Collegium System क्या है? न्यायपालिका पर लग रहे हैं गंभीर आरोप, समझिए क्यों एक दूसरे से खफा हैं सरकार और सुप्रीम कोर्ट

By रेनू तिवारी | Dec 01, 2022

भारत एक लोकतांत्रिक देश है। जहां भारतीय संविधान को ही सर्वोच्च माना जाता है। संविधान किसी भी देश का प्राथमिक कानून होता है। संविधान सरकार को शक्तियां देता है और उसकी सीमाएं भी तय करता हैं। भारतीय राजव्यवस्था को किस तरह से चलाना है इसका संपूर्ण लेखा-जोखा संविधान में है। देश का सिस्टम बिना निरंकुश हुए सीमाओं के साथ चले इसके लिए संविधान ने शासन व्यवस्था को तीन भागों में बांटा है। यह तीन भाग विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका हैं। इन तीनों का काम अपने-अपने क्षेत्र में स्वतंत्र हैं। हर कोई राजव्यवस्था को सुचारू ढंग से चलाने के लिए, और जनता के हित में काम करने के लिए कर्तव्यबद्ध हैं। सीधे-सरल शब्दों में कहें तो विधायिका का काम कानून बनाना है, कार्यपालिका कानूनों को लागू करती है और न्यायपालिका कानून की व्याख्या करती है। इन तीनों को लोकतंत्र का आधार-स्तंभ माना जाता है।

हाल फिलहाल में कार्यपालिका यानी सरकार और न्यायपालिका के बीच मनमुटाव की खबरे आ रही है। सुप्रीम कोर्ट ने जजों की नियुक्ती के लिए कुछ फाइलें दे रखी है जिस पर सरकार ने अपनी कोई भी प्रतिक्रिया नहीं दी है। फाइलों में जजों के पद पर नियुक्ति करने के लिए जो नाम दिए गये हैं उसपर सरकार ने न तो सहमति दी है और न ही उन्हें रिजेक्ट किया है। सरकार आखिर ऐसा क्यों कर रही है? जजों की नियुक्ति में लगातार हो रही देरी पर सुप्रीम कोर्ट ने सरकार के खिलाफ सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि सरकार 2014 में बनें NJAC कानून को खारिज करने की निराशा प्रकट कर रही हैं। वहीं दूसरी तरफ कानून मंत्री किरेन रीजीजू ने भी जजों की नियुक्ति के लिए कोर्ट द्वारा बनाये गये कॉलेजियम ढांचे पर सवाल उठाए हैं। आखिर ये कॉलेजियम क्या हैं, NJAC कानून को क्यों सुप्रीम कोर्ट ने खारिज किया, सरकार और न्यायपालिका इस वक्त क्यों आमने-सामने है? इन तमाम बातों को हम इस लेख में आपको बताएंगे-

क्या है कॉलेजियम सिस्टम

कॉलेजियम सिस्टम वो सिस्टम है जो देश के न्यायधीशों की नियुक्ती और स्थानांतरण की प्रक्रिया को देखता हैं। भारतीय न्यायधीशों की नियुक्ति और उनका ट्रांसफर कॉलेजियम ही करता हैं। कॉलेजियम का जिक्र भारतीय संविधान में नहीं हैं बल्कि कॉलेजियम को सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों के माध्यम से विकसित किया गया हैं। संविधान के मूल ढाचें में भारत के मुख्य न्यायधीश राष्ट्रपति की सलाह से जजों की नियुक्ती कर सकते हैं। इसके बाद देश की सरकारें बदलती रही और कई लगातार परिवर्तन हुए जिसके बाद कॉलेजियम का निर्माण हुआ।

कॉलेजियम प्रणाली का विकास

First Judge Case (1981): पहले न्यायाधीश मामला के अंदर यह नियम था कि न्यायिक नियुक्तियों और तबादलों पर भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) के सुझाव की "प्रधानता" को "ठोस कारणों" के चलते अस्वीकार किया जा सकता है। कोर्ट ने इसे स्वीकार किया और जजों की नियुक्ती और ट्रांसफर के लिए 12 साल तक यह व्यवस्था चलती रही। यह नियम एक तरह से न्यायपालिका पर कार्यपालिका की प्रधानता को दर्शा रहा था। 

Second Judge Case (1993): बदलते राजनीतिक समीकरण के कारण 1993 में एक बार फिर से न्यायिक नियुक्तियों और तबादलों को लेकर चर्चा होने लगी। न्यायपालिका को कार्यपालिका की बढ़ती प्रधानता अस्वीकार होती गयी। सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट करते हुए कॉलेजियम प्रणाली की शुरुआत की कि "परामर्श" का अर्थ वास्तव में "सहमति" है। सुप्रीम कोर्ट कार्यपालिका की प्रधानता को कम करते हुए कॉलेजियम व्यवस्था शुरू की। इस सिस्टम के अंतरगर्त भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) के साथ दो वरिष्ठ जजों की राय और आखिर में राष्ट्रपति की सहमति के बाद जजों की नियुक्ती और तबादलों पर निर्णय लिया जाएगा।

Third Judge Case (1998): वक्त के साथ एक बार फिर से वक्त राजनीति और देख के हालात बदले और तीसरा न्यायाधीश मामला सामने आया। राष्ट्रपति द्वारा जारी एक प्रेज़िडेंशियल रेफरेंस (Presidential Reference) (अनुच्छेद 143) के बाद सुप्रीम कोर्ट ने कॉलेजियम का विस्तार किया और इसे पांच सदस्य वाला एक सिस्टम बना दिया जिसमें भारत के मुख्य न्यायाधीश और चार वरिष्ठतम सहयोगी मिलकर न्यायिक नियुक्तियों और तबादलों पर फैसला करेंगे इसके बाद कार्यपालिका की सीमित सहमती भी अनिवार्य होगी। जजों की नियुक्ती के लिए कॉलेजियम जजों की फाइलें सरकार को भेजेगा। सरकार पहली बार में कुछ परिवर्तन करने का परामर्श दे सकती हैं लेकिन यदि कॉलेजियम को परामर्श को स्वीकार नहीं करता तो सरकार को नियुक्ती करनी होगी।

कॉलेजियम प्रणाली पर लगे गंभीर आरोप

1998 से अब तक कॉलेजियम सिस्टम के माध्यम से ही जजों की नियुक्ती और तबादले किए जा रहे थे। कॉलेजियम पर कई तरह से गंभीर आरोप भी लगते रहे हैं। लंबे समय से न्यायपालिका में सुधार करने की बात कही जा रही हैं। कॉलेजियम में शामिल जजों पर आरोप लगता रहा है कि वह अपने ही परिवार और रिश्तेदारों की बड़े पदों पर नियुक्ती करते हैं और उन्हें लाभ पहुंचाते हैं। कॉलेजियम पर मनमानी करने का भी आरोप हैं। इसके अलावा कॉलेजियम एक गैर संवैधानिक संस्था है जिसे सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद बनाया गया है ऐसे में यह लोकतंत्र का हनन भी हैं। लगातार अलोचनाओं का कॉलेजियम सिस्टम सामना कर रहा हैं। 

देश में आया राजनीतिक बदलाव

साल 2014 में जब बीजेपी सरकार सत्ता में आयी तब जजों की नियुक्ति और तबादले को लेकर संसद में कॉलेजियम को रिप्लेस करने के लिए राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) लेकर आयी। सरकार संसद में 99वें संविधान संशोधन के माध्यम से राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग बनाने का कानून लेकर आयी और इसे सर्वसहमति से पारित भी किया गया लेकिन इस कानून के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में पीआईएल दाखिल की गयी और सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान इस कानून को असंवैधानिक करार देकर खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) कानून संविधान के मूल ढांचे के खिलाफ हैं। बस यहीं से शुरू हो गयी सरकार और सुप्रीम कोर्ट के बीच तनातनी। दरअसल राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) के अंदर कानून मंत्री को भी शामिल किया था। इस बात को कोर्ट ने स्वीकार नहीं किया उन्होंने तर्क दिया कि कार्यपालिका न्यायपालिका के निर्णयों में हस्ताक्षेप कर रही हैं। कोर्ट कानून मंत्री की राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग में उपस्थिति के खिलाफ था।

राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC)

राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) एक प्रस्तावित निकाय था जो भारत सरकार और भारत की सभी राज्य सरकारों के तहत न्यायिक अधिकारियों, कानूनी अधिकारियों और कानूनी कर्मचारियों की भर्ती, नियुक्ति और स्थानांतरण के लिए जिम्मेदार होता। आयोग की स्थापना संविधान (निन्यानबेवां संशोधन) अधिनियम, 2014 या 99वें संविधान संशोधन अधिनियम-2014 के साथ 99वें संविधान संशोधन के माध्यम से भारत के संविधान में संशोधन करके 13 अगस्त 2014 को लोकसभा द्वारा और राज्य सभा द्वारा पारित की गई थी। 14 अगस्त 2014 को। NJAC ने न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए कॉलेजियम प्रणाली को बदल दिया होता, जैसा कि सुप्रीम कोर्ट ने एक नई प्रणाली द्वारा न्यायिक आदेश के माध्यम से लागू किया था।

संविधान संशोधन अधिनियम के साथ, राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग अधिनियम, 2014 भी राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग के कार्यों को विनियमित करने के लिए भारत की संसद द्वारा पारित किया गया था। NJAC विधेयक और संवैधानिक संशोधन विधेयक, भारत में 16 राज्य विधानसभाओं द्वारा अनुसमर्थित किया गया था, और बाद में 31 दिसंबर 2014 को भारत के राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी द्वारा अनुमति दी गई थी। NJAC अधिनियम और संवैधानिक संशोधन अधिनियम 13 अप्रैल 2015 से लागू हुआ।

16 अक्टूबर 2015 को, सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने 4:1 बहुमत से कॉलेजियम प्रणाली को बरकरार रखा और सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स ऑन रिकॉर्ड एसोसिएशन (एससीएओआरए) के साथ कई व्यक्तियों और निकायों द्वारा दायर याचिकाओं की सुनवाई के बाद एनजेएसी को असंवैधानिक करार दिया। प्रथम और प्रमुख याचिकाकर्ता।  न्यायमूर्ति जे.एस. खेहर, मदन लोकुर, कुरियन जोसेफ और आदर्श कुमार गोयल ने 99वें संशोधन और एनजेएसी अधिनियम को असंवैधानिक घोषित किया था जबकि न्यायमूर्ति जस्ती चेलमेश्वर ने इसे बरकरार रखा था।

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