क्या है 132 साल पुराना विवाद? क्यों पाकिस्तान को मिटाने पर तुला है तालिबान

By अभिनय आकाश | Feb 28, 2026

जब दो की लड़ाई होती है तो तीसरा फायदा उठाता है और दक्षिण एशिया में इस समय जो हालात बन रहे हैं उसे देखकर कई एक्सपर्ट यही कह रहे हैं। पाकिस्तान और अफगानिस्तान की यह टकराव सिर्फ दो देशों की लड़ाई नहीं बल्कि इसके पीछे बड़ी बड़ी वैश्विक राजनीति छिपी हो सकती है। हाल ही में पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने सोशल मीडिया प्लेटफार्म एक्स पर एक पोस्ट करते हुए साफ कहा कि पाकिस्तान का सब्र अब खत्म हो चुका है और यह उनके शब्दों में खुली जंग है। उन्होंने आरोप लगाया कि तालिबान भारत का मोहरा बन चुका है। इस बयान ने पूरे क्षेत्र में बहस छेड़ दी है।

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हालांकि भारत ने हमेशा यही कहा है कि वो किसी भी संघर्ष या युद्ध का समर्थन नहीं करता है और क्षेत्र में शांति चाहता है। अफगानिस्तान में लंबे समय से भारत ने विकास परियोजनाएं, सड़क, बांध और शिक्षा से जुड़े काम किए हैं। इसलिए कुछ एक्सपर्ट मान रहे हैं कि अफगानिस्तान की राजनीति में भारत का प्रभाव रहा है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि भारत किसी युद्ध का हिस्सा है। दूसरी तरफ पाकिस्तान और तालिबान के बीच तनाव कोई नया नहीं है। पिछले कुछ सालों में पाकिस्तान को अपनी ही सीमाओं के अंदर कई आतंकी हमलों का सामना करना पड़ता है। कई रिपोर्ट में यह कहा गया है कि जिन संगठनों को कभी पाकिस्तान ने समर्थन दिया है वही आज उसके लिए चुनौती बन चुका है।

अब डूगिन ने अपने बयान में एक और दिलचस्प बात कही। उन्होंने इसे अमेरिका की अमेरिकी फर्स्ट नीति से जोड़ा और यह संकेत दिया कि अगर दक्षिण एशिया में बड़ा संघर्ष शुरू होता है तो इसका असर सीधे ब्रिक्स पर पड़ेगा क्योंकि इस संगठन में भारत और चीन दोनों ही प्रमुख सदस्य देश हैं। अगर किसी तरह भारत और चीन अलग-अलग उलझते हैं या क्षेत्र में अस्थिरता बढ़ती है तो इससे ब्रिक्स का आर्थिक और रणनीतिक एजेंडा प्रभावित हो सकता है। 

बड़े राजनीतिक खेल का हिस्सा

अंतरराष्ट्रीय राजनीति में अक्सर ऐसे बयान रणनीतिक संदेश देने के लिए भी दिए जाते हैं। इसलिए यह समझना जरूरी है कि हर बयान पूरी सच्चाई नहीं होता है बल्कि कई बार यह बड़े राजनीतिक खेल का हिस्सा भी हो सकता है। खैर, अब सवाल यह है कि क्या यह सच में अमेरिका की रणनीति है? जैसा कि डुगिन कह रहे हैं या यह सिर्फ क्षेत्रीय राजनीति और पुराने विवादों का नतीजा है? इसका जवाब तो आने वाले दिनों में ही साफ होगा, लेकिन इतना तो तय है कि दक्षिण एशिया की यह स्थिति सिर्फ दो देशों की लड़ाई नहीं रह गई है। बल्कि इसमें बड़ी शक्तियों के हित, वैश्विक गठबंधन और आने वाले समय की राजनीति भी जुड़ सकती है।

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नए संघर्ष की शुरुआत कैसे ?

पिछले हफ्ते 21-22 फरवरी की रात को पाकिस्तान ने अफगानिस्तान के सीमावर्ती इलाको में रात भर एयर स्ट्राइक कर 80 से ज्यादा तालिबान आतंकियों को मारने का दावा किया था। तालिबान ने तब कहा था कि इन हमलों में महिलाओ और बच्चों समेत 18 लोग मारे गए है। 

गजब लिल-हक क्या है?

इसका अर्थ होता है, इसाफ के लिए गुस्सा। पाकिस्तान का कहना है कि हम अफगानिस्तान की ओर से बेगुनाह लोगों पर किए गए हमले से गुस्सा है और उसके इसाफ के लिए ही युद्ध में उतरे है। इस तरह उसने अपनी भावनाओ को ही जग के लिए चले ऑपरेशन का यह नाम दिया है। पाकिस्तान का कहना है कि अफगानिस्तान ने सीमा से लगते इलाको जैसे चित्राल, खैबर, मोहमड, कुर्रम और बाजौर में हमले किए है। 

UN, ईरान, रूस, तुर्किये ने की अपील

पाकिस्तान और अफगान तालिबान के बीच जारी जग में ईरान ने मध्यस्थता की पेशकश की है। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अरागची ने सोशल मीडिया x पर कहा कि ईरान दोनों पक्षों के बीच बातचीत में मध्यस्थ की भूमिका निभाने को तैयार है। दोनों को अच्छे पड़ोसी की तरह मामले का हल बातचीत से निकालना चाहिए। यूएन महासचिव एटोनियो गुटेरेस ने दोनों देशों से अतरराष्ट्रीय कानून, विशेष रूप से अतरराष्ट्रीय मानवाधिकार कानून के तहत अपने दायित्वों का सख्ती से पालन करने का आग्रह किया। वही, मानवाधिकार प्रमुख वोल्कर तुर्क ने सीमा संघर्ष और घातक हवाई हमलों के बाद समस्याओं के समाधान के लिए अफगानिस्तान और पाकिस्तान से आपसी बातचीत की अपील की है। रूस, तुर्किये और चीन ने भी तुरत सघर्ष रोकने की बात कही है।

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