'ग्रीनलैंड पर जो देश बीच में आयेगा उस पर टैरिफ ठोंकेगे', यह साधारण बयान नहीं, दुनिया को ट्रंप की खुली धमकी है

By नीरज कुमार दुबे | Jan 17, 2026

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर वैश्विक राजनीति में उथल पुथल मचा दी है। इस बार विवाद का केंद्र बना है ग्रीनलैंड। ट्रंप ने संकेत दिया है कि दुनिया के जो देश ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिका की रणनीति का समर्थन नहीं करेंगे, उन पर अमेरिका भारी टैरिफ लगा सकता है। यह बयान ऐसे समय में आया है जब आर्कटिक क्षेत्र में रूस और चीन की सक्रियता तेजी से बढ़ रही है और अमेरिका वहां अपनी पकड़ मजबूत करना चाहता है।

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हम आपको बता दें कि ग्रीनलैंड डेनमार्क का स्वायत्त क्षेत्र है और डेनमार्क सरकार ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि ग्रीनलैंड न तो बिकाऊ है और न ही किसी दबाव में सौंपा जा सकता है। ग्रीनलैंड के स्थानीय प्रशासन ने भी अमेरिका की इस सोच को खारिज करते हुए कहा है कि वहां के लोग अपने भविष्य का फैसला खुद करेंगे। वहीं यूरोप के कई देशों ने डेनमार्क के समर्थन में बयान दिए हैं और इसे अंतरराष्ट्रीय नियमों और संप्रभुता के खिलाफ बताया है। साथ ही ट्रंप की टैरिफ धमकी को कई देशों ने आर्थिक जबरदस्ती करार दिया है। ट्रंप के ताजा बयान के बाद ट्रांस अटलांटिक रिश्तों में तनाव साफ दिखाई देने लगा है और नाटो के भीतर भी असहजता बढ़ती नजर आ रही है। देखा जाये तो डोनाल्ड ट्रंप का ग्रीनलैंड को लेकर दिया गया बयान एक ऐसी राजनीति को उजागर करता है जिसमें कूटनीति नहीं बल्कि धमकी हथियार बन चुकी है।

ग्रीनलैंड क्यों अहम है यदि इसकी बात करें तो आपको बता दें कि यह कोई साधारण बर्फीला द्वीप नहीं है। यह आर्कटिक क्षेत्र में स्थित एक ऐसा भूभाग है जहां से उत्तरी अटलांटिक पर नजर रखी जा सकती है। यहां दुर्लभ खनिज संसाधन हैं। यहां से मिसाइल चेतावनी प्रणाली, नौसैनिक गतिविधियां और वायु मार्ग नियंत्रित किए जा सकते हैं। यही वजह है कि अमेरिका इसे केवल आर्थिक नहीं बल्कि सैन्य नजरिये से भी देखता है। लेकिन सवाल यह नहीं है कि ग्रीनलैंड कितना महत्वपूर्ण है। असली सवाल यह है कि क्या किसी देश को यह अधिकार है कि वह अपनी सामरिक जरूरतों के नाम पर दूसरे देशों पर आर्थिक दबाव बनाए। ट्रंप का बयान इसी सोच की खतरनाक मिसाल है।

देखा जाये तो टैरिफ अब अमेरिका का सबसे बड़ा हथियार बन चुका है। टैरिफ का इस्तेमाल कभी व्यापार संतुलन के लिए होता था। आज यह राजनीतिक और सामरिक दबाव का औजार बन गया है। ट्रंप की धमकी बताती है कि अमेरिका अब खुले तौर पर कह रहा है या तो हमारे साथ खड़े हो जाओ या आर्थिक सजा भुगतो। यह नीति न केवल वैश्विक व्यापार को नुकसान पहुंचाती है बल्कि छोटे और मध्यम देशों को डर के साए में जीने पर मजबूर करती है। आज ग्रीनलैंड है। कल कोई और मुद्दा होगा। यह रवैया पूरी दुनिया को अस्थिरता की ओर धकेल सकता है।

दूसरी ओर, नाटो की नींव सामूहिक सुरक्षा और आपसी भरोसे पर टिकी है। लेकिन जब नाटो का सबसे शक्तिशाली सदस्य ही दूसरे सदस्य देश पर दबाव डालने लगे, तो यह गठबंधन कैसे टिकेगा। डेनमार्क नाटो का सदस्य है। ग्रीनलैंड उसका हिस्सा है। अगर अमेरिका उसी देश को धमकी दे रहा है, तो यह नाटो पर सीधा हमला है। यह संदेश जा रहा है कि गठबंधन तभी तक मान्य है जब तक वह अमेरिकी हितों के अनुकूल है। इस बीच, यूरोप के कई देशों के भीतर अब यह सवाल उठने लगा है कि क्या अमेरिका सच में भरोसेमंद सुरक्षा साझेदार है या नहीं। यह वही दरार है जो नाटो को अंदर से खोखला कर सकती है। इसमें कोई दो राय नहीं कि अगर अमेरिका ग्रीनलैंड को लेकर आक्रामक रुख अपनाता है, तो इसके दूरगामी सामरिक परिणाम होंगे। रूस और चीन को यह कहने का मौका मिलेगा कि पश्चिमी देश दोहरे मानदंड अपनाते हैं। ऐसे में यूरोप अपने स्वतंत्र रक्षा ढांचे की ओर और तेजी से बढ़ सकता है। इससे नए सैन्य और आर्थिक गुट बन सकते हैं। इसका मतलब यह भी है कि दुनिया एक बार फिर गुटों में बंटने की ओर बढ़ेगी। शीत युद्ध जैसी स्थिति लौट सकती है लेकिन इस बार आर्थिक हथियार ज्यादा खतरनाक होंगे।

अब सवाल उठता है कि क्या नाटो खत्म होने की कगार पर है? जवाब यह है कि नाटो तुरंत खत्म नहीं होगा। लेकिन यह जरूर कहा जा सकता है कि वह अपने सबसे नाजुक दौर में है। अगर अमेरिका इसी तरह सहयोगियों पर दबाव डालता रहा, तो नाटो का अस्तित्व केवल कागजों तक सीमित रह जाएगा। देखा जाये तो किसी भी गठबंधन की ताकत हथियारों से नहीं, भरोसे से आती है। और भरोसा तब टूटता है जब धमकी संवाद की जगह ले ले।

बहरहाल, डोनाल्ड ट्रंप का ग्रीनलैंड को लेकर दिया गया बयान एक चेतावनी है। यह चेतावनी है उस दुनिया के लिए जो नियम आधारित व्यवस्था पर भरोसा करती रही है। यह संकेत है कि आने वाले समय में ताकतवर देश ज्यादा आक्रामक और ज्यादा बेपरवाह हो सकते हैं। अगर इस सोच को समय रहते रोका नहीं गया, तो न केवल नाटो बल्कि पूरी वैश्विक व्यवस्था गहरे संकट में फंस सकती है। ग्रीनलैंड की बर्फ के नीचे केवल खनिज नहीं हैं, वहां भविष्य के टकराव की चिंगारी भी छुपी हुई है।

-नीरज कुमार दुबे

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