By रेनू तिवारी | Aug 06, 2026
भारत में जाति-आधारित आरक्षण को लेकर राजनीति और समाज में एक बार फिर तीखी बहस छिड़ गई है। देश में ऑनलाइन अभियानों से लेकर ज़मीनी स्तर तक आरक्षण-विरोधी आवाज़ें तेज़ी से संगठित और मुखर हो रही हैं। नीट (NEET) पेपर लीक पर टीवी डिबेट में जाति-आधारित व्यवस्था के खिलाफ बोलने वाले युवा हर्ष दुबे के सोशल मीडिया पर हज़ारों फॉलोअर्स बन चुके हैं और वे अब नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की अनुमति का इंतज़ार कर रहे हैं। यह घटना अकेली नहीं है, पिछले कुछ हफ्तों में घटीं कई घटनाओं से साफ संकेत मिलता है कि आरक्षण व्यवस्था के खिलाफ एक व्यापक और जन-असंतोष की भावना उभर रही है।
कुछ दिनों बाद, जयपुर में राजपूतों के समूह 'श्री राजपूत करणी सेना' के सदस्यों का आंदोलन तनावपूर्ण हो गया। वे सड़कों पर उतर आए और UGC के जाति समानता नियमों (जिन पर अब रोक लगा दी गई है) को लेकर पुलिस से भिड़ गए। इस दौरान एक व्यक्ति की मौत का आरोप है। करणी सेना के नेताओं ने अपने पूजनीय देवताओं की कसम खाई है कि वे स्थानीय निकाय चुनावों में BJP को वोट नहीं देंगे।
इन सभी घटनाओं से पता चलता है कि आरक्षण-विरोधी आवाज़ें तेज़ हो रही हैं और ऑनलाइन व ऑफ़लाइन दोनों जगह समर्थकों को आकर्षित कर रही हैं। लेकिन यह आंदोलन बिखरा हुआ लगता है।
हर्ष दुबे जंतर-मंतर में प्रवेश करने और नेतृत्व करने का इंतज़ार कर रहे हैं। RHA इंटरनेट पर आरक्षण-विरोधी आवाज़ों को एकजुट कर रहा है। श्री राजपूत करणी सेना जयपुर की सड़कों पर अपनी लड़ाई लड़ रही है।
लेकिन यह साफ़ है कि आरक्षण-विरोधी भावना पहले से कहीं ज़्यादा मज़बूत हो रही है। इसमें शिक्षाविद-लेखक आनंद रंगनाथन, पत्रकार-क्रिएटर अजीत भारती और लेखक-निर्देशक अनुराधा तिवारी जैसी प्रमुख हस्तियां शामिल हो रही हैं। ये सभी वेदांत नाम के एक छात्र द्वारा कुछ हफ़्ते पहले शुरू किए गए RHA प्लेटफ़ॉर्म से जुड़ रहे हैं। इन लोगों ने मांगों की एक सूची भी जारी की है।
हमेशा की तरह, राजनेता आरक्षण पर तेज़ी से गरमाती बहस से दूर रह रहे हैं। लेकिन ज़मीनी स्तर पर, सिर्फ़ श्री राजपूत करणी सेना और हर्ष दुबे ही ऐसे लोग नहीं हैं जो शिक्षा, नौकरियों और दूसरे क्षेत्रों में जाति-आधारित आरक्षण के ख़िलाफ़ लोगों को एकजुट करने की कोशिश कर रहे हैं।
इन्फ्लुएंसर, कमेंटेटर और जाने-माने बुद्धिजीवी आरक्षण के मुद्दे पर बंटे हुए हैं। कुछ लोग मौजूदा व्यवस्था को बनाए रखना चाहते हैं, कुछ इसे पूरी तरह खत्म करना चाहते हैं, जबकि कुछ लोग इसे तभी समर्थन देते हैं जब इसके लिए योग्यता के कड़े नियम हों।
ऑनलाइन और ऑफलाइन, आरक्षण-विरोधी आवाज़ें लगातार तेज़ हो रही हैं। इस तेज़ी से भारत की सबसे ज़्यादा राजनीतिक रूप से संवेदनशील और समाज को बांटने वाली बहस—जाति-आधारित आरक्षण—के और फैलने का खतरा है। यह समय बहुत नाजुक है और इससे कई पक्ष प्रभावित हो सकते हैं।
आरक्षण-विरोधी यह तेज़ी CJP के नेतृत्व में हफ़्तों तक चले विरोध-प्रदर्शनों के कुछ हफ़्ते बाद आई है, जिसके कारण शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफ़ा देना पड़ा था। साथ ही, UGC के इक्विटी नियमों को लेकर पूरे देश में अशांति देखी गई थी। "ऊंची जातियों" का कहना था कि ये नियम "अनुचित, अन्यायपूर्ण और मेरिट को कमज़ोर करने वाले" हैं और इनसे "सवर्ण वर्ग को गलत तरीके से निशाना बनाकर सामाजिक विभाजन और गहरा होगा"। फरवरी में "ऊंची जातियों" ने इन नियमों को "काला कानून" कहा था।
इन घटनाक्रमों से केंद्र और राज्यों की सरकारों और सत्ताधारी पार्टियों के लिए भी मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं।
आगे चुनावों का व्यस्त कार्यक्रम है। 2027 की शुरुआत में उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर में विधानसभा चुनाव होने हैं, और उसके बाद हिमाचल प्रदेश और गुजरात में चुनाव होंगे। इनमें से कई राज्यों में—खासकर उत्तर प्रदेश में, जो भारत का सबसे बड़ा और राजनीतिक रूप से सबसे अहम राज्य है और जिसके बारे में कहा जाता है कि दिल्ली का रास्ता यहीं से होकर गुज़रता है—जाति ही चुनाव का सबसे निर्णायक कारक बनी हुई है।
चुनावी नज़रिए से भी यह अहम है क्योंकि उत्तर प्रदेश के पिछले चुनाव में, जब समाजवादी पार्टी-कांग्रेस गठबंधन ने BJP से बेहतर प्रदर्शन किया था, तो राहुल गांधी का "जितनी आबादी, उतना हक" (आबादी के अनुपात में अधिकार) का नारा और अखिलेश यादव का पिछड़ा, दलित, आदिवासी (PDA) सामाजिक गठबंधन बनाने का प्रयास चुनाव प्रचार में अहम भूमिका निभा रहे थे। नतीजों में भी इसकी झलक दिखी थी।
चुनावी समीकरणों पर पड़ेगा सीधा असर
आगामी वर्षों में कई राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं। वर्ष 2027 की शुरुआत में उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर में चुनाव प्रस्तावित हैं, जिसके बाद गुजरात और हिमाचल प्रदेश में भी मतदान होगा।
विशेष रूप से उत्तर प्रदेश जैसे सबसे बड़े और राजनीतिक रूप से संवेदनशील राज्य में जाति ही मुख्य चुनावी कारक रही है। पिछले चुनावों में राहुल गांधी के "जितनी आबादी, उतना हक" और अखिलेश यादव के "पीडीए" (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) गठबंधन के जवाब में, अब सवर्णों का संगठित असंतोष केंद्र और राज्य सरकारों के सामने एक नई राजनीतिक और चुनावी चुनौती खड़ी कर सकता है।