By उमेश चतुर्वेदी | May 05, 2026
बीते अप्रैल में हुए पांच राज्यों के चुनाव नतीजों को देखने के कई नजरिए हो सकते हैं। लेकिन देश के पूर्वी छोर पर उत्तर से लेकर दक्षिण तक स्थित चार राज्यों के नतीजों को देखें तो उनमें एक बात समान नजर आती है। सभी राज्यों ने अपने यहां के उन आक्रामक नेतृत्व पर भरोसा जताया है, जिनसे विकास और नवाचार की उम्मीद है। असम में हिमंत, पश्चिम बंगाल में बीजेपी और तमिलनाडु में विजयन की जीत लोकांक्षाओं के जमीनी हकीकत बनने का भरोसा है। इन राज्यों की जीत में दिखता है कि केंद्र से बिना वजह की लड़ाई का भी कोई मोल नहीं है। आज की जनता विकास चाहती है, महिलाएं सुरक्षा चाहती हैं और युवा अपने भविष्य और सपनों की गारंटी चाहते हैं।
सवाल यह है कि आखिर ममता बनर्जी को क्यों हार मिली? इसमें दो राय नहीं कि 2011 से पश्चिम बंगाल की सत्ता पर काबिज ममता बनर्जी की सरकार के खिलाफ सत्ता विरोधी माहौल था। फिर भी बौद्धिकों के एक वर्ग को लगता नहीं था कि भारतीय जनता पार्टी पिछले विधानसभा चुनावों के वोट के अंतर को पाटकर जीत दर्ज कर लेगी। 2021 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी को पश्चिम बंगाल में 38 प्रतिशत वोट और 77 सीटें मिली थीं। 2016 के विधानसभा चुनाव में तो बीजेपी को 10 प्रतिशत से कुछ ज्यादा वोट मिले थे, लेकिन उसे सिर्फ तीन सीटें ही मिली थीं। उसकी तुलना में देखें तो बीजेपी के लिए 2021 के चुनावी नतीजे बड़ी छलांग थे। इस ट्रेंड के हिसाब से इस बार बीजेपी की जीत सुनिश्चित लग रही थी, हालांकि 2024 के लोकसभा चुनावों में बीजेपी को अपने पिछले प्रदर्शन से छह सीटें कम पर संतोष करना पड़ा था। इसलिए बीजेपी की जीत को लेकर संशय भी था। लेकिन जिस तरह प्रधानमंत्री मोदी ने बंगाल में जीत हासिल करने के लिए चुनावी रणनीति बनाई, खुद कई रोड शो किए, झारग्राम जिले में सड़क पर उतर कर बंगाल की प्रसिद्ध झालमुढ़ी का स्वाद चखा, उसने भाजपा की संभावनाओं के द्वार खोल दिए। रही-सही कसर ममता बनर्जी की कुछ गलतियों ने कर दिए। बीते साल अगस्त में कोलकाता के आरजी कर मेडिकल कॉलेज में रेजिडेंट डॉक्टर से दुष्कर्म और उसकी हत्या पर ममता ने जिस तरह की चलताऊ राजनीति की, उससे पश्चिम बंगाल गुस्से में था। इसका असर भी दिखा और महिलाओं ने उनकी लक्ष्मी भंडार योजना में मिल रही डेढ़ हजार रूपए की रकम पर भरोसा नहीं किया और ममता को हार का सामना करना पड़ा। ममता ने भाजपा से लोगों को डराते हुए कहा कि अगर राज्य में उसकी सरकार आ गई तो वह माछ-भात खाने पर रोक लगा देगी। ममता की खासियत उनकी आक्रामक राजनीतिक शैली रही है। लेकिन इस बार उनकी वह आक्रामकता ठोस मुद्दों की बजाय हल्की बातों में ज्यादा नजर आई। इसलिए उनके खिलाफ भाजपा का भय बनाम भरोसा का नारा चल गया। भारतीय जनता पार्टी की जीत में उसके रणनीतिकार अमित शाह की बड़ी भूमिका रही। भारतीय जनता पार्टी ने पूरे चुनाव अभियान में घुसपैठ को मुद्दा बनाए रखा। ममता बनर्जी घुसपैठ को चलताऊ और हिंदू-मुस्लिम के बीच खाई बढ़ाने की राजनीति के मुद्दे के तौर पर लेती रहीं। भारतीय जनता पार्टी अब संतोष कर सकती है कि उसके पूर्ववर्ती भारतीय जनसंघ के संस्थापक श्यामा प्रस्दा मुखर्जी के घर में भी उसका शासन है।
असम के लिए घुसपैठ का मुद्दा पुराना है। हिमंत विस्वसरमा ने इस मुद्दे को खूब हवा दी। उन्होंने बार-बार कहा कि वे सत्ता में लौटे तो किसी भी घुसपैठिए को असम में नहीं रहने देंगे। असम की जनसांख्यिकी को घुसपैठ ने बहुत प्रभावित किया है। इससे असम के लोग बहुत प्रभावित हैं। अतीत में कांग्रेस की सरकारों ने इसकी तरफ या तो आंख मूंदे रखा या फिर घुसपैठियों को अपने वोट बैंक के रूप में स्थापित करने की कोशिश की। इससे असम का बहुसंख्यक वर्ग नाराज हुआ। वैसे हिमंत भी पुराने कांग्रेसी हैं। उन्हें कांग्रेस की अंदरूनी कमजोरियां भी पता हैं। फिर अपने पांच साल के कार्यकाल में उन्होंने विकास को गति भी दी है। इसकी वजह से असम के लोगों ने उन पर एक बार फिर से भरोसा जताया है।
तीसरे बड़े राज्य तमिलनाडु में पिछले यानी 2021 के विधानसभा चुनाव में डीएमके ने भले ही गठबंधन में चुनाव लड़ा था, लेकिन पच्चीस साल बाद वह अकेले दम पर 133 सीटों के साथ बहुमत की सरकार बनाने में कामयाब रही। लेकिन पूरे पांच साल के शासन काल में स्टालिन की सरकार की उपलब्धि खोजेंगे तो पाएंगे कि वह पूरे कार्यकाल में सनातन पर हमले करती रही। उसके निशाने पर नरेंद्र मोदी की सरकार रही। हिंदी को मुद्दे पर भी वह तमिलनाडु के लोगों की गोलबंदी करती रही। उसने नई शिक्षा नीति को तमिल अस्मिता के लिए खतरा बताया। प्रस्तावित लोकसभा सीटों के परिसीमन को भी मुद्दा बनाया। उसके बरक्स अभिनेता से नेता बने जोसेफ विजयन की पार्टी टीवीके ने लोगों के बीच पैठ बनाई। लोगों की भलाई के लिए काम किए। ठीक है कि विजयन का क्रेज युवाओं में ज्यादा है। लेकिन लोकभलाई के लिए किए गए कार्यों की वजह से वे तमिलनाडु के वरिष्ठ नागरिकों के भी चहेते बने। यही वजह है कि उनका दल राज्य में सबसे बड़ा दल बनकर उभरा है। सत्ताधारी डीएमके दूसरे स्थान पर पिछड़ गया है। 1977 से तमिलनाडु की राजनीति दो राजनीतिक दलों डीएमके और एआईडीएमके के इर्द-गिर्द सिमट कर रह गई विजयन ने इस परिपाटी को तोड़ दिया है। तमिलनाडु में अभिनेताओं का क्रेज नई बात नहीं है। इसके पहले तमिल फिल्मों के सुपर स्टार एमजी रामचंद्रन की नवेली पार्टी एआईडीएमके को 1977 में बड़ी जीत मिली थी। देखना होगा कि वे किसका साथ लेकर नई सरकार बनाते हैं।
देश ही नहीं, दुनिया की सबसे पहली चुनी हुई वामपंथी सरकार देने वाले केरल राज्य में वामपंथी मोर्चा इस बार चुनाव हार गया है। दस साल बाद उसे करारी हार मिली है। इसके साथ ही राज्य में कांग्रेस की अगुआई वाले संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा यानी यूडीएफ की सरकार बनने का रास्ता साफ हो गया है। लगातार चुनाव हार रही कांग्रेस के लिए यह नतीजा राहत का सबब हो सकता है। लेकिन केरल में इस बार बीजेपी ज्यादा सीटें हासिल करने में भले ही कामयाब नहीं हुई हो, लेकिन वह अपनी वोट हिस्सेदारी बढ़ाने में सफल रही है। इस लिहाज से कह सकते हैं कि वह राज्य मे तीसरा कोण बनाने की कोशिश में है। बेशक राज्य में अब पांच साल बाद चुनाव होंगे, लेकिन इस बीच बीजेपी यहां की राजनीति में गहरी सेंध लगाने की कोशिश में जुटी रहेगी। केंद्र शासित प्रदेश पुद्दुचेरी को डीएमके ज्यादातर कांग्रेस को एक तरह से परोसता रहा है। लेकिन उसी कांग्रेस से विद्रोह करके निकली एनआईआरसी के साथ बीजेपी का गठबंधन सरकार बनाता नजर आ रहा है।
पांच राज्यों के इन चुनावों ने जहां कांग्रेस और वामपंथ को सोचने का मौका दिया है कि आखिर उन्होंने गलती कहां की तो बीजेपी के लिए परीक्षा का सबब बनकर उभरा है। पश्चिम बंगाल में हिंसा का इतिहास रहा है। वहां के राजनीतिक कार्यकर्ता बदले दौर में बदले दौर की सत्ताओं के साथ चिपकते रहे हैं। बीजेपी की चुनौती होगी कि पहले वाममोर्चा के लठैत और फिर तृणमूल के साथी रहे आपराधिक तत्वों को वह कैसे काबू में करती है। ये चुनाव आने वाले दिनों में भाजपा के उत्साह को बढ़ाने का भी काम करेंगे। इन चुनावों ने तमिलनाडु में विजयन के सामने भी चुनौती रखी है, चुनौती यह कि युवाओं के सपनों को वे कैसे पूरा करते हैं? क्योंकि सबसे ज्यादा भरोसा उन पर युवाओं ने ही जताया है।
-उमेश चतुर्वेदी
लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तम्भकार हैं