Prajatantra: राहुल को रायबरेली से उतारने के पीछे क्या है कांग्रेस की रणनीति, Modi ने क्यों कहा- भागो मत

By अंकित सिंह | May 03, 2024

अटकलें, असमंजस और कन्फ्यूजन के बीच आखिरकार कांग्रेस ने गांधी परिवार के गढ़ अमेठी और रायबरेली से अपने उम्मीदवारों का ऐलान कर ही दिया। कांग्रेस ने जहां अमेठी से सोनिया गांधी के विश्वास पात्र रहे किशोरी लाल शर्मा को उम्मीदवार बनाया है। तो वहीं राहुल गांधी रायबरेली से चुनाव लड़ रहे हैं। दोनों उम्मीदवारों ने आज अपना नामांकन भी दाखिल कर दिया। राहुल गांधी के नामांकन दाखिल करने के दौरान कांग्रेस ने अपनी ताकत भी दिखाई। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, पूर्व अध्यक्ष और रायबरेली से सांसद रही सोनिया गांधी, प्रियंका गांधी सहित पार्टी के वरिष्ठ नेता मौजूद रहे। राहुल को अमेठी के बदले रायबरेली से चुनाव मैदान में उतारने के पीछे पार्टी का आकलन है कि पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष के लिए रायबरेली, अमेठी से बेहतर और सुरक्षित सीट है। हालांकि, राहुल गांधी पर भाजपा जबरदस्त तरीके से आक्रामक हो गई है। भाजपा साफ तौर पर कह रही है कि राहुल गांधी ने पहले ही हार मान लिया है इसलिए उन्होंने अमेठी छोड़ दिया और रायबरेली से चुनाव मैदान में उतरे हैं। भाजपा कह रही है 'डरो मत, भागो मत।'

कांग्रेस का पक्ष

अमेठी छोड़ राहुल गांधी के रायबरेली से चुनाव लड़ने पर कांग्रेस ने बचाव किया है। पार्टी महासचिव जयराम रमेश ने कहा कि राहुल गांधी के रायबरेली से चुनाव लड़ने की खबर पर कई लोगों की अलग-अलग राय है। उन्होंने कहा कि याद रखें, वह राजनीति और शतरंज के अनुभवी खिलाड़ी हैं। पार्टी नेतृत्व काफी विचार-विमर्श के बाद और एक बड़ी रणनीति के तहत अपने फैसले लेता है। इस एक फैसले ने भाजपा, उसके समर्थकों और उसके चाटुकारों को भ्रमित कर दिया है। बीजेपी के स्वयंभू चाणक्य, जो 'परंपरागत सीट' की बात करते थे, अब समझ नहीं पा रहे हैं कि क्या जवाब दें। कांग्रेस नेता प्रमोद तिवारी ने कहा कि परंपरागत रूप से, परिवार के एक वरिष्ठ सदस्य को रायबरेली से चुनाव लड़ाया जाता है... वर्तमान में, अगर हमारे पास कांग्रेस में कोई सर्वोच्च नेता है, तो वह राहुल गांधी हैं। इसीलिए वह अमेठी से रायबरेली आए ​​हैं। शिवसेना (यूबीटी) सांसद संजय राउत ने कहा कि राहुल गांधी डरने वाले व्यक्ति नहीं हैं। वह वायनाड से लड़ते हैं और जीतते हैं, हालांकि, हम सभी की इच्छा थी कि गांधी परिवार का कोई व्यक्ति उत्तर प्रदेश से लड़े, चाहे वह अमेठी हो या रायबरेली।

अमेठी से गांधी परिवार की हुई दूरी

उत्तर प्रदेश की अमेठी लोकसभा सीट को गांधी परिवार के सबसे मजबूत किलों में से एक माना जाता रहा है लेकिन 25 वर्षों में ऐसा पहली बार होगा जब गांधी परिवार का कोई भी सदस्य लोकसभा चुनाव में इस सीट से चुनाव मैदान में नहीं उतरेगा। वर्ष 1967 में निर्वाचन क्षेत्र बने अमेठी को गांधी परिवार का मजबूत किला माना जाता है और करीब 31 वर्षों तक गांधी परिवार के सदस्यों ने इस लोकसभा सीट का प्रतिनिधित्व किया है। पिछले आम चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की नेता स्मृति ईरानी कांग्रेस के इस किले को भेदने में सफल रहीं और उन्होंने राहुल गांधी को 55 हजार से ज्यादा मतों से शिकस्त दी थी। अमेठी लोकसभा सीट पर गांधी परिवार को 1998 में उस समय झटका लगा था, जब राजीव गांधी और सोनिया गांधी के करीबी सतीश शर्मा को भाजपा के संजय सिंह के हाथों शिकस्त का सामना करना पड़ा था। यह पहला मौका था जब यह सीट गांधी परिवार के हाथ से निकल गयी थी। सोनिया गांधी ने 1999 में सिंह को तीन लाख से ज्यादा मतों से हराकर अमेठी को फिर से कांग्रेस की झोली में डाल दिया था। सोनिया ने 2004 में रायबरेली लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा और राहुल गांधी को अमेठी सीट सौंपी गयी।राहुल ने 2004, 2009 और 2014 में लगातार तीन बार इस सीट पर जीत दर्ज की लेकिन 2019 में उन्हें स्मृति इरानी के हाथों शिकस्त झेलनी पड़ी। 

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सुर्खियों में रायबरेली सीट 

राहुल गांधी को उम्मीदवार बनाये जाने से सुर्खियों में रहने वाला रायबरेली निर्वाचन क्षेत्र एक बार फिर चर्चा का विषय बन गया है। रायबरेली सीट को ‘वीवीआईपी’ सीट भी कहा जाता है, जहां से पहले दो आम चुनाव में राहुल के दादा फिरोज गांधी विजयी हुए थे। रायबरेली निर्वाचन क्षेत्र में फिरोज गांधी द्वारा रखी गयी मजबूत नींव को उनकी पत्नी व पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने और मजबूती प्रदान की तथा 1967, 1971 और 1980 के चुनाव में इस सीट पर जीत हासिल की। इंदिरा गांधी ने 1980 में दो सीट से चुनाव लड़ा, जिनमें रायबरेली और मेडक (तेलंगाना) लोकसभा सीट शामिल हैं हालांकि उन्होंने बाद में मेडक सीट अपने पास रखने का फैसला किया। उसके बाद अरुण नेहरू ने 1980 के उपचुनाव और 1984 के आम चुनाव में रायबरेली पर कांग्रेस का परचम लहराये रखा। पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के करीबी माने जाने वाले अरुण नेहरू से लेकर शीला कौल तक रायबरेली सीट गांधी परिवार के सदस्यों और उनके करीबियों के पास ही रही। इंदिरा गांधी की रिश्तेदार शीला कौल ने 1989 और 1991 में रायबरेली का प्रतिनिधित्व संसद में किया था। गांधी परिवार के एक अन्य मित्र सतीश शर्मा ने 1999 में रायबरेली निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया और उसके बाद सोनिया गांधी का राजनीति में प्रवेश हुआ। वर्ष 1977 में आपातकाल के बाद जनता पार्टी के राज नारायण ने इंदिरा गांधी को हराया था, जो उस समय प्रधानमंत्री थीं। वहीं 1996 और 1998 में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के अशोक सिंह ने कांग्रेस के उम्मीदवारों को शिकस्त दी थी। सोनिया गांधी ने चुनावी राजनीति में प्रवेश करने के लिए 1999 में अमेठी सीट चुनी थी, लेकिन 2004 में उन्होंने अमेठी सीट राहुल के लिए छोड़ दी। सोनिया गांधी ने 2004 से 2019 तक चार बार रायबरेली सीट पर जीत हासिल की हालांकि उनकी जीत का अंतर कम होने लगा था। 

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