आवाज़ें और कान (व्यंग्य)

By संतोष उत्सुक | May 06, 2023

विदेशी सर्वे और अध्ययन अक्सर मुझे परेशान करते रहते हैं। समझ नहीं आता उनके विषय किस तरह चुने जाते हैं। कुछ भी हो उनका विषय अनूठा होता है, ऐसा विषय चुनने बारे हम तो सोचना भी नहीं चाहते। उनके कई अध्ययन खूब दिलचस्पी भी जगाते हैं हालांकि वे ऐसा कोई सर्वे नहीं करते कि उनका देश दुनिया में विश्वगुरु कहलाए या विश्वगुरुओं का देश कहलाने की राह पर अग्रसर हो। जब उनके पास पैसा है, समय है और सर्वे में दिलचस्पी लेने वाले नागरिक हैं तो उन्हें ऐसा कुछ करना चाहिए कि दुनिया उन्हें देखती रह जाए।

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लगता है उन्होंने यह अध्ययन शायद हैरी पॉटर की फिल्मों से प्रेरित होकर किया होगा जिसमें पौधे चीखते चिल्लाते हैं। कहते हैं पौधों की आवाज़ निकालने की फ्रीक्वेंसी इंसानों की सुनने की शक्ति से ज्यादा होती है। यह बात बिलकुल सही जांची उन्होंने। उन्होंने बताया कि हर पौधे की आवाज़ अलग होती है। जब वे प्यासे होते हैं और चोट खाते हैं तो आवाजें निकालते हैं। अचरज यह है कि पौधों की आवाजें पॉप कॉर्न के फूटने जैसी होती हैं। हमारे यहां पौधे अगर ऐसी आवाजें निकालेंगे तो समझा जाएगा कि कोई बच्चा शरारत कर रहा है या अमुक पौधा खाद की जगह पॉप कॉर्न मांग रहा है। हम ऐसी आवाज़ें सुनने या जांचने के प्रयोग, इंसानों पर नहीं कर सकते। हमें इतनी फुर्सत कहां है। हमारे इंसान तो धार्मिक, राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक प्रयोगों में ही अस्त, व्यस्त और मस्त रहते हैं।

अध्य्यन बताता है कि पौधे अपने साथी पौधों को अलर्ट करते हैं लेकिन इंसान तो सिर्फ खुद को अलर्ट कर बचाते हैं, संभव हो तो मौका से भाग भी जाते हैं। जब से मैंने इस अध्ययन बारे पढ़ा है मेरे कानों में अजीब सी आवाजें आनी शुरू हो गई हैं।

- संतोष उत्सुक

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