वृक्षारोपण में वोटारोपण (व्यंग्य)

By संतोष उत्सुक | Aug 16, 2021

पिछले साल आयोजित वृक्षारोपण समारोह में नेताजी अपनी राजनीतिक अदाओं के मुताबिक़ देर से पहुंचे थे। आयोजन करने वाले युवा थे, उन्होंने पर्यावरण प्रेमियों व अन्य लोगों को समय पर आने के लिए अनुरोध किया था और अधिकांश लोग आ भी गए थे मगर नेताजी ने तो देर से ही आना होता है। युवाओं ने नाराज़ होकर नेताजी के आने से पहले काफी पौधे खुद ही लगा दिए थे। जब नेता जी आए तो उन्हें बचे खुचे पौधों में से ही एक पौधा लगाना पड़ा जिससे उन्हें संतुष्टि नहीं हुई। जो पौधा लगाया गया था वह कद में बहुत छोटा था शायद इसलिए उसमें जान प्राण भी कम थे। नेताजी उसे जल्दबाज़ी में ज्यूंहि पकड़ा उसकी जड़ों से मिटटी छूट गई। लगाने से पहले भाग्यशाली पौधे के साथ नेताजी की फोटो बहुत ज़रूरी होती है लेकिन पौधे ने नेताजी के हाथ काफी गंदे कर दिए थे इसलिए फोटो भी मनपसंद नहीं आई। कट्टर समर्थकों ने हाथ बंटाया तो दो तीन पत्तियां भी टूट गई।

इस बार नेताजी ने पहले ही स्पष्ट कह दिया था कि वृक्ष जैसा लगने वाला पौधा ही लाएं, उसकी प्रजाति ऐसी हो जो जल्दी बढ़े। वृक्ष की जड़ें जल्दी सड़ने वाले कपड़े में पैक होनी चाहिए ताकि हथेली गंदी न हो। उन्हें याद आया एक बार किसी वन महोत्सव में जड़ की मिटटी से केंचुआ भी निकल आया था जो उनके जूतों पर गिरा था, चरणों पर गिरा था तभी उनके विराट हृदय ने उसे माफ़ कर दिया था। उन दिनों वे मंत्री हुआ करते थे और उन्होंने केंचुआ पाए जाने का इल्ज़ाम विपक्ष पर लगा दिया था और विपक्ष ने उस पर राजनीति करनी शुरू कर दी थी।

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चुनाव निकट होने के कारण इस बार के वृक्षारोपण समारोह में फोटो खिंचवाने वाले भी ज़्यादा हो गए थे। पौधा लगाने वाली ज़मीन को रंगों से सजाया गया था मानो पौधे की बलि देनी हो। पौधारोपण के समय सबने मिलकर पौधे की मासूम टहनियां, नरम पत्तियां और कमसिन तना पकड़ पकड़ कर उसकी जान निकाल दी, इतनी फ़ोटोज़ खींची कि पौधा दुखी हो गया। अडोस पड़ोस की हरियाली भी दुखी होने लगी। वैसे यह तो पूर्व निश्चित था क्यूंकि नेताजी जो पौधा लगा रहे थे। यह प्रशंसनीय रहा कि इस बार नेताजी समय पर पहुंचे, जनता देर से मगर नेताजी ने युवा मतदाताओं को जीत लिया। वृक्षारोपण उत्सव में सबसे ज़्यादा परेशान, लगाए गए वृक्ष रहे। कई दिन तक वे चीखते चिल्लाते रह गए मगर रोपने के बाद उन्हें किसी ने पानी के लिए नहीं पूछा।  लेकिन यह तो होना ही था हमने लकीर को पीटना ही था।

- संतोष उत्सुक

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