पश्चिम बंगाल की राजनीति: वाम से श्रीराम तक...

By अभिनय आकाश | Jan 17, 2020

पूर्वी हिमालय और बंगाल की खाड़ी के बीच बसे पश्चिम बंगाल में खूबसूरत घाटियों से लेकर चाय के बागानों की ताजगी है तो कहीं सुंदरवन की विविधता। धार्मिक और सांस्कृतिक तौर पर जितना ही ये राज्य समृद्ध है उतना ही राजनीतिक तौर पर ये राज्य जागरूक है। साथ ही बंगाल का राजनीति के एक खास उग्र रूप से वास्ता रहा है। क्रांति और जुनून राज्य के राजनीतिक मानस में शामिल है। खुदीराम बोस, नेताजी बोस… स्वतंत्रता आंदोलन इसके उदाहरणों से भरा पड़ा है। लेकिन बंगाल में राजनीतिक हिंसा का भी पुराना इतिहास रहा है। जिसकी शुरूआत ब्रितानी वायसराय लॉर्ड कर्जन के बंगाल के विभाजन के फैसले के विरोध में 1905 में हुई थी। उसके बाद आज़ादी मिलने तक बंगाल में हिंसक घटनाओं का सिलसिला चलता रहा था। आज़ादी के बाद, 1960 के दशक में नक्सलबाड़ी आंदोलन से बंगाल की राजनीति में एक हिंसक मोड़ आया। नक्सलियों ने हिंसा का रास्ता चुना, क्योंकि चुनावों और लोकतंत्र पर उनका भरोसा नहीं था। उस समय राज्य में सत्तासीन कांग्रेस ने, खास कर शहरी इलाकों में, हिंसा को कायम रखने का काम किया और वामपंथी उन दिनों हिंसा झेल रहे थे। 

साल 1947 में भारत को आज़ादी मिली और देश का विभाजन भी हुआ। साथ ही बंगाल का भी विभाजन हुआ। पश्चिम बंगाल का हिस्सा भारत में रह गया और पूर्वी बंगाल का हिस्सा पाकिस्तान में चला गया और बाद में पूर्वी पाकिस्तान कहलाया। दोनों ही ओर को ख़ून ख़राबे के अलावा विस्थापन और शरणार्थियों की समस्याओं से रूबरू होना पड़ा। फिर 1971 में भारत के सक्रिय सहयोग से पूर्वी पाकिस्तान स्वतंत्र देश होकर बांग्लादेश बना। लेकिन इस दौरान एक बार फिर पश्चिम बंगाल को लाखों लोगों को शरण देनी पड़ी। इस बीच 1950 में कूच बिहार राज्य ने भारत में मिलने का फ़ैसला किया और 1955 में फ़्रांसिसी अंत:क्षेत्र चंदननगर भी भारत को सौंप दिया गया। ये दोनों ही पश्चिम बंगाल का हिस्सा बने, बाद में बिहार का कुछ हिस्सा भी इसमें शामिल किया गया। देश के साथ ही बंगाल में भी कांग्रेस की तूती बोलती रही। आजादी के बाद हुए तीन आम चुनावों में कांग्रेस पश्चिम बंगाल में छाई रही, परंतु पश्चिम बंगाल कांग्रेस में आरंभ से ही अनेक महत्वपूर्ण आंतरिक समस्याएं थीं। जहां अतुल घोष तथा प्रफुल चंद्र सेन एक ओर थे, वहीं अरुण चंद्र गुहा, सुरेंद्र मोहन बोस और प्रफुल्ल चंद्र घोष दूसरी तरफ थे। 1967 से 1980 के बीच का समय पश्चिम बंगाल के लिए हिंसक नक्सलवादी आंदोलन, बिजली के गंभीर संकट, हड़तालों और चेचक के प्रकोप का समय रहा। इन संकटों के बीच राज्य में आर्थिक गतिविधियाँ थमी सी रहीं। इस बीच राज्य में राजनीतिक अस्थिरता भी चलती रही। आज़ादी के बाद से 1967 तक तो कांग्रेस का शासन रहा। अंततः पश्चिम बंगाल कांग्रेस में दरार आई। अजय मुखर्जी के नेतृत्व में एक दल अलग से काम करने लगा। सभी गैर कांग्रेस दलों को एक साथ लाने का प्रयत्न किया गया, परंतु ये प्रयास सफल नहीं हो सका। उस दौरान चुनावों में मुकाबला तीन धड़ों के बीच हुआ- पीपल्स यूनाइटेड लेफ्ट फ्रंट (पीयूएलएफ), यूनाइटेड लेफ्ट फ्रंट (यूएलएफ) तथा कांग्रेस। कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी), रेवलूशनरी सोशलिस्ट पार्टी, द रेवलूशनरी कम्युनिस्ट पार्टी तथा सोशलिस्ट यूनिटी आदि ने ज्योति बसु के नेतृत्व में यूएलएफ का गठन किया था जबकि अजय बाबू के नेतृत्व में पीयूएलएफ का गठन हुआ था, जिसमें बांग्ला कांग्रेस, फारवर्ड ब्लॉक और कम्युनिस्ट पार्टी आफ इंडिया मुख्य रूप से शामिल थे। इस त्रिकोणीय मुकाबले में पीयूएलएफ को 63, यूएलएफ को 68 सीटें प्राप्त हुईं। चुनाव के बाद ये दोनों दल 18 सूत्रीय कार्यक्रम के अधीन एक हो गए तथा कुछ अन्य दलों के साथ मिलकर अजय बाबू के नेतृत्व में सरकार बनाई। कोई आठ महीनों के लिए बांग्ला कांग्रेस के नेतृत्व में यूनाइटेड फ़्रंट ने सत्ता संभाली इसके बाद तीन महीने प्रोग्रेसिव डेमोक्रेटिक गठबंधन ने राज किया फिर फ़रवरी 1968 से फ़रवरी 1969 तक एक साल राज्य में राष्ट्रपति शासन रहा। एक साल (फ़रवरी 1969 से मार्च 1970 तक) बांग्ला कांग्रेस ने सत्ता संभाली फिर आगे के एक साल राष्ट्रपति शासन रहा।

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1977 में कांग्रेस का प्रभुत्व खत्म हो गया और वामपंथियों ने सत्ता हासिल कर ली, लेकिन हिंसा का चक्र जारी रहा। वामपंथियों के शासन का शुरुआती काल अपेक्षाकृत शांत रहा, हालांकि सरकार समर्थित हिंसा की छिटपुट घटनाएं होती रहीं। शुरुआती वर्षों में वामपंथी भूमि सुधारों को लागू करने और ग्रामीण इलाकों में विकास कार्यों को लेकर व्यस्त रहे। उनकी ऊर्जा अधिकतर रचनात्मक कार्यों में खप रही थी। लेकिन 1990 के दशक में भारतीय अर्थव्यवस्था को खोले जाने के बाद वामपंथियों का खेल खत्म होने की शुरुआत हो गई। आर्थिक उदारीकरण के विरोधी रहे वामपंथियों की नीतियों ने, खास कर ग्रामीण इलाकों में, रोज़गार का भीषण संकट पैदा कर दिया। लोगों के पास करने को कुछ नहीं था, यही वो समय था जब पुराने नेता हाशिये पर चले गए और वामपंथी काडर में गुंडों और बाहुबलियों की भरमार हो गई और खास कर ग्रामीण बंगाल में, हिंसा रोज़मर्रा की बात हो गई। 

प्रदेश का बेहद मध्यम वर्गीय इलाका कोलकाता के काली घाट का हरीश चटर्जी स्ट्रीट जहां ममता बनर्जी का बचपन अपने छह भाइयों के साथ गुजरा। देश के लिए भले ही ममता पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री हैं लेकिन आज भी वह अपने उसी पुश्तैनी माकन में रहती हैं जहां उनका बचपन बीता था। यूं तो ममता के राजनीतिक करियर में कई उतार-चढ़ाव आए पर सक्रिंय राजनीति की पुख्ता शुरुआत का साल 1984 का रहा जब ममता ने सीपीएम के दिग्गज नेता सोमनाथ चटर्जी के खिलाफ जाधवपुर से लोकसभा का चुनाव लड़ने का फैसला किया। तब ममता के इस निर्णय को लेकर तमाम तरह की अटकलें लग रही थीं और लोगों को ऐसा लग रहा था की ममता इस हाई प्रोफाइल नेता के कद के सामने बौनी साबित होंगी। लेकिन ममता ने सारी अटकलों को धता बताते हुए जीत का परचम लहरा दिया। उग्र स्वाभाव की माने जाने वाली ममता के इस मिजाज़ का अहसास साल 1991 में तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव को भी हुआ जब खेल मंत्री ममता बनर्जी ने कोलकाता के बिग्रेड परेड मैदान की रैली में भाषण देते हुए केंद्र सरकार पर आरोप लगाते हुए इस्तीफा दे दिया। खेल मंत्रालय के साथ खेल करने का आरोप लगाते हुए ममता के इस इस्तीफे से कांग्रेस पशोपेश में आ गयी। साल 1996 में एक और धमाका करते हुए ममता ने कांग्रेस को सीपीएम की कठपुतली बता पार्टी के खिलाफ ही मोर्चा खोल दिया।

ममता की तुनकमिजाजी और अस्थिर छवि धीरे-धीरे वामपंथियों से लड़ने में कारगर साबित होने लगी। तृणमूल को इस बात का अहसास हुआ कि हिंसक हुए बिना आप सत्तारूढ़ पार्टी का मुकाबला नहीं कर सकते। ममता अटल बिहारी वाजपेयी सरकार से हाथ मिला रेल मंत्री बन गयी लेकिन एनडीए के साथ भी ममता की जोड़ी जमी नहीं और 2001 में वह सरकार से अलग हो गयी। ममता ने एक बार फिर से कांग्रेस का दामन थाम गठबंधन कर 2004 का लोकसभा और 2006 का विधानसभा चुनाव लड़ा लेकिन इस बार ममता को चुनाव में मुंह की खानी पड़ी। राजनीतिक पंडितों ने तब उनकी राजनीति का मर्सियां भी लिख दिया था। 2007 से 2011 तक का समय सर्वाधिक हिंसक वर्षों में से था। सिंगूर में टाटा नैनो कार परियोजना और नंदी ग्राम में औद्योगिकरण के लिए किसानों की ज़मीन के अधिग्रहण पर ममता ने आन्दोलन कर किसान समर्थक और उद्योग विरोधी हथियार का फ़ॉर्मूला अपना कर वाम मोर्चा की सरकार को झुका दिया। जिस लखटकिया कर के निर्माण का सपना संजोये टाटा ने बंगाल के सिंगूर का चयन किया था उन्हें अपना बोरिया बिस्तर समेट वहां से भागना पड़ा और तो और नंदी ग्राम परियोजना का भी वही हाल हुआ। सिंगूर और नंदीग्राम ने ममता को गांव-गांव तक पहुंचा दिया जिसका असर 2009 के लोकसभा चुनाव में दिखा जब ममता को जबरदस्त कामयाबी हासिल हुई। 2011 के विस चुनाव में ममता ने मां,माटी और मानुष का नारा दिया और 34 सालों से चली आ रही वामपंथ सरकार को उखाड़ फेका। तृणमूल ने नंदीग्राम और सिंगूर में किसानों के हिंसक आंदोलनों के सहारे सत्ता में कदम रखा। सत्ता हासिल करने के बाद भी तृणमूल ने अपना पुराना रवैया जारी रखा। जनता को डराने के लिए हिंसा का सहारा लेते हैं और सत्ता में बने रहने के लिए जाति और पहचान की राजनीति करते हैं। हालिया वर्षों के पंचायत चुनाव इस बात के ज्वलंत उदाहरण हैं कि कैसे चुनाव को अपने पक्ष में करने के लिए तृणमूल ने हिंसा का इस्तेमाल किया।

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फिर आता है साल 2019 का लोकसभा चुनाव। बंगाल में कहावत मशहूर है करबो लरबो जितबो। इस कहावत को सौ टका सच बनाने में प्रधानमंत्री मोदी और भी जुटे और ममता बनर्जी भी। वैसे तो कहा जाता है कि दिल्ली की सत्ता का रास्ता उत्तर प्रदेश से होकर जाता है। लेकिन यूपी में अखिलेश और मायावती के गठबंधन के बाद बीजेपी ने दिल्ली पहुंचने के लिए कोलकाता के रास्ते को नापना शुरू कर दिया। पश्चिम बंगाल की 42 सीटों में अपने लिए संभावनाओं के द्वार खुलते देख बीजेपी ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी। ममता को पता था कि जनता की ममता बीजेपी पर बरसी तो सूबे में उनका अखंड राज चलाना मुश्किल हो जाएगा। ऐसे में ममता बीजेपी और पीएम मोदी से सीधी टक्कर लेती दिखीं। आम चुनाव में बीजेपी ने ममता बनर्जी के पश्चिम बंगाल में सेंध नहीं लगाई है, बल्कि किले के काफी अंदर तक कब्जा जमा लिया। और तो और बीजेपी ने तो ममता बनर्जी की पार्टी में ही सेंध लगा दिया और टीएमसी के विधायकों और पार्षदों को अपने पाले में शामिल करा दिया और लोकसभा की 2 सीट से बीजेपी को 22 सीटों तक पहुंचा दिया।

- अभिनय आकाश

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