते हैं।

वरुथिनी एकादशी से जुड़ी कथा

प्राचीन काल में वरुथिनी एकादशी से जुड़े एक कथा प्रचलित है। इस कथा के अनुसार नर्मदा नदी के किनारे मांधाता नाम के राजा राज्य करते थे। राजा मांधाता बहुत दानी और तपस्वी स्वभाव के थे। एक बार वह राजा जंगल में तपस्या कर रहे थे। उसी समय एक भालू आया और वह राजा के पैर खाने लगा। लेकिन राजा तपस्या में लीन थे इसलिए उन्होंने भालू को कुछ नहीं कहा और विष्णु भगवान को याद करने लगे। इस प्रकार विष्णु भगवान प्रकट हुए और उन्होंने राजा को भालू से बचा लिया। लेकिन जब तक विष्णु भगवान ने राजा को बचाया तब तक भालू ने राजा के पैरो को बहुत जख्मी कर दिया था। राजा मांधता के पैरों को बहुत नुकसान हो गया। तब विष्णु भगवान ने राजा को वृंदावन जाकर वरुथिनी एकादशी करने के कहा। वरुथिनी एकादशी व्रत के प्रभाव से राजा के पैर पहले की तरह ठीक हो गए। 

वरुथिनी एकादशी का महत्व 

हिन्दू धर्म में वरुथिनी एकादशी का खास महत्व होता है। इस एकादशी को सौभाग्य और पुण्य प्रदान करने वाला कहा गया है। इस व्रत को करने से सारे पाप और कष्ट मुक्त हो जाते हैं। ऐसी मान्यता है कि वरुथिनी एकादशी व्रत का प्रभाव कन्या दान से मिलने वाले फल के समान होता है। 

वरुथिनी एकादशी व्रत में सावधानी भी है जरूरी

हिन्दू धर्म में वरुथिनी एकादशी व्रत का विशेष महत्व होता है। इसलिए वरुथिनी एकादशी व्रत में सावधानी बरतें। इस दिन व्रती कई प्रकार के नियमों का पालन करना चाहिए। इसमें व्यक्ति सत्य बोलें और झूठ से बचें। एकादशी के दिन क्रोध न करें और ब्रह्मचर्य का पालन करें। साथ ही कांसे के बर्तन में फलाहार न करें। व्रत के दिन जुआ नहीं खेलना चाहिए। इसके अलावा एकादशी के दिन पान नहीं खाएं और दातुन का प्रयोग न करें। जो भक्त एकादशी का व्रत नहीं करते हैं उऩ्हें एकादशी के दिन चावल नहीं खाने चाहिए।

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ऐसे करें पूजा, होगा लाभ

वरूथिनी एकादशी की पूजा बहुत विशेष होती है। इस दिन भगवान मधुसूदन और विष्णु के वराह अवतार की पूजा होती है। एकादशी व्रत में उपवास तो एकादशी के दिन रखा जाता है लेकिन दशमी की रात से ही सावधानीपूर्वक व्रती को भोजन त्याग देना चाहिए। साथ ही दशमी के दिन से ही व्रत के नियमों का पालन प्रारम्भ कर देना चाहिए। इसके लिए दशमी के दिन मसूर की दाल और बैंगन का सेवन नहीं करना चाहिए। इसके अलावा दशमी के दिन केवल एक बार ही भोजन ग्रहण करें। दशमी के दिन भोजन हमेशा सात्विक करें।

वरुथिनी एकादशी के दिन सुबह जल्‍दी उठें। प्रातः नित्य कर्म से निवृत हो कर घर की साफ-सफाई करें और स्नान कर साफ कपड़े पहनें। उसके बाद व्रत करने का संकल्प करें। घर के मंदिर की साफ-सफाई करें। उसके बाद विष्णु भगवान के वराह अवतार की पूजा करें। पूजा के दौरान वरुथिनी एकादशी व्रत की कथा पढ़े और प्रसाद चढ़ाकर भगवान से प्रार्थना करें। एकादशी की रात में सोएं नहीं बल्कि रात्रि जागरण में कीर्तन करें। पंडितों का मानना है कि द्वादशी के दिन ब्राह्मण को भोजन करा कर दान दें। उसके बाद पारण करें।

- प्रज्ञा पाण्डेय 

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