अमेरिकी राष्ट्रपति के War Room में क्या चल रहा है? किन देशों के नाम लाल घेरे में हैं?

By नीरज कुमार दुबे | Jan 12, 2026

आज पूरी दुनिया एक ही सवाल पूछ रही है कि डोनाल्ड ट्रंप के वार रूम में इस समय क्या चल रहा है। व्हाइट हाउस के भीतर कौन से देश के नक्शे खुले हैं, किन देशों के नाम लाल घेरे में हैं और किन मोर्चों पर सैन्य और आर्थिक हमले की तैयारी हो रही है। देखा जाये तो अमेरिकी राष्ट्रपति के सार्वजनिक बयानों, नीतिगत संकेतों और सैन्य गतिविधियों से साफ झलकता है कि अमेरिका एक साथ कई मोर्चों पर दबाव बनाने की रणनीति पर काम कर रहा है। आइये आज इसी पर बात करते हैं और आपको तथ्यों के साथ पूरी जानकारी देते हैं कि ट्रंप के निशाने पर इस समय कौन कौन से देश हैं और उनके खिलाफ अमेरिका किस स्तर की तैयारी कर रहा है।


देखा जाये तो साल 2026 की शुरुआत वैश्विक राजनीति के लिए एक बेचैन करने वाला संकेत लेकर आई है। दुनिया के नक्शे पर अमेरिका एक बार फिर उस भूमिका में दिख रहा है जिसे वह शीत युद्ध के दौर में निभाता था यानी निर्णायक दबाव डालने वाला सर्वशक्तिमान केंद्र। इस बार मंच पर हैं डोनाल्ड ट्रंप और उनकी भाषा पहले से अधिक तीखी, अधिक उकसाने वाली और अधिक विस्फोटक बनी हुई है।

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सबसे पहले वेनेजुएला की बात करें तो आपको बता दें कि ट्रंप ने खुद को सार्वजनिक रूप से वेनेजुएला का कार्यवाहक राष्ट्रपति बताकर अंतरराष्ट्रीय राजनीति की मर्यादा को जानबूझकर तोड़ा है। इसका सीधा संदेश यह है कि अमेरिका अब वेनेजुएला को एक संप्रभु राष्ट्र की तरह नहीं बल्कि अपने प्रभाव क्षेत्र के एक प्रशासित इलाके की तरह देख रहा है। देखा जाये तो वेनेजुएला का सामरिक महत्व केवल राजनीतिक नहीं बल्कि ऊर्जा पर आधारित है। दुनिया के सबसे बड़े तेल भंडारों में से एक पर नियंत्रण का अर्थ है वैश्विक ऊर्जा बाजार पर प्रभाव। ट्रंप का खुद को कार्यवाहक राष्ट्रपति बताना दरअसल यह बताने का तरीका है कि अमेरिका वहां सत्ता परिवर्तन को अब छिपाकर नहीं बल्कि खुले तौर पर संचालित करना चाहता है। यह सीधे तौर पर संसाधन नियंत्रण की राजनीति है।


इसी कड़ी में क्यूबा को लेकर ट्रंप का रवैया भी ध्यान खींचता है। क्यूबा को तेल आपूर्ति रोकने की धमकी और उसके बाद यह कहना कि मार्को रुबियो का क्यूबा का राष्ट्रपति बनना उन्हें ठीक लगता है, यह सब मजाक नहीं है। यह एक राजनीतिक संदेश है। इसका अर्थ यह है कि अमेरिका अब वैचारिक असहमति को सहन करने के मूड में नहीं है। वह खुले तौर पर यह संकेत दे रहा है कि जो सरकारें उसकी लाइन पर नहीं चलेंगी, उन्हें आर्थिक और राजनीतिक रूप से कुचल दिया जाएगा। देखा जाये तो मार्को रुबियो का नाम लेना प्रतीकात्मक है। एक ऐसा नेता जिसकी पहचान क्यूबा विरोधी राजनीति से जुड़ी रही है, उसे वहां के राष्ट्रपति पद से जोड़ना यह बताता है कि अमेरिका लोकतंत्र नहीं बल्कि अपने हितों के प्रति वफादार शासन चाहता है। यह बयान भले ही अनौपचारिक हो लेकिन इसके निहितार्थ बेहद गहरे हैं।


ईरान की बात करें तो आपको बता दें कि ट्रंप ने स्पष्ट रूप से कहा है कि अमेरिका ईरान के लिए बहुत मजबूत सैन्य विकल्पों पर विचार कर रहा है। देखा जाये तो यह कोई सामान्य चेतावनी नहीं है क्योंकि अमेरिका इस समय फारस की खाड़ी से लेकर पश्चिम एशिया तक अपनी सैन्य तैनाती मजबूत कर रहा है। हवाई हमलों से लेकर साइबर और ड्रोन हमलों तक की तैयारी की जा रही है। सवाल यह नहीं है कि हमला होगा या नहीं, बल्कि सवाल यह है कि हमला कब और कितना बड़ा होगा?


देखा जाये तो यदि अमेरिका ईरान पर हमला करता है तो इसके परिणाम केवल ईरान तक सीमित नहीं रहेंगे। पूरा पश्चिम एशिया अस्थिर हो सकता है। तेल की कीमतें आसमान छू सकती हैं। वैश्विक आपूर्ति शृंखला टूट सकती है। मुस्लिम देशों का रुख इस मामले में एक जैसा नहीं होगा। कुछ देश रणनीतिक मजबूरी में अमेरिका का सीमित समर्थन कर सकते हैं, लेकिन व्यापक इस्लामी दुनिया में इसका तीखा विरोध होगा। यह टकराव क्षेत्रीय से वैश्विक संकट में बदल सकता है।


ईरान पर हमले का एक और परिणाम होगा प्रतिशोध। ईरान सीधे या परोक्ष रूप से अपने सहयोगी संगठनों के जरिये जवाब देगा। इसका असर इजरायल से लेकर खाड़ी देशों तक दिख सकता है। इस तरह यह संघर्ष किसी एक मोर्चे पर सीमित नहीं रहेगा।


इसमें कोई दो राय नहीं कि अमेरिका की वैश्विक दादागिरी साफ दिखाई दे रही है। ग्रीनलैंड को लेकर ट्रंप का यह कहना कि अमेरिका ने यदि उस क्षेत्र को नहीं लिया तो उसे चीन या रूस ले लेंगे, यह दर्शाता है कि अमेरिका दुनिया को अब भी एक शतरंज की बिसात मानता है जहां मोहरे उसकी मर्जी से हिलने चाहिए। यह मानसिकता बताती है कि बहुध्रुवीय दुनिया की सच्चाई को स्वीकार करने में अमेरिका अब भी असहज है।


अब कोलंबिया की बात करें तो आपको बता दें कि कोलंबिया के राष्ट्रपति का ट्रंप से मिलने जाना एक दबाव भरी परिस्थिति में संवाद का प्रयास है। अमेरिकी धमकियों और दबाव ने कोलंबिया को बातचीत की मेज तक आने के लिए मजबूर किया है। यह अमेरिका की दबाव कूटनीति की सफलता भी है और उसकी सीमाओं का संकेत भी।


बहरहाल, जहां तक यह सवाल है कि दुनिया क्या एक और विश्व युद्ध की कगार पर है? इसका उत्तर भले अभी स्पष्ट नहीं हो लेकिन यह तो दिख ही रहा है कि फिलहाल दुनिया एक ऐसे दौर में जरूर है जहां टकराव की रेखाएं गहरी हो रही हैं। अमेरिका बनाम चीन, रूस, ईरान जैसे ध्रुव साफ दिख रहे हैं। अमेरिका की मौजूदा दादागिरी यह दिखाती है कि वह अपने पतन के डर से और अधिक आक्रामक होता जा रहा है।


-नीरज कुमार दुबे

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