हमने, तुमने, किसी ने क्या लेना (व्यंग्य)

By संतोष उत्सुक | Mar 09, 2021

उन्होंने तो सीधे सपाट कह दिया कि मैंने क्या लेना और मुझे भी समझा दिया कि तुमने भी क्या लेना। लोग अभी भी कूड़ा यहां वहां फेंक देते हैं, चलो म्युनिसिपल कमेटी में इनकी शिकायत करते हैं। यह सोच कर कि एक अकेला दो ग्यारह माने जाते हैं, उनसे कहने की गुस्ताखी कर दी। एक अन्य सुपरिचित से कहा तो उन्होंने भी समझाया, आप अपना कूड़ा सही तरह से ठिकाने लगाते हो न। मैंने कहा हां। वे बोले, फिर मैंने क्या लेना और आपने भी क्या लेना। किसी को समझाने की कोशिश करोगे तो कहीं कचरा आपके सर और चश्मे पर न बिखेर दे। कूड़ा कचरा कई रंग, किस्म और आकार का होता है। वक्त खराब चल रहा है बच कर रहना चाहिए।

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हमारे परिचित नहीं माने, पत्नी नहीं मानी, पत्रकार भी नहीं माने वस्तुत अब कोई सहज मानने को तैयार नहीं होता। अब तो कूड़ा कर्कट ऐसा होना चाहिए जो स्वत: चल कर कचरा पेटी में चला जाए। नगरपालिका के कर्मचारी सरकारी हैं, इसलिए थोड़ा काम करके ज़्यादा थक जाते हैं। ठेकेदार कर्मचारियों को कम पैसे पर ज़्यादा सफाई करवाते हैं। सामाजिक संस्थाओं के कारनामे समझा देते हैं कि कोई भी अभियान रैलियों, विज्ञापनों, भाषणों, फोटोज, ख़बरों व मुख्य अतिथि के आधार पर सफल रहता है। अब तो स्वस्थ, खुश और संतुष्ट रहने का ज़माना है। विभिन्न प्रकार के नायकों, प्रशासकों, प्रवाचकों व धर्माधीशों के निरंतर सद्व्यवहार से सहनशीलता हमारे रोमरोम में रच गई है। हमारे पड़ोस, मुहल्ले, शहर, ज़िला, राज्य या देश में कुछ यानि कुछ भी हो रहा हो हमारा चुप, शांत रहने का सदगुण हमेशा व्यक्तिगत सकारात्मक परिणाम लाता है। छोटे मोटे कचरे से उद्वेलित होने की ज़रूरत नहीं है। बात उचित है हमने, तुमने और किसी ने क्या लेना। 

- संतोष उत्सुक

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