ग्रीनलैंड में बर्फ के नीचे ऐसा क्या है, जिसके लिए ट्रंप पागल हो रहे हैं? सीक्रेट शहर का वो 'राज' जिसे दशकों तक दुनिया से छिपाया गया

By अभिनय आकाश | Jan 21, 2026

आठ जंग रुकवाने का दावा करने वाले डोनाल्ड ट्रंप ने इस साल की शुरुआत से क्या-क्या किया? वेनेजुएला में सेना उतार कर राष्ट्रपति को उठवा लिया। ईरान पर हमले की धमकी दे दी। तमाम देशों पर नए टेरिफ लगाने की भी धमकी दे डाली। और अब ईरान में हालात सामान्य होने की बात कह के ग्रीनलैंड की तरफ रुख कर लिया। सेल्फ एक्लेम्ड पीस प्रेसिडेंट ने कहा कि ग्रीनलैंड पर अमेरिका के कंट्रोल से कम कुछ भी स्वीकार नहीं है।  रूस के राष्ट्रपति व्लादमीर पुतिन ये कहते हैं कि यूक्रेन पर हमारा नियंत्रण हमारी सुरक्षा के लिए जरूरी है। क्योंकि नाटो हमारी दहलीज पर आया तो अमेरिका और पूरा पश्चिम चिल्लाता है कि यह तानाशाही है। रूस ने तो आक्रमण कर दिया। लोकतंत्र की हत्या हो रही है। लेकिन जब वही अमेरिका वही डोनल्ड ट्रंप ये कहते हैं कि ग्रीनलैंड पर हमारा कब्जा हमारी सुरक्षा के लिए जरूरी है। क्योंकि ऐसा हो सकता है कि चीन और रशिया वहां आ जाए। तो अमेरिका उसे स्ट्रेटजी बता रहा है, डील बता रहा है। दरअसल, ग्रीनलैंड की कहानी जो है वो सिर्फ जमीन के टुकड़े की नहीं है। वो दुनिया के बदलते नियमों की है। 

ग्रीनलैंड में सेना भेजा तो ट्रंप ने निकाला टैरिफ वाला हथियार

यह मजबूती दिखाने के लिए नाटो के उसूलों का सम्मान करते हुए इन आठ देशों ने अपने सैनिक जो हैं वो ग्रीनलैंड भेज दिए। इनडायरेक्टली ये अमेरिका को एक बड़ा संदेश था कि ग्रीनलैंड अकेला नहीं है। हाथ मत लगाना। लेकिन ट्रंप जो अपने ईगो के लिए जाने जाते हैं ना खाता ना वही जो हम सोच रहे हैं बस वही सही। उन्होंने इसे अपनी शान के खिलाफ मान लिया। 1 फरवरी से इन सभी आठ देशों के सामानों पर 10% एक्स्ट्रा टेरिफ लगा दिया गया। धमकी दी गई कि अगर 1 जून तक ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिका के मन मुताबिक समझौता नहीं हुआ। यानी ग्रीनलैंड अमेरिका को नहीं सौंपा गया तो यह टेरिफ बढ़कर 25% कर दिया जाएगा। यह 25% किसी दुश्मन देश पर नहीं लगाया गया। यह उन दोस्तों पर लगाया गया है जो पिछले 75 सालों से हर युद्ध में अमेरिका के कंधे से कंधा मिलाकर लड़ रहे थे। 

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कितना जरूरी है ग्रीनलैंड

ग्रीनलैंड का महत्व उसकी लोकेशन में निहित है। ग्रीनलैंड जो है वो आर्कटिक रीजन के आठ देशों में से एक है। ऐसे तो यह डेनमार्क का हिस्सा है लेकिन ऑटोनॉमस टेरिटरी है यानी स्वायत्त क्षेत्र। इसका 80% हिस्सा बर्फ से ढका है और बर्फ की भी 4 किमी मोटी परत है। लेकिन अब यह पिघल रही है। आर्कटिक रीजन बाकी दुनिया के मुकाबले चार गुना रफ्तार से तप रहा है। करीब 26 लाख स्क्वायर किमी बर्फ गायब हो चुकी है। डाटा के मुताबिक इसी बर्फ के नीचे दुनिया की 30% अनएक्सप्लोर्ड गैस और 13% अनएक्स्लोर्ड ऑयल यह छुपे हुए हैं। इसके अलावा यहां कीमती धातुएं सोना, प्लैटिनम, जस्ता और लौ, अयस्क, तांबा, सीसा, मोलिब्डेनम और टाइटेनियम यह सब भी मौजूद बताए जाते हैं। इन सब वजहों से इस आइलैंड पर ट्रंप ही नहीं रूस और चीन की भी नजर बनी रहती है।  शीत युद्ध के दौरान, ग्रीनलैंड-आइसलैंड-यूके गैप नाटो की समुद्री रणनीति का केंद्रीय तत्व था, जो अटलांटिक में प्रवेश करने वाली सोवियत पनडुब्बियों की निगरानी को संभव बनाता था। दशकों तक आर्कटिक एक जमे हुए बफर की तरह रहा- दूरस्थ, दुर्गम और लंबे समय तक चलने वाली प्रतिस्पर्धा से लगभग अप्रभावित। लेकिन अब जलवायु परिवर्तन आर्कटिक को एक सक्रिय क्षेत्र में बदल रहा है। पिघलती बर्फ नए समुद्री मार्ग खोल रही है। साथ ही, हाइपरसोनिक हथियारों, लंबी दूरी के सटीक प्रहार, अंतरिक्ष-आधारित सेंसर, मिसाइल रक्षा और समुद्रगत प्रणालियों में प्रगति दूरी को लगातार समेट रही है। ऐसे में ग्रीनलैंड हाशिये से खिसककर अग्रिम रणनीतिक क्षेत्र में बदल जाता है। जो दूरी कभी सुरक्षा देती थी, वह सिमट रही है; प्रतिक्रिया का समय घट रहा है; और अमेरिकी मुख्यभूमि के लिए चेतावनी का अंतराल सिकुड़ता जा रहा है।

बर्फ के नीचे छिपा अरबों खरबों डॉलर का खजाना

आज की दुनिया तेल पर नहीं चिप्स और बैट्रियों पर चलती है। आपका iPhone हो, टेस्ला कार हो या फिर F35 फाइटर जेट सबको चलने के लिए यह मिनरल्स चाहिए। फिलहाल इन पर चीन का राज है। अमेरिका जानता है कि भविष्य का तेल यही मिनरल है और यह खेल सिर्फ सरकार का नहीं बड़े-बड़े अरबपति जैसे बिल गेट्स, पीटर थील भी ग्रीनलैंड के खनिजों में पानी की तरह ऐसा बहा रहे हैं। कोबोल्ड मेटल्स जैसी कंपनियां वहां खुदाई की तैयारियां कर रही हैं। उन्हें पता है कि भविष्य का सोना यहीं छिपा है। बर्फ पिघलने से नए समुद्री रास्ते खुल रहे हैं। जिसे पोलर सिल्क रोड कहा जा रहा है। जो जहाज एशिया से यूरोप जाने के लिए स्विज़ नहर का लंबा रास्ता लेते थे। वो भविष्य में ग्रीनलैंड के ऊपर से गुजरेंगे। यह रास्ता दूरी को 40% तक कम कर देगा। ग्रीनलैंड वो चेक पोस्ट है जो आने वाले 100 सालों तक वैश्विक व्यापार को नियंत्रित करेगा। भारत के उदाहरण से समझें। सियाचिन ग्लेशियर का कोई विशेष आर्थिक मूल्य नहीं है, उस पर भारी लॉजिस्टिक लागत भी आती है और वह अनुभवी सैनिकों के लिए भी अत्यंत दुर्गम है। इसके बावजूद भारत दशकों से सियाचिन पर कायम है। क्योंकि उसे खाली करने का अर्थ होगा पाकिस्तान को ऐसे भू-भाग पर कब्जा करने देना, जो भले ही आज सीमांत लगे, लेकिन भविष्य में उपयोग में लाया जा सकता है। एक बार ऐसा इलाका हाथ से निकल जाए तो उसे वापस हासिल करना कई गुना महंगा पड़ता है। इसलिए सियाचिन पर बने रहने का फैसला तात्कालिक सामरिक लाभ से नहीं, बल्कि दीर्घकालिक दूरदृष्टि से उपजा है। अमेरिका के लिए ग्रीनलैंड भी कुछ ऐसा ही है।

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अमेरिका के सीक्रेट शहर की कहानी क्या है

क्या आप जानते हैं कि ग्रीनलैंड की बर्फ के नीचे अमेरिका का एक सीक्रेट शहर आज भी दबा हुआ है। बात है 1960 के दशक की। शीत युद्ध अपने चरम पर था। उस वक्त कोल्ड वॉर में अमेरिका ने ग्रीनलैंड में एक बेहद खुफिया मिशन चलाया था जिसका नाम था प्रोजेक्ट आइस वर्म। प्लान बेहद खतरनाक था। अमेरिका ग्रीनलैंड की बर्फ की चादर के नीचे हजारों किलोमीटर लंबी सुरंगे खोदकर एक पूरा शहर कैम सेंचुरी बसाना चाहता था। वहां 600 परमाणु मिसाइलें तैनात करने की योजना थी जो लगातार चलती रहती और सोवियत संघ के निशाने पर होती। अमेरिका ने वहां पर सिनेमा हॉल, चर्च और रहने की भी जगह बनाई थी। सब कुछ बर्फ के नीचे लेकिन कुदरत से कोई नहीं जीत पाया। ग्लेशियर की बर्फ खिसकने लगी और वो पूरा शहर दब गया। प्रोजेक्ट को छोड़ना पड़ा। अब ग्लोबल वार्मिंग से जब बर्फ पिघल रही है तो जहर के बाहर आने का खतरा भी मंडरा रहा है। यही नहीं साल 1968 में अमेरिका का एक B52 बम वर्षक विमान जिसमें चार हाइड्रोजन बम थे। ग्रीनलैंड में क्रैश हो गया। उस हादसे को ब्रोकन एरो कहा जाता है। ट्रंप कहते हैं ग्रीनलैंड सुरक्षित नहीं है। लेकिन सच तो यह है। ग्रीनलैंड को सबसे ज्यादा खतरा खुद अमेरिका के प्रयोगों से हो रहा है। 

अब आगे क्या

अमेरिका की नीति नैटो देशों के साथ परंपरागत संबंध बनाए रखने की रही है। लेकिन वहां एक बड़े वर्ग की सोच थी कि यूरोपीय देशों में अनेक अमेरिकी नीतियों के साथ नहीं चलते, उसका विरोध करते हैं जबकि अमेरिकी सैन्य शक्ति से ही उनकी धाक है। उनका सवाल यह भी था कि जब सोवियत संघ खत्म होने के साथ उसके सैन्य ढांचे समाप्त हो गए तो नाटो की आवश्यकता ही क्या है? ट्रंप नाटो को खत्म नहीं कर रहे, पर उनकी अगुआई में अमेरिका अपने हिसाब से इसका संचालन सुनिश्चित करने की ओर अग्रसर है। बहरहाल, इसमें दो राय नहीं कि अमेरिका में राष्ट्रपति  ट्रंप के इस रुख और व्यवहार का विरोध करने वाले भी बड़ी संख्या में है। बावजूद इसके, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि उन्हें अमेरिका के प्रभुत्व और प्रभाव का पूरे विश्व को अहसास कराने और उसे आर्थिक व सामरिक रूप से पहले से ज्यादा सुरक्षित बनाने और दुनिया में अमेरिका केंद्रित विश्व व्यवस्था का रास्ता तैयार करने वाला नेता माना जाएगा। 

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