जो लोग राम या राम मंदिर का विरोध करते हैं, उनकी नीयत क्या है?

By डॉ. आशीष वशिष्ठ | Jan 13, 2024

श्रीराम भारतीय संस्कृति की चेतना के प्राण तत्व है। संपूर्ण भारतीय संस्कृति में राम नाम की महत्ता की चर्चा पाई जाती है। भगवान श्री राम साधन नहीं साध्य हैं। श्रीराम को धर्म जाति देश और काल में सीमित नहीं किया जा सकता। श्रीराम ने समूची वसुधा को सत्य के मार्ग का अनुसरण करना सिखाया है। जीवन के प्राण तत्व राम हैं। भारतीय लोक जीवन में राम का महत्व सदियों से रहा है। श्रीराम कण-कण में व्याप्त है।

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सार्वकालिक और सार्वभौमिक हैं। श्रीराम के साथ रहना और उनके साथ चलना किसी दिव्य जीवन प्रवाह के साथ चलने जैसा है। उस दिव्य प्रवाह के साथ जो निरन्तर है, जिसमें हर क्षण नये-नये जल कणों का सम्मिलन होता रहता है, जिसका गन्तव्य वह महासागर है, जो असीम है, सीमाबद्धता जिसे अमान्य है। नित्य नयी लहर, नित्य नयी ऊर्जा के स्रोत हैं राम।

देश में एक ऐसा समूह भी है जो श्रीराम और राम मंदिर का विरोध करता है। इस समूह में राजनेता, राजनीतिक दल और तथाकथित बुद्धिजीवी शामिल है। इस समूह से अहम प्रश्न यह है कि जो लोग राम या राम मंदिर का विरोध करते हैं, उनकी नीयत क्या है? क्या वे अपनी स्थापनाओं के प्रति सचमुच ईमानदार हैं? क्या उनमें यह कहने का साहस है कि वे श्रीराम को पूर्णतः अस्वीकार करते हैं? क्या श्रीराम से जुड़ा जीवन दर्शन अराष्ट्रीय है?

भारत की पहचान का मूल तत्व राम नहीं तो और क्या है? यदि इन और इसी प्रकार के अन्य प्रश्नों का उत्तर वे नहीं देना चाहते, और यदि उत्तर देते भी हैं, तो हीलाहवाला करके देते हैं, तो यही कहना पड़ेगा कि वे सब डरे हुए लोग हैं, लोभी लोग हैं। केवल सत्ता के सौदागर हैं। लोकजीवन की मान्यताओं, राष्ट्रीय परम्पराओं और प्रेरणा पुरुषों से उन्हें कोई लेना-देना नहीं है।

इस खेमे के चरित्र का मर्म यह है कि यदि श्रीराम की भक्ति में वोट मिलताा होगा तो वे श्रीराम का एकमात्र भक्त होने की घोषणा कर देंगे और यदि श्रीराम को कोसने से सत्ता का समीकरण बनता दिखाई देता है तो श्रीराम को राष्ट्रघाती घोषित करने में उन्हें कोई संकोच नहीं होगा। आजादी के बाद से अब तक वे जिस गांधी के नाम की राजनीतिक हुण्डी भुनाते आए हैं, उसी गांधी रामराज्य और हिन्दू स्वराज्य का तिरस्कार भी इन्हीं लोगों ने किया है। वे लोहिया और जयप्रकाश के भक्त नहीं हैं। इनके लिए लोहिया, जयप्रकाश और नरेंद्र देव राजनीतिक जोड़ तोड़ का मसाला है।

भारत के इतिहास और पुराण में, भारत की आध्यात्मिक विचारधारा में और इसके जन-मन में राम जिस गहराई से रचे-बसे हैं, वह स्वयं ही इस बात का प्रमाण है कि राम के बिना भारत के अस्तित्व की भी कल्पना नहीं की जा सकती। राम राष्ट्र हैं, राष्ट्र के प्राण भी हैं। राम राज्य हैं और राज्य के आदर्श भी हैं। राम भारत के लोक हैं, उसकी मंगलकामना भी हैं, राम घट-घट व्यापी ईश्वर हैं तो राम अयोध्या में सशरीर प्रकट होने वाले रामलला भी हैं।

कई सहस्त्र वर्ष पूर्व, जब विश्व के अधिकांश हिस्सों में शासक सिर्फ विजेता थे, जो प्रायः बर्बर हुआ करते थे, उस समय राम ने मानवता, त्याग और न्याय की अनुकरणीय भावना का प्रदर्शन किया। उनका सम्मान  इसलिए नहीं किया जाता कि वह बाहरी दुनिया के विजेता थे, वह भीतरी जीवन के विजेता हैं, क्योंकि वह विपरीत परिस्थितियों में डगमगाते नहीं हैं। रावण को मारने के बाद भी उनकी आंखों में क्रोध नहीं दिखता, वह गिरे हुए रावण के शव के पास आते हैं और उन्हें जो कार्य करना पड़ा, उसके लिए पश्चाताप करते हैं। अपने जीवन की सारी चुनौतियों के बीच, वह कभी अपना संतुलन नहीं खोते, कभी मन में कड़वाहट या प्रतिशोध नहीं रखते। वह काफी हद तक छल-कपट या राजनीति से दूर रहते हैं और अपनी शक्ति के दुरुपयोग को लेकर बहुत सतर्क रहते हैं। समभाव रखने वाले राम समग्रता और आत्म-त्याग का जीवन जीते हुए एक उदाहरण प्रस्तुत करते हैं, वे अपनी प्रजा के लिए अपनी खुशी त्यागने के लिए तैयार हैं। सबसे बढ़कर, मुक्ति को महत्व देने वाली संस्कृति में वह नकारात्मकता, स्वार्थ और अधमता से ऊपर उठकर स्वतंत्रता के प्रतीक हैं।

सार यह है कि, राम नायक इसलिए नहीं हैं, क्योंकि उनका जीवन उत्तम है, बल्कि इसलिए हैं क्योंकि वह एक असाधारण जीवन जीते हैं। इसीलिए उन्हें मर्यादा पुरुष कहा जाता है। और यदि रामराज्य को एक आदर्श के रूप में रखा जाता है, तो इसलिए क्योंकि वह एक न्यायपूर्ण राज्य का प्रतीक है, तानाशाही का नहीं। आज हम भारत को वही बनाना चाहते हैं और इसीलिए रामायण आज भी लगातार प्रासंगिक बना हुआ है।

राम का चरित्र इस बात का प्रमाण है कि भारतीय समाज कभी जाति और रंग के आधार पर बंटा नहीं था। सम्पूर्ण समाज ही भाईचारे और बंधुत्व के प्रेम के ताने-बाने से बुना हुआ था। अन्यथा राम हनुमान, सुग्रीव, अंगद, नल-नील, जामवंत सरीखे वनवासियों के साथ एक या एकरस कभी नहीं होते।

श्रीराम पग-पग पर अपने कृत्यों से एकता और समरसता तथा अभेदता का संदेश दे रहे हैं। शबरी के जूठे बैर का राम के द्वारा खाया जाना राम के अभेद दृष्टि और समरसता के महाभाव का सबसे अद्भुत और श्रेष्ठ उदाहरण है। वास्तव में भारत की समृद्ध परंपरा और संस्कृति में भगवान श्रीराम निश्चय ही सामाजिक समरसता के सबसे बड़े प्रतीक हैं। भगवान राम के जीवन आदर्शों से काफी कुछ सीखने का वक्त है।

राम की स्वीकार्यता सदियों से रही क्योंकि वसुधैव कुटुंबकम की संकल्पना राम की परंपरा है। राम मर्यादा के शिरोमणि हैं। दुनिया की सभी अच्छी वस्तुओं के मानक राम हैं। सहजता सरलता ही राम है। राम के मतों का जागरण किए बिना स्वयं व्यक्ति कुछ नहीं कर सकता।

आज फिर वही श्रीराम अयोध्या में भारत की राजनीति के आदर्श रामराज्य की संकल्पना को साकार देखने के लिए अपने वैभव के साथ अपनी जन्मभूमि पर नवीन आभा के साथ पुनः विराजमान हो रहे हैं तो संपूर्ण मानवजाति के लिए भारत की ओर से नियति का यह संदेश सुना और सुनाया जाना ही चाहिए कि राम सभी के हैं, सभी जन राम के ही हैं। वह मर्यादा के आदर्श हैं, समन्वय के आधार हैं, जीव की सद्गति हैं, निरंतर सृजित होते और मिटते जीवन की वह चिर ध्वनि और संजीवनी हैं। अपने स्व में सदैव विराजमान राम रूपी अमृत को पाकर ही मानवता सदा के लिए संतुष्ट और सुखी हो सकती है, इसके सिवाय कोई रास्ता नहीं है। राम इस देश के सांस्कृतिक और आध्यात्मिक आदर्श हैं, क्योंकि वह स्थिरता, संतुलन, शांति, सत्य, पवित्रता, करुणा और न्याय के प्रतीक हैं। हम उन्हें इसलिए पूजते हैं क्योंकि उनमें एक महान सभ्यता के निर्माण के लिए जरूरी गुण समाए हैं।

राम से जुड़कर ही भारत अपना राष्ट्र सत्य प्राप्त कर सकता है। यह बात और है कि भारत का अपने राष्ट्र सत्य से जुड़ना कुछ ढोंगियों को भारी पड़ता है। उनका भविष्य गड़बड़ा जाता है। यही कारण है कि वे श्रीराम से ही नहीं, अपने आप से भी भयभीत हैं। इस देश को आज नहीं तो कल रामरूप में ही प्रकट होना है। श्रीराम इस सृष्टि की सनातन सत्ता हैं, वे चुनाव परिणामों और सत्ता राजनीति की जोड़ तोड़ के मोहताज नहीं हैं। जो राजनीति इस सनातन सत्ता से जुड़ेगी वही देश का प्रतिनिधि होगी, शेष सभी छल है और आत्म प्रवंचना है। श्रीराम की सुस्थापनाओं से जुड़े बिना देश को उसका अभीष्ट मिल पाना संभव नहीं है।

-आशीष वशिष्ठ

(लेखक वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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