By संतोष उत्सुक | Jul 09, 2025
पानी कम उपलब्ध हो तो लड़वाता है। बर्तन टकराते हैं, राजनीति होने लगती है। पानी जब बाढ़ हो जाता है तो मुसीबत बन जाता है। बर्तन बहा ले जाता है, नए लोग राजनीति में प्रवेश करते हैं। सोए हुए लोग राजनीति करने लगते हैं। हर कहीं सतर्कता बढ़ जाती है। आनन फानन में बैठकें होती हैं। बैठक की अध्यक्षता किसी और को करनी चाहिए, किसी और को अध्यक्ष बनना पड़ता है। इसी चक्कर में टीवी और अखबार कवरेज ढंग से नहीं हो पाती है।
पहाड़ खुद तो किसी को सतर्क कर नहीं सकते इसलिए जहां भूस्खलन और भूधसाव का अंदेशा जताया जाता है वहां आनेजाने वाले यात्रियों को सावधान करते हुए सतर्क किया जाता है। जहां सडकों और गलियों की बरसाती मरम्मत का काम चल रहा होता है वहां भी सतर्क रहने को कहा जाता है। हर कहीं कूड़ा कचरा फेंकने वालों को भी सतर्क रहने को कहा जाता है। कूड़ा फेंकने वाले, सतर्क रहते हुए बारिश में ही फेंकते रहते हैं ताकि कूड़ा कचरा स्वत बह जाए। परेशान मौसम विज्ञान केंद्र भी बेहद सतर्क होते हुए विशेष एहतियात और सतर्कता बरतने को कहता है। विद्युत विभाग वाले भी अग्रिम सतर्क हो जाते हैं ताकि बिजली चले जाने का दोष अकारण बारिश को दे दिया जाए। सोशल मिडिया के उस्तादों द्वारा बहाई बाढ़ की झूठी ख़बरों और वीडियो से भी सतर्क रहने को कहा जाता है।
सतर्कता का अर्थ यह लिया जा सकता है कि सभी बारिश सम्बंधित विभाग अपने अपने सुतर्कों के साथ मुस्तैद रहें। ज़रूरत पड़ते ही यानी कहीं भी दुर्घटना किस्म का कुछ भी हो जाए तो बढ़िया, प्रसिद्ध और स्थापित तर्कों के साथ उचित जवाब देकर, प्रेस नोट जारी कर, अपना बचाव सुनिश्चित कर लें। स्पष्ट कह दिया जाए कि जो बंदा मर गया, धंस गया, गिर गया या बह गया वह उसकी अपनी गलती थी । कुदरत द्वारा बर्बाद किए गए मौसम में, मानसिक और शारीरिक रूप से सतर्क रहना उसकी निजी ज़िम्मेदारी थी।
विभागों की जिम्मेदारी, खुद को सतर्क रखते हुए दूसरों को सतर्क रहने के लिए कहना मात्र है। सब जानते, मानते और समझते हैं कि बारिश और बाढ़ कुदरती आपदा है। इस सन्दर्भ में बेचारा इंसान ज्यादा कुछ कर नहीं सकता। अब मंत्री, ठेकेदार और अफसर सब तो बन नहीं सकते। जन्म लेने के लिए उचित समय, भाग्य, नक्षत्र, जुगाड़, मेहनत और माहौल का मिलाजुला योगदान होता है। सतर्कता का सन्देश देने वालों का सुरक्षित रहना भी ज़रूरी है अगर उन्हें कुछ हो गया, बाढ़ ने बुला लिया तो कौन उन्हें सतर्क करेगा। जिस तरह सतर्क रहना आसान नहीं है उसी तरह सतर्क करना भी बड़ी भारी ज़िम्मेदारी का काम है। ज़िम्मेदारी से काम करना आसान काम नहीं है।
- संतोष उत्सुक