क्या है Pax Silica? इसमें शामिल होकर भारत ने कैसे चीन को बेचैन कर दिया है?

By नीरज कुमार दुबे | Feb 20, 2026

भारत ने आज अमेरिका के नेतृत्व वाली पहल पैक्स सिलिका से औपचारिक रूप से जुड़ते हुए एक अहम रणनीतिक कदम उठाया। नई दिल्ली में आयोजित इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट 2026 के अवसर पर दोनों देशों ने पैक्स सिलिका डिक्लेरेशन पर हस्ताक्षर किए। इस घोषणा का उद्देश्य कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सेमीकंडक्टर और महत्वपूर्ण आपूर्ति श्रृंखलाओं के क्षेत्र में भरोसेमंद और लचीला सहयोग तंत्र विकसित करना है।

केंद्रीय सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने इस अवसर पर कहा कि भारत सेमीकंडक्टर और इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण में दीर्घकालिक चक्रवृद्धि विकास की दिशा में आगे बढ़ रहा है। उन्होंने कहा कि यदि यह सोच 1947 से निरंतर बनी रहती तो आज स्थिति अलग होती, लेकिन अब भी शुरुआत होने पर अगली पीढ़ियां इसका लाभ उठाएंगी।

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वैष्णव ने बताया कि भारतीय इंजीनियर उन्नत दो नैनोमीटर चिप डिजाइन पर काम कर रहे हैं। वैश्विक सेमीकंडक्टर उद्योग को लगभग दस लाख अतिरिक्त कुशल पेशेवरों की आवश्यकता होगी और भारत इस प्रतिभा आपूर्ति का प्रमुख केंद्र बन सकता है। छात्रों को विश्वस्तरीय चिप डिजाइन उपकरण निशुल्क उपलब्ध कराए जाने की बात भी उन्होंने कही।

इस अवसर पर बोलते हुए भारत में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने इसे वैश्विक प्रौद्योगिकी व्यवस्था में एक निर्णायक क्षण बताया। उन्होंने कहा कि भारत का संकल्प और आत्मनिर्भर मार्ग चुनने की इच्छा इस साझेदारी को विशिष्ट बनाती है। व्यापार समझौते से लेकर रक्षा और प्रौद्योगिकी सहयोग तक दोनों देशों के बीच असीम संभावनाएं हैं।

अमेरिका के आर्थिक मामलों के उप सचिव जैकब हेलबर्ग ने इसे भू राजनीतिक संदर्भ में रखा। उन्होंने कहा कि यह पहल हथियारबंद निर्भरता और दबाव आधारित आपूर्ति श्रृंखलाओं को अस्वीकार करने का संदेश है। उन्होंने कहा कि आर्थिक सुरक्षा को राष्ट्रीय सुरक्षा की तरह देखा जाना चाहिए।

हम आपको बता दें कि घोषणा पत्र में ऑस्ट्रेलिया, ग्रीस, इजरायल, जापान, कतर, दक्षिण कोरिया, सिंगापुर, यूएई और ब्रिटेन जैसे देशों के हस्ताक्षर हैं। कनाडा, नीदरलैंड, यूरोपीय संघ, ओईसीडी और ताइवान जैसे प्रतिभागी भी इस ढांचे से जुड़े हैं। यह पहल खनिज उत्खनन से लेकर चिप निर्माण और एआई तैनाती तक पूरी प्रौद्योगिकी श्रृंखला को सुरक्षित करने की परिकल्पना करती है।

हाल में दोनों देशों के बीच अंतरिम व्यापार समझौता भी संपन्न हुआ, जिसने पुराने मतभेदों को दूर कर आर्थिक एकीकरण की आधारशिला रखी। इससे पहले भारत ने वाशिंगटन में आयोजित क्रिटिकल मिनरल्स मिनिस्टीरियल में भाग लेते हुए आपूर्ति श्रृंखलाओं में जोखिम कम करने और अत्यधिक केंद्रीकरण से बचने पर जोर दिया था।

देखा जाए तो भारत का पैक्स सिलिका से जुड़ना सामरिक दृष्टि से दूरगामी महत्व का कदम है। आज विश्व व्यवस्था में प्रौद्योगिकी शक्ति ही वास्तविक शक्ति का आधार बन रही है। सेमीकंडक्टर, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और महत्वपूर्ण खनिजों पर नियंत्रण किसी भी राष्ट्र की आर्थिक और सैन्य क्षमता को प्रभावित करता है।

चीन और अमेरिका के बीच प्रौद्योगिकी प्रतिस्पर्धा ने वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं को खंडित किया है। ऐसे समय में भारत का एक भरोसेमंद, लोकतांत्रिक तकनीकी गठबंधन का हिस्सा बनना उसे रणनीतिक लाभ देता है। इससे भारत को उन्नत चिप निर्माण, डिजाइन क्षमता और एआई अनुसंधान में निवेश तथा प्रौद्योगिकी हस्तांतरण के अवसर मिल सकते हैं।

इसके सामरिक निहितार्थ भी स्पष्ट हैं क्योंकि रक्षा क्षेत्र में स्वदेशी प्रणालियों के लिए उन्नत चिप और एआई क्षमता अनिवार्य है। यदि भारत आपूर्ति श्रृंखला में विश्वसनीय भागीदार बनता है, तो उसे संवेदनशील प्रौद्योगिकी तक अधिक पहुंच मिल सकती है। इसके अलावा, महत्वपूर्ण खनिजों और सेमीकंडक्टर निर्माण में विविधीकरण से चीन पर निर्भरता कम करने की पश्चिमी रणनीति में भारत की भूमिका मजबूत होगी।

साथ ही, हिंद प्रशांत क्षेत्र में शक्ति संतुलन के संदर्भ में यह साझेदारी भारत को आर्थिक और तकनीकी आधार प्रदान करेगी, जिससे वह अपने सामरिक हितों की रक्षा कर सके। आर्थिक सुरक्षा को राष्ट्रीय सुरक्षा से जोड़ने की अमेरिकी सोच भारत के लिए भी प्रासंगिक है, क्योंकि आधुनिक युद्ध और भू राजनीति में डिजिटल अवसंरचना और डेटा केंद्र भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं जितने पारंपरिक सैन्य साधन।

हालांकि चुनौतियां भी कम नहीं हैं। सेमीकंडक्टर निर्माण अत्यधिक पूंजी और तकनीकी परिशुद्धता मांगता है। यदि भारत को वैश्विक नेतृत्व का लक्ष्य पाना है तो उसे नीतिगत स्थिरता, अनुसंधान निवेश और कौशल विकास पर निरंतर ध्यान देना होगा। साथ ही यह भी सुनिश्चित करना होगा कि वह किसी एक ध्रुव पर अत्यधिक निर्भर न हो।

बहरहाल, पैक्स सिलिका में भारत की भागीदारी एक अवसर है, जिससे वह 21वीं सदी की तकनीकी व्यवस्था में सक्रिय निर्माता की भूमिका निभा सकता है। यह कदम भारत को केवल बाजार नहीं, बल्कि मानक निर्धारक और आपूर्ति श्रृंखला के केंद्र के रूप में स्थापित करने की दिशा में है। यदि इस पहल को दीर्घकालिक रणनीति और घरेलू सुधारों के साथ जोड़ा गया, तो आने वाले दशकों में भारत की आर्थिक और सामरिक स्थिति कहीं अधिक सुदृढ़ हो सकती है।

नीरज कुमार दुबे

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