'मिशन कर्मयोगी' अपने उद्देश्य में सफल रहा तो यह बड़ा प्रशासनिक सुधार होगा

By ललित गर्ग | Sep 07, 2020

प्रशासनिक सुधार की जरूरत महसूस करते हुए उसे दक्ष, जिम्मेदारी एवं समयबद्ध करने की आवश्यकता लंबे समय से रेखांकित की जाती रही है। इससे भी ज्यादा जरूरी है प्रशासन को भ्रष्टाचार मुक्त बनाने की। इसके लिए गठित समितियां और आयोग अनेक मौकों पर अपने सुझाव पेश कर चुके हैं। उनमें से कुछ को लागू भी किया गया, पर प्रशासनिक अधिकारियों और कर्मचारियों से जैसी दक्षता, कर्तव्यनिष्ठा, ईमानदारी, समयबद्धता और जवाबदेही की अपेक्षा की जाती रही है, वह पूरी नहीं हो पा रही है, यह एक गंभीर चुनौती एवं त्रासद स्थिति है। अधिकारियों-कर्मचारियों में जब तक इन गुणों का अभाव बना रहेगा, जब तक भ्रष्टाचारमुक्त प्रशासन असंभव है, आम नागरिकों को परेशानियों से मुक्ति नहीं मिलेगी एवं सरकारी योजनाओं, कार्यक्रमों में अपेक्षित गति नहीं आ पाएगी। सरकार ने इसके लिये राष्ट्रीय सिविल सेवा क्षमता कार्यक्रम-मिशन कर्मयोगी की शुरुआत की है, निश्चित ही इससे सरकारी नौकरशाही तंत्र को सुधारने की दिशाएं उद्घाटित होंगी।

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ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल के साल 2018 की करप्शन इंडेक्स रिपोर्ट में भ्रष्टाचार के मामले में भारत की स्थिति पहले से बेहतर हुई है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी एवं उनकी भाजपा सरकार अपने पिछले कार्यकाल से ही सरकारी दफ्तरों के कामकाज में सुधार लाने के प्रयास करती रही है। इसके लिए उसने कई कदम भी उठाए हैं, जिसमें हर कर्मचारी के समय पर दफ्तरों में पहुंचने और उनके काम करने पर निगरानी का तंत्र विकसित किया गया। उनकी जवाबदेही सुनिश्चित की गई। इन कारणों से थोड़ा-बहुत सुधार हुआ भी है, तो वह बहुत ऊंचे स्तर पर, लेकिन कुल मिलाकर इतना अप्रभावी कि उसे ऊंट के मुंह में जीरा से अधिक कुछ नहीं कहा जा सकता। कठोर नियंत्रण एवं नीतियों के बावजूद प्रशासनिक कार्यों में भ्रष्टाचार व्याप्त होना विडम्बनापूर्ण है, जिससे आम नागरिकों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है, रिश्वतखोरी कायम है, दलालों का बोलबाला है। सभी सरकारी प्रक्रियाएं जटिल हैं, डीडीए में फ्लैट को फ्रीहोल्ड कराने की प्रक्रिया को ही ले लीजिये इतनी जटिल एवं असंभव सरीखी है कि बिना दलालों के यह संभव नहीं हो पाती। मेरे मित्र ने साहस करके बिना दलालों के खुद ही फ्रीहोल्ड कराने की ठानी, लेकिन एक साल से अधिक समय बीत जाने एवं बीसों चक्कर लगाने, समस्त औचारिकताएं पूरी करने के बावजूद उनका फ्लैट फ्रीहोल्ड नहीं हो पाया है, कैसे आम नागरिक प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के न खाऊंगा और न खाने दूंगा एवं प्रशासन में दलाली एवं एजेंटप्रथा के समाप्त होने की घोषणाओं पर विश्वास करे?


पुलिस हो या अधिकारी आज भी नोट जुगाड़ने की कोशिश में रहते हैं, जनता की सेवा एवं सहयोग के लिये नहीं। जनता परेशान होगी तभी तो रिश्वत देगी, यह भ्रष्टाचार शासन एवं प्रशासन की जड़ों में पैठा हुआ है, इन विकट एवं विकराल स्थितियों में एक ही पंक्ति का स्मरण बार बार होता है, “घर-घर में है रावण बैठा इतने राम कहां से लाऊं”। भ्रष्टाचार, बेईमानी और अफसरशाही इतनी हावी हो गयी है कि सांस लेना भी दूभर हो गया है। राशन कार्ड बनवाना हो, ड्राइविंग लाइसैंस बनवाना हो, डीडीए में मकान/फ्लैट को फ्रीहोल्ड करवाना हो, चालान जमा करना हो, स्कूल में प्रवेश लेना, सरकारी अस्पताल में इलाज कराना हो और यहाँ तक की सांस लेना हो तो उसके लिए भी रिश्वत की जरूरत पड़ती है। अगर इन बातों को जनता नकारती रही तो कब तक हम लोग नरेंद्र मोदी और योगी आदित्यनाथ को ढूँढ़ते फिरेंगे। कब तब इन नेताओं की भ्रष्टाचारमुक्त त्वरित प्रशासनिक कार्रवाई की घोषणाएं केवल नारों तक सीमित रहेगी? आखिर कब प्रशासन नींद से जागेंगे। नेताओं के संकल्पों को आकार देने की कुछ जिम्मेदारी तो प्रशासनिक कर्मचारियों एवं अधिकारियों की भी है।


1985 में जब राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने थे तो उन्होंने नौकरशाहों पर नकेल कसने की खुलेआम घोषणा की थी। नरेन्द्र मोदी ने हालांकि बारह साल तक सफलतापूर्वक गुजरात का प्रशासन नौकरशाहों की ही मदद से चलाया था, किंतु लगता है कि इस संतोषजनक अनुभव के बावजूद उनके मन के किसी कोने में कहीं कोई छोटा-सा ही सही, लेकिन संदेह था। इसलिए प्रधानमंत्री बनते ही उन्होंने घोषणा की कि ‘अब मेरा क्या, मुझे क्या’ नहीं चलेगा। उनके प्रभावी शासन की चर्चाएं बहुत दूर-दूर तक हैं यह अच्छी बात है लेकिन इन चर्चाओं के बीच हमारे देश का भ्रष्टाचार एवं सरकारी कामों के लेट लतीफ- लटकाने की मानसिकता भी दुनिया में चर्चित है, इसे तो अच्छा नहीं कहा जा सकता। इसलिए हमें जरूरत है इसको रोकने की। हमें यह कहते हुए शर्म भी आती है और अफसोस भी होता है कि हमारे पास ईमानदारी नहीं है, राष्ट्रीय चरित्र नहीं है, नैतिक मूल्य नहीं है, काम के प्रति जबावदेही नहीं है। आज का काम कल पर टालने की मानसिकता एक आम आदमी को कितने सरकारी कार्यालयों के चक्कर कटवाती है, जगजाहिर है। राष्ट्र में जब राष्ट्रीय मूल्य कमजोर हो जाते हैं और सिर्फ निजी स्वार्थ और निजी हैसियत को ऊंचा करना ही महत्वपूर्ण हो जाता है तो वह राष्ट्र निश्चित रूप से कमजोर हो जाता है और नाकारों, भ्रष्टाचारियों का राष्ट्र बन जाता है।

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निश्चित ही वर्तमान सरकार के प्रयासों एवं नीतियों से प्रशासनिक क्षेत्र जागा है, सरकार में अब कर्मचारियों के कामकाज के नियमित मूल्यांकन पर भी विचार चल रहा है। इसी क्रम में प्रशासनिक अधिकारियों की दक्षता का विकास करने के लिए राष्ट्रीय सिविल सेवा क्षमता विकास कार्यक्रम, मिशन कर्मयोगी की शुरूआत की गई है। इसके तहत लोकसेवा के चयनित अधिकारियों को उनके कामकाज में दक्ष बनाने का प्रयास किया जाएगा। सरकार ने इसके लिए विभिन्न विदेशी विश्वविद्यालयों और संस्थानों के सहयोग से प्रशिक्षण कार्यक्रम की रूपरेखा तैयार की है। अब तक अधिकारियों का प्रशिक्षण और मूल्यांकन नियम आधारित था, अब उनके काम पर आधारित होगा। लेकिन अधिकारियों से अधिक कर्मचारियों को प्रशिक्षण देने एवं जबावदेह बनाने की जरूर है। असली भ्रष्टाचार की जड़ तो बाबू या आफिस का चपरासी होता है, उनको कौन चेतायेगा, कौन प्रशिक्षण देगा?


‘प्रशासनिक सुधार’ का अर्थ है कि प्रशासन में इस प्रकार के सुनियोजित परिवर्तन लाये जायें जिससे प्रशासनिक क्षमताओं में वृद्धि हो, किसी भी काम को करने की समयावधि हो, काम को अभी और इसी समय करने की मानसिकता हो, ऐसा होने से ही भ्रष्टाचारमुक्त प्रशासन की प्राप्ति की दिशा में अग्रसर होना सम्भव हो सकेगा। प्रशासनिक सुधार एक ऐसी प्रक्रिया है जो निरन्तर नियोजित तरीके से विकास मार्ग पर बढ़ती है। प्रशासनिक अधिकारियों, कर्मचारियों को लोकसेवक कहा जाता है। उनकी जिम्मेदारी है कि वे आम नागरिकों से नजदीकी बनाए रखकर उनकी समस्याओं को सुनें, समझें और उनके समाधान का प्रयास करें। पर हकीकत यह है कि प्रशासनिक अधिकारियों और आम नागरिकों के बीच फासला इतना बढ़ता गया है कि कोई साधारण आदमी उनके सामने खड़े होकर डर से अपनी बात तक नहीं कह पाता। जबकि सरकार तक जनता के पहुंचने का सबसे सुगम साधन प्रशासनिक अधिकारी ही होते हैं। अधिकारियों के जरिए ही लोकतंत्र जमीन पर उतरता है। पर अधिकारियों और जनता के बीच दूरी बढ़ने के कारण नीचे के कर्मचारियों की भी मनमानी बढ़ती गई है और छोटे-छोटे कामों के लिए भी रिश्वत का चलन बढ़ता गया है। यह एक स्वस्थ लोकतंत्र पर बदनुमा दाग कही जा सकती। इसलिए प्रशासनिक सुधार की मांग उठती रही है। अगर केंद्र सरकार की ताजा पहल से प्रशासनिक अधिकारियों और कर्मचारियों को कर्मयोगी के रूप में तैयार करने में मदद मिलती है तो यह बहुत बड़ा प्रशासनिक सुधार होगा।


हालांकि पहले भी सेवाकाल में अधिकारियों-कर्मचारियों को बदलती स्थितियों के मुताबिक प्रशिक्षण और कौशल विकास संबंधी अध्ययनों की सुविधाएं उपलब्ध थीं। जो अधिकारी चाहते थे और सरकार उन्हें उपयुक्त मानती थी, वे विशेष अध्ययन के लिए विदेश भी जाते थे। मगर प्रशासनिक कामकाज का ढर्रा नहीं बदल पाया तो इसलिए कि अधिकारियों का मानस भ्रष्ट, अकर्मण्य मानसिकता से बंधा हुआ है। अधिकारियों और जनता के बीच बनी हुई दूरी तभी मिट पाएगी, जब यह मानसिकता बदलेगी। ऐसे अनेक उदाहरण हैं, जब कहीं किसी अधिकारी ने आम लोगों से नजदीकी बनाकर काम किया तो उसके उल्लेखनीय नतीजे आए हैं। इसके अलावा प्रशासनिक अधिकारियों को राजनीतिक दबावों से मुक्त रखना होगा तभी उनमें कर्तव्यनिष्ठा का विकास संभव है। प्रशासनिक सुधार के लिए गठित समितियां इसे बार-बार रेखांकित कर चुकी हैं। इसलिए अधिकारियों-कर्मचारियों में कौशल विकास संभव है। प्रशासनिक सुधार के लिए और राजनीतिक दबाव से उन्हें मुक्त रखने की जरूरत पर भी विचार करना होगा। प्रशासनिक सुधार आयोग का कहना है कि राजनीतिक कार्यपालिका व स्थायी नौकरशाही के मध्य दायित्वों का सुस्पष्ट निर्धारण होना जनता के कल्याण व सुशासन की दृष्टि से अत्यंत आवश्यक है। ऐसे कर्मयोगी अर्जुनरूपी अधिकारियों एवं कर्मचारियों की जरूरत है जो अपने अदम्य साहस, कर्तव्यनिष्ठा, काम के प्रति जबावदेही, जनता की सेवा और संकल्प की बदौलत हमारे लिए धूप के टुकड़े बनें और काले ”सिस्टम“ में रोशनी देते रहे। अपने-अपने कुरुक्षेत्र में हर अर्जुन के सामने अपने ही लोग होते हैं जिनसे उन्हें लड़ना होता है। यह हर अर्जुन की नियति है।


-ललित गर्ग

(लेखक, पत्रकार, स्तंभकार)

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