Gyan Ganga: भगवान श्रीराम ने विभीषण के बारे में सुग्रीव से क्या पूछा था?

By सुखी भारती | Nov 15, 2022

श्रीराम जी की शरणागत होने, श्रीविभीषण जी अपनी जान हथेली पर लेकर पहुँच चुके थे। उन्होंने जीवन में जो खोना था, वह तो उन्होंने ढंग से खो ही लिया था। और अब श्रीविभीषण जी के पास खोने को कुछ नहीं था। बस पाना ही पाना था। लेकिन उस विशेष पाने के लिए, श्रीविभीषण जी को अभी कुछ और पड़ाव लांघने शेष थे। जिसमें सुग्रीव का ही एक नाम लिया जा सकता था।

‘जानि न जाइ निसाचर माया।

कामरुप केहि कारन आया।।’

सुग्रीव ने कहा, कि हे महाराज! सुनिए, राक्षसों की माया जानी नहीं जाती। यह इच्छानुसार रुप बदलने वाला न जाने किस कारण आया है।

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भगवान श्रीराम जी ने सुग्रीव की बात सुनी, तो मन ही मन, प्रभु अवश्य सोचते होंगे, कि वाह सुग्रीव! हमने तो आज तक यही सुना था, कि भगवान अर्थात हमारी माया को कोई नहीं जान सका है। लेकिन हमारे ही समक्ष, तुम हमीं से कह रहे हो, कि इस संसार में कोई अन्य भी है, जिसकी माया को कोई नहीं जान पाया है? तो इसका अर्थ तो यही हुआ न, कि विभीषण भी हमारी ही भाँति ईश्वरत्व से परिपूर्ण है? अर्थात हम तो भगवान ही हैं, साथ में वह भी भगवान है? सुग्रीव ने तो इसका ऊत्तर देना ही क्या था, क्योंकि श्रीराम जी के हृदय की उसे भला क्या भनक थी। उसे तो अपना मत कहने, व उस मत को दृढ़ भाव से सही ठहराने में ही रुचि थी। श्रीराम जी ने अभी यह तो पूछा ही नहीं था, कि सुग्रीव हम कैसे जानें, कि विभीषण यहाँ किस प्रयोजन से आया है? इससे पूर्व ही सुग्रीव ने अपना मत निर्णय सुना डाला-

‘भेद हमार लेन सठ आवा।

राखिअ बाँधि मोहि अस भावा।।’

सुग्रीव बोला, कि हे प्रभु आप को अब मैं क्या बताऊँ! निश्चित ही रावण का भाई, हमारा भेद लेने आया है। श्रीराम जी ने सुना, तो एक पल के लिए सुग्रीव को देखते रहे। इसलिए नहीं, कि श्रीराम जी को श्रीविभीषण जी के किसी भय ने ग्रस लिया था। अपितु इसलिए, कि श्रीराम जी को, इस घटनाक्रम में भी बड़े आनंद का भाव देखने को मिल रहा था। श्रीराम जी अपने श्रीमुख से तो, सुग्रीव को कोई प्रश्न नहीं कर रहे थे। लेकिन प्रभु भावना के स्तर पर अवश्य यह कह रहे थे, कि वाह सुग्रीव! अगर श्रीविभीषण हमारा भेद लेने आये हैं, तो इससे अधिक प्रसन्नता का विषय भला और क्या हो सकता है? कारण कि जीव का तो परम् लक्ष्य ही यह है, कि वह अपने जीवन काल के रहते-रहते, ईश्वर का भेद पा ले। संसार में सर्वोत्तम कार्य ही यह है। कारण कि इस जगत में जीव को मैं भेजता ही इसलिए हूँ। लेकिन दुर्भाग्यवश, जीव मेरी बनाई त्रिगुणी माया के चक्र में फँस कर रह जाता है। यह तो करोड़ों में कोई एक भाग्यशाली योद्धा होता है, जो माया को लात मार कर, मेरा भेद लेने निकलता है। और तुमने कहा, कि विभीषण मेरा भेद लेने आया है, तो इससे बढ़कर आनंद का विषय हो ही नहीं सकता।

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ऐसे जीव पर हम अपना संपूर्ण प्रेम लुटाने पर, सदैव तत्पर रहते हैं। कारण कि जीव की तो वृति ही यह हो रखी है, कि वह मुझसे भेंट करते समय, सदैव अपना भेद छुपा कर ही बात करता है। वह भीतर से कुछ और होता है, और बाहर से कुछ और। उसे यही भय रहता है, कि वह संसार में तो किसी को भेद देता नहीं, साथ में भगवान भी उसका भेद न लेने पाये। ऐसे में वह सदा ही मेरा कृपा पात्र बनने से चूक जाता है। लेकिन विभीषण उन सभी भक्तों से विलग वृति का है। जिसने अपना तो कोई भेद रखा ही नहीं, साथ में तुम्हारे कथनानुसार, वह हमारा भेद लेने आया है। बस उसकी संसार से यही उल्टी रीत, मुझे मोह ले गई। चलो इस जगत की भीड़ में कोई तो ऐसा मिला, जिसे संसार नहीं, अपितु करतार का भेद चाहिए। और हाँ सुग्रीव! मेरे संबंध में यह तो भ्रम ही फैला रखा है, कि हमारा भेद तो बड़े-बड़े ऋर्षि-मुनि नहीं पा सके। जबकि सत्य तो यह है, कि कोई हमारा भेद लेने आता ही नहीं। उल्टे अपना भेद छुपाने आते हैं। अपने भेद मिटाकर, कोई हमसे हमारा भेद मांगे तो सही। हम हमारा सर्वस्व उसके समक्ष खोल कर न रख दें, तो कहना।

खैर! यह तो श्रीराम जी के आंतरिक भाव थे। जिसका भेद उसी को लग सकता है, जो श्रीराम जी के साथ अभेद हो चुका हो। जो कि सुग्रीव अभी तक तो नहीं हो सका था। लेकिन श्रीविभीषण जी इस पड़ाव के बिल्कुल निकट थे। अपने यह आंतरिक भाव तो श्रीराम जी ने बाहर प्रक्ट नहीं किये थे। लेकिन नीति के आधार पर श्रीराम जी ने अवश्य कुछ कुछ कहा था। जो कि सुग्रीव की कल्पना से बिल्कुल परे था। क्या कहा था, श्रीराम जी ने, जानेंगे अगले अंक में---(क्रमश)---जय श्रीराम।

- सुखी भारती

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