Mamata Banerjee ने चुनाव आयोग के साथ बैठक के दौरान अनुचित व्यवहार किया, मेज पर जोर से हाथ मारा और बीच में ही चली गईं!

By नीरज कुमार दुबे | Feb 03, 2026

पश्चिम बंगाल में सत्तारुढ़ टीएमसी की ओर से चुनाव आयोग के अधिकारियों के खिलाफ बयानबाजी या उनके काम में दखल देने के आरोप तो लगते ही रहते हैं लेकिन हालात तब और विकट हो गये जब पार्टी प्रमुख और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने दिल्ली आकर मुख्य चुनाव आयुक्त पर जोरदार निशाना साधा। ममता बनर्जी ने चुनाव आयोग के दफ्तर के बाहर संवाददाताओं से बात करते हुए मुख्य चुनाव आयुक्त पर कड़ा हमला बोला। उन्होंने कहा कि वह बहुत दुखी हैं और अपने लंबे राजनीतिक जीवन में उन्होंने इतना अहंकारी और झूठ बोलने वाला आयुक्त नहीं देखा। उन्होंने यह भी कहा कि उनके राज्य को चुन कर निशाना बनाया जा रहा है और 58 लाख मतदाताओं के नाम हटाए गए तथा उन्हें अपना पक्ष रखने का अवसर नहीं दिया गया।

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आयोग के सूत्रों ने यह भी आरोप लगाया कि पश्चिम बंगाल में चुनाव अधिकारियों को निशाना बनाया जा रहा है। दावा किया गया कि तृणमूल कांग्रेस के कुछ विधायक खुले आम अपशब्द और धमकी भरी भाषा का प्रयोग कर रहे हैं, खासकर मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ। कुछ स्थानों पर निर्वाचक पंजीकरण अधिकारी यानी एसडीओ और बीडीओ दफ्तरों में तोड़फोड़ की घटनाएं भी बताई गई हैं।

चुनाव आयोग ने साफ कहा कि मतदाता सूची के इस विशेष काम में लगे अधिकारियों को बिना दबाव काम करने दिया जाना चाहिए। किसी भी तरह का दबाव, रुकावट या दखल स्वीकार नहीं होगा। आयोग ने प्रशासनिक चिंता भी जताई। बूथ लेवल अधिकारियों को दिए जाने वाले मानदेय का पूरा भुगतान अभी तक नहीं हुआ है। प्रति अधिकारी 18 हजार रुपए की जगह केवल 7 हजार रुपए दिए गए हैं। आयोग ने इसे तुरंत जारी करने को कहा।

इसके अलावा यह भी कहा गया कि राज्य में तैनात कई अधिकारी जरूरी पद स्तर के नहीं हैं। बीस जनवरी को तय मानक के अनुसार रिटर्निंग अधिकारी नियुक्त करने के लिए प्रस्ताव मांगे गए थे, लेकिन अभी केवल 67 विधानसभा क्षेत्रों में ही एसडीओ या एसडीएम स्तर के अधिकारी इस पद पर हैं। आयोग ने राज्य सरकार पर प्रक्रिया में चूक का आरोप भी लगाया। आरोप लगाया गया कि तीन चुनाव पर्यवेक्षकों का तबादला बिना आयोग से सलाह लिए कर दिया गया। 27 जनवरी को तबादला आदेश रद्द करने को कहा गया था, पर अब तक कोई सूचना नहीं है। सूत्रों ने यह भी बताया कि चार चुनाव अधिकारियों, दो ईआरओ, दो एईआरओ और एक डाटा एंट्री आपरेटर के खिलाफ कर्तव्य में चूक और डाटा सुरक्षा नियम तोड़ने के मामले में अभी तक कोई प्राथमिकी दर्ज नहीं हुई है, जबकि उन पर जानकारियों को अनधिकृत लोगों से साझा करने का आरोप है।

हम आपको बता दें कि पश्चिम बंगाल में जल्द ही विधानसभा चुनाव होने हैं और इस समय वहां मतदाता सूची का विशेष पुनरीक्षण चल रहा है। अंतिम सूची सात फरवरी को जारी होनी है। जहां तक मुख्यमंत्री की ओर से चुनाव आयुक्त के खिलाफ दिये गये बयान की बात है तो सवाल यह उठता है कि अगर सत्तारुढ़ दल के नेता ही चुनाव आयुक्त को घेरने, दबाव बनाने या धमकाने की राह चुनेंगे तो संदेश क्या जाएगा? क्या हर वह अधिकारी जो नियम की बात करेगा, राजनीतिक हमले का लक्ष्य बनेगा? क्या कानून का राज केवल किताबों में रह जाएगा? लोकतंत्र बहस से चलता है, बहाने से नहीं; नियम से चलता है, रौब से नहीं। पश्चिम बंगाल की राजनीति पर लंबे समय से गुंडागर्दी का आरोप लगता रहा है। मतदान के दिन हिंसा, बूथ पर कब्जा, कार्यकर्ताओं पर हमले जैसी खबरें नई नहीं हैं।

यह भी सच है कि किसी भी राज्य सरकार को यह अधिकार है कि वह आयोग से सवाल पूछे, आंकड़े मांगे, गलती पर आपत्ति करे। पर सवाल और शोर में फर्क होता है। लोकतांत्रिक संवाद और आक्रामक दबाव में रेखा खींचनी ही होगी। अगर हर असहमति को राजनीतिक युद्ध बना दिया जाएगा तो संस्थाएं कमजोर होंगी और अंत में नुकसान जनता का होगा।

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