By नीरज कुमार दुबे | Apr 15, 2026
केंद्र सरकार ने लोक सभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए तैंतीस प्रतिशत आरक्षण को वर्ष 2029 के आम चुनाव से पहले लागू करने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल तेज कर दी है। इस उद्देश्य से एक व्यापक संवैधानिक संशोधन विधेयक का मसौदा तैयार किया गया है, जिसे 16 अप्रैल से आरंभ होने वाले संसद के विशेष सत्र में प्रस्तुत किए जाने की संभावना है। इस प्रस्ताव के केंद्र में लोक सभा की कुल सीटों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि का विचार है, ताकि महिलाओं के लिए निर्धारित एक तिहाई आरक्षण को प्रभावी रूप से लागू किया जा सके।
सरकार का कहना है कि यह कदम नारी शक्ति वंदन अधिनियम के क्रियान्वयन को तेज करने के लिए उठाया जा रहा है। वैसे वर्तमान व्यवस्था के अनुसार यह आरक्षण अगले परिसीमन और जनगणना के बाद ही लागू हो सकता था, जिससे इसकी शुरुआत 2034 के बाद होती। सरकार ने इस देरी को महिलाओं के साथ अन्याय बताते हुए तत्काल हस्तक्षेप की आवश्यकता पर बल दिया है। प्रस्ताव में यह भी स्पष्ट किया गया है कि महिलाओं के लिए आरक्षित सीटें राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में अलग अलग निर्वाचन क्षेत्रों में रोटेशन के आधार पर आवंटित की जाएंगी। इसी प्रकार राज्य विधानसभाओं और केंद्र शासित प्रदेशों की विधानसभाओं में भी लगभग 50 प्रतिशत तक सीटों में वृद्धि का प्रस्ताव है, ताकि वहां भी एक तिहाई आरक्षण लागू किया जा सके।
सरकारी सूत्रों के अनुसार लोक सभा में राज्यों की सीटों में लगभग पचास प्रतिशत की समान वृद्धि की योजना है। इससे कुल सीटें वर्तमान 543 से बढ़कर लगभग 815 या उससे अधिक हो सकती हैं। केंद्र शासित प्रदेशों की हिस्सेदारी भी बीस से बढ़कर 35 तक पहुंच सकती है। इस वृद्धि का उद्देश्य सभी राज्यों के प्रतिनिधित्व को संतुलित रखते हुए महिलाओं के लिए पर्याप्त सीटें सुनिश्चित करना है। हालांकि इस प्रस्ताव ने राजनीतिक बहस को भी तेज कर दिया है। विपक्षी दलों ने परिसीमन के आधार और प्रक्रिया को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं। विशेषकर दक्षिणी राज्यों के नेताओं ने आशंका जताई है कि जनसंख्या नियंत्रण में उनकी सफलता के कारण उनके प्रतिनिधित्व में कमी आ सकती है। उनका तर्क है कि यदि जनसंख्या के अनुपात को आधार बनाया गया तो जिन राज्यों की जनसंख्या तेजी से बढ़ी है, उन्हें अधिक लाभ मिलेगा, जबकि जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन किया है, वह नुकसान में रह सकते हैं।
हालांकि सरकार ने इन आशंकाओं को खारिज करते हुए कहा है कि सभी राज्यों की सीटों में समान रूप से लगभग पचास प्रतिशत वृद्धि की जाएगी, जिससे किसी भी राज्य का हिस्सा कम नहीं होगा। इसके साथ ही यह भी कहा गया है कि परिसीमन आयोग एक स्वतंत्र संवैधानिक संस्था है और उसे किसी प्रकार का निर्देश नहीं दिया जा सकता, इसलिए अंतिम निर्णय निष्पक्ष प्रक्रिया के तहत ही होगा।
हम आपको बता दें कि विधेयक के पारित होने के लिए संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत की आवश्यकता होगी। वर्तमान संख्या के आधार पर लोक सभा में लगभग 360 और राज्य सभा में 163 सदस्यों का समर्थन आवश्यक होगा। ऐसे में राजनीतिक सहमति इस प्रस्ताव की सफलता के लिए बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी स्पष्ट किया गया है कि प्रस्तावित बदलाव का असर राज्य सभा और विभिन्न राज्यों की विधान परिषदों पर नहीं पड़ेगा। इन सदनों की संरचना और सीटों की संख्या यथावत बनी रहेगी। यानी लोक सभा और राज्य विधानसभाओं में जहां सीटों की संख्या बढ़ाने की योजना है, वहीं राज्य सभा और विधान परिषदों को इस प्रक्रिया से बाहर रखा गया है, जिससे उनकी वर्तमान संरचना में कोई परिवर्तन नहीं होगा।
राजनीतिक समीकरणों पर नजर डालें तो विपक्षी दलों का संयुक्त आंकड़ा सरकार के लिए चुनौती खड़ी कर सकता है। प्रमुख विपक्षी दलों की संयुक्त ताकत लगभग 185 सीटों के आसपास बताई जा रही है, जो सरकार के प्रस्ताव को रोकने के लिए पर्याप्त हो सकती है, यदि वह एकजुट रहते हैं। हालांकि राज्य सभा में सरकार की स्थिति अपेक्षाकृत मजबूत बताई जा रही है। सरकार का तर्क है कि यह पहल न केवल महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी को बढ़ाएगी, बल्कि लोकतंत्र को और अधिक सशक्त और समावेशी बनाएगी। प्रधानमंत्री ने भी इस विषय पर जोर देते हुए कहा है कि इस दिशा में और देरी करना दुर्भाग्यपूर्ण होगा और इससे देश की महिलाओं के साथ अन्याय होगा। उनके अनुसार यदि 2029 का चुनाव महिलाओं के आरक्षण के साथ होता है तो भारतीय लोकतंत्र और अधिक जीवंत और मजबूत बनेगा।
इसके साथ ही यह भी संकेत दिया गया है कि परिसीमन की प्रक्रिया में 2011 की जनगणना के आंकड़ों का उपयोग किया जा सकता है, हालांकि आगामी जनगणना के आंकड़ों को भी शामिल करने का विकल्प खुला रखा गया है। इससे सरकार को लचीलापन मिलेगा और समयबद्ध तरीके से आरक्षण लागू करने में मदद मिलेगी।
देखा जाये तो यह प्रस्ताव देश की संसदीय संरचना में एक बड़े बदलाव का संकेत देता है। जहां एक ओर यह महिलाओं को व्यापक प्रतिनिधित्व देने की दिशा में ऐतिहासिक कदम माना जा रहा है, वहीं दूसरी ओर इसके राजनीतिक और क्षेत्रीय प्रभावों को लेकर गहन बहस जारी है। आने वाले दिनों में संसद के भीतर और बाहर इस मुद्दे पर व्यापक चर्चा और टकराव की संभावना है, जो इस विधेयक के अंतिम स्वरूप और भविष्य को तय करेगी।