By अभिनय आकाश | Aug 31, 2026
जिस लह नदी में पानी बढ़ने से बाढ़ आई वहां बहाव हो गया है। पानी रुकने से यहां 0.11 वर्ग किलोमीटर की एक झील बन गई है। इसका जलस्तर लगातार बढ़ रहा है। लहानदे नदी तिब्बत से निकलती है। नेपाल के रसुआ जिले में पहुंचती है जहां उसे नया नाम मिलता है भोटे कोसी। नेपाल में भोटे का मतलब है तिब्बती यानी तिब्बत की कोसी। ऊपर जिस झील के बनने की बात बताई गई वह जगह रसुआ से 18 कि.मी. ऊपर है। गोटे कोसी नोवाकोट नाम की जगह में त्रिशला नदी में मिल जाती है। यही त्रिशला नदी आगे बिहार के पश्चिमी चंपारण पहुंचती है। भैंसा लोटा बैराज से होते हुए और यहां इसे कहा जाता है गंडक या नारायणी। यानी तिब्बत से लेकर नेपाल और आगे भारत तक खतरा हो सकता है। तमाम आशंकाओं के मद्देनजर भोटे कोसी नदी के बहाव में नीचे की ओर रह रहे लोग, पर्यटक और बचाव अभियान में जुटे जो कर्मचारी हैं उन्हें खास सावधानी बरतने की जरूरत बताई गई।
27 मई को नेपाल की राजधानी काठमांडू में नेपाल और चीन के अधिकारियों की एक अहम बैठक हुई थी। नेपाल की तरफ से करीब 10 अधिकारी और चीन की तरफ से लगभग एक दर्जन अधिकारी इस बैठक में शामिल हुए। इनमें तिब्बत क्षेत्र से जुड़े अधिकारी भी थे। बैठक का मुद्दा था बाढ़, मौसम, ग्लेशियर और उससे जुड़े खतरों की निगरानी और आपदा के वक्त दोनों देशों के बीच सहयोग। इस बैठक में ग्लेशियर झीलों की सूची तैयार करने, खतरनाक इलाकों की मैपिंग करने और आपदा का जोखिम कम करने के लिए संयुक्त कदम उठाने की बात हुई। यानी दोनों देशों को पता था कि हिमालय इलाकों में ग्लेशियर और ग्लेशियर झीलें कितनी बड़ी चुनौती बन सकती हैं। लेकिन बैठक के बाद नेपाल के अधिकारियों को लगा कि उन्हें ग्लेशियर के खतरे और पानी के स्तर से जुड़ी उतनी जानकारी नहीं मिल रही जितनी वे चाहते थे। इस बैठक में मौजूद शख्स ने राउटर्स को बताया कि नेपाल चाहता था कि अगर उस इलाके में ग्लेशियर की हलचल या उसके आसपास कोई असामान्य गतिविधि दिखाई दे तो उसकी जानकारी थोड़ी पहले मिल जाए क्योंकि पहाड़ों में कुछ मिनट और कुछ घंटे का समय भी जिंदगी और मौत के बीच का अंतर बन सकता है।
नेपाल में हुई इस प्राकृतिक आपदा, इसके कारणों और मिनट-दर-मिनट घटनाक्रम को जानें
नेपाल के उत्तर में चीन और दक्षिण में भारत है। यह दुनिया की सबसे ऊंची पर्वत श्रृंखला, हिमालय का घर है, जहां विश्व की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट स्थित है। नेपाल में 3,000 से अधिक ग्लेशियर हैं, जो तेजी से पिघलने के प्रति बेहद संवेदनशील हैं। क दशक के अध्ययन से पता चलता है कि जिस याला ग्लेशियर (Yala Glacier) में यह हादसा हुआ, उसने उस दशक में लगभग 33 फीट जल-समतुल्य (water equivalent) बर्फ खो दी—यानी करीब तीन मंजिला इमारत के बराबर पानी। इसके साथ ही, नेपाल इस समय अपने इतिहास की सबसे भीषण गर्मियों में से एक का सामना कर रहा है।
ग्लेशियर के ढहने वाला क्षेत्र लगभग 1 मील (1.6 किमी) चौड़ा था। यह स्थान समुद्र तल से लगभग 16,700 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। रिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (USGS) ने ग्लेशियर ढहने का सटीक समय 10:52:10 दर्ज किया।
सर्दियों (जनवरी) में ताजा बर्फ की वजह से सतह का एल्बिडो अधिक रहता है, जिससे सूरज की किरणें अंतरिक्ष में वापस लौट जाती हैं और बर्फ कम पिघलती है। त्यधिक तापमान के कारण ऊपरी सफेद बर्फ पिघल गई और नीचे मौजूद मटमैला, भूरा और पत्थरों से भरा ग्लेशियर बाहर आ गया। इस गहरे रंग की सतह ने अधिक गर्मी सोखी, जिससे बर्फ पिघलने की प्रक्रिया अत्यंत तेज हो गई। ढलान, छोटे झटके (tremors), और जमने-पिघलने (thaw-freeze) के चक्र ने ग्लेशियर को संरचनात्मक रूप से कमजोर कर दिया।
ग्लेशियर के शीर्ष से नीचे नदी तक लगभग 3.4 मील की दूरी में 7,000 फीट की सीधी गिरावट है। यह रास्ता एक प्राकृतिक संकरे चैनल जैसा बना हुआ था। ब भारी मात्रा में बर्फ और चट्टानें नीचे गिरीं, तो घर्षण और अत्यधिक दबाव के कारण बर्फ तुरंत चूर्ण होकर पानी और मलबे में बदल गई। 300 फीट ऊंची मलबे की दीवार: संकरी घाटी में पानी और मलबे का स्तर तेजी से बढ़ा। हेलिकॉप्टर सर्वेक्षण के अनुसार, मलबे की रेखा की ऊंचाई लगभग 300 फीट तक पहुंच गई थी।
याला ग्लेशियर से चीन-नेपाल बॉर्डर चेकपॉइंट की दूरी करीब 13.4 मील है, जहां कुल ढलान 10,500 फीट का है। (इसकी तुलना में अमेरिका की मिसिसिपी नदी 1,700 मील में केवल 750 फीट नीचे उतरती है)। सीसीटीवी कैमरों के अनुसार, मलबे की लहर ठीक 10:59:50 पर चेकपॉइंट की इमारत से टकराई। ग्लेशियर ढहने के ठीक 7 मिनट 40 सेकंड बाद यह सैलाब सीमा चौकी तक पहुंच गया था।
भारत, नेपाल और हिमालय के लिए इससे क्या बड़ी सीख मिलती है?
भारत के गृह मंत्रालय और अंतरिक्ष एजेंसियों ने ग्लेशियर वाली झीलों और खतरों पर नज़र रखने के लिए जो मैपिंग की है, वह बहुत ज़रूरी है। इससे एक आधार (बेसलाइन) मिलता है। नेपाल के पास उतने संसाधन नहीं हैं, और हालाँकि कुछ मैपिंग की गई है, लेकिन वह उतनी व्यापक नहीं है। एक बार जब आपके पास वे मैप आ जाते हैं, तो आप खतरे वाले इलाकों की पहचान और मॉडलिंग शुरू कर सकते हैं। रिमोट सेंसिंग और सैटेलाइट से ली गई तस्वीरें इस त्रिकोण का एक हिस्सा हैं। दूसरा हिस्सा है फिक्स्ड स्टेशन नेटवर्क जैसे कि हाइड्रोमेट और सिस्मिक स्टेशन। तीसरा हिस्सा है स्थानीय स्तर पर निगरानी करना। आपको स्थानीय सरकारों, आपदा प्रबंधन अधिकारियों और कम्युनिटी डिज़ास्टर मैनेजमेंट कमेटियों को इसमें शामिल करना होगा। वे स्थानीय डेटा इकट्ठा कर सकते हैं, भूस्खलन की जानकारी दे सकते हैं और तूफ़ान के बाद होने वाले असर पर नज़र रख सकते हैं। आपको ऐसे लोगों की भी ज़रूरत है जो इन माहौल में पूरी तरह घुले-मिले हों। याक चराने वाले और मछुआरे नदियों, ग्लेशियरों और ग्लेशियल झीलों में होने वाले बदलावों को देख सकते हैं। कई मौकों पर याक चराने वालों ने ही सबसे पहले ग्लेशियल झीलों के बढ़ने की जानकारी दी है। बुज़ुर्गों से सुनी-सुनाई बातों (ओरल हिस्ट्री) से छोटे हिमस्खलन, ग्लेशियल-झील में बाढ़ और ऐसी दूसरी घटनाओं का पता चल सकता है जिन्हें विज्ञान ने रिकॉर्ड नहीं किया है; इससे संभावित हॉटस्पॉट की पहचान करने में मदद मिल सकती है।