By अभिनय आकाश | May 02, 2026
देश की सबसे बड़ी अदालत ने एक अहम फैसला सुनाया जिस पर अब बहस छिड़ गई है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि इन भाषणों के आधार पर एफआईआर दर्ज करने के लिए कोई संघय अपराध नहीं बनता है। जबकि लोगों का कहना है कि अनुराग ठाकुर और प्रवेश वर्मा ने ऐसे भाषण दिए जिसे सुनने के बाद ऐसा लगता है कि नफरत फैलाई जा रही है। दोनों के किस भाषण पर सुनवाई हुई वह बताएंगे। उससे पहले आपको बता दें कि कोर्ट ने इस मामले पर क्या कुछ फैसला दिया है। कोर्ट ने कहा कि यह कोई संघीय अपराध नहीं है। यानी कॉग्निजबल ऑफेंस नहीं है। कॉग्निजबल अपराध एक ऐसा अपराध होता है जिसमें पुलिस बिना वारंट के गिरफ्तार कर सकती है। बिना कोर्ट के अनुमति जांच शुरू हो सकती है। लेकिन कोर्ट के मुताबिक इस मामले में ऐसा कुछ भी नहीं पाया गया। यानी कि यह कोई संघय अपराध या कॉग्निजबल ऑफेंस नहीं है।
याचिकाकर्ताओं ने बताया कि उन्होंने प्रारंभ में दिल्ली पुलिस आयुक्त और पार्लियामेंट स्ट्रीट एसएचओ से संपर्क कर दोनों नेताओं के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने का अनुरोध किया था। जब पुलिस ने एफआईआर दर्ज करने से इनकार कर दिया, तो उन्होंने अतिरिक्त मुख्य महानगर मजिस्ट्रेट (प्रथम) की राउज़ एवेन्यू अदालत में याचिका दायर की।
याचिकाकर्ताओं के अनुसार, निचली अदालत ने 26 अगस्त, 2020 को उनकी शिकायत को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि सक्षम प्राधिकारी से नामजद आरोपियों पर मुकदमा चलाने की पूर्व अनुमति के अभाव में यह कानूनी रूप से स्वीकार्य नहीं है। 13 जून 2022 को दिल्ली उच्च न्यायालय ने करात और तिवारी की उन याचिकाओं को खारिज कर दिया, जिनमें भाजपा के दो नेताओं के खिलाफ घृणास्पद भाषण के आरोप में एफआईआर दर्ज करने की मांग की गई थी। न्यायालय ने कहा कि “ये बयान किसी विशिष्ट समुदाय के खिलाफ निर्देशित नहीं थे और न ही इनसे हिंसा या सार्वजनिक अव्यवस्था भड़काने का कोई संकेत मिला।
उच्च न्यायालय ने यह भी कहा कि दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 196 के अंतर्गत आने वाले अपराधों के संबंध में, एफआईआर दर्ज करने और जांच का निर्देश देने की सीआरपीसी की धारा 156(3) के तहत शक्ति का प्रयोग पूर्व स्वीकृति के अभाव में नहीं किया जा सकता। हालांकि, सर्वोच्च न्यायालय ने निचली अदालत और उच्च न्यायालय के इस तर्क से असहमति जताई। उसने कहा कि पूर्व स्वीकृति की आवश्यकता केवल मजिस्ट्रेट द्वारा संज्ञान लेने के चरण में ही उत्पन्न होती है, उससे पहले नहीं। दंड प्रक्रिया संहिता की योजना में संज्ञान लेने से पहले एफआईआर दर्ज करने या जांच करने के निर्देश पर कोई रोक नहीं है। इसके विपरीत मानना विधायिका द्वारा परिकल्पित प्रतिबंध को लागू करने के समान होगा।
पीठ ने कहा कि आपराधिक कानून की प्रक्रिया क्रमबद्ध है। सबसे पहले संज्ञेय अपराध की सूचना प्राप्त होनी चाहिए; फिर एफआईआर दर्ज की जानी चाहिए; उसके बाद जांच होनी चाहिए; फिर दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 173 के तहत एक रिपोर्ट प्रस्तुत की जानी चाहिए; और केवल इसी चरण में संज्ञान लेने का प्रश्न उठता है। न्यायालय ने कहा कि इस न्यायालय द्वारा स्पष्ट किया गया कानून का रुख बिल्कुल स्पष्ट है। जहां सूचना से संज्ञेय अपराध के घटित होने का पता चलता है, वहां एफआईआर दर्ज करना अनिवार्य है। ऐसी परिस्थितियों में पुलिस को वैधानिक व्यवस्था के तहत या व्याख्यात्मक स्वतंत्रता के माध्यम से कोई विवेकाधिकार प्राप्त नहीं है। प्रारंभिक स्तर पर अधिकारियों द्वारा अपने वैधानिक कर्तव्यों का पालन न करना न केवल विधायी मंशा को विफल करता है, बल्कि आम नागरिक को संस्थागत निष्क्रियता के विरुद्ध असुरक्षित स्थिति में भी डालता है। कानून का शासन यह अनिवार्य करता है कि जांच प्रक्रिया को कानून के अनुसार, बाहरी विचारों से अप्रभावित होकर, क्रियाशील किया जाए।