By नीरज कुमार दुबे | Apr 08, 2026
पश्चिम एशिया में ईरान, इजराइल और अमेरिका के बीच चला युद्ध इक्कीसवीं सदी की युद्धकला का जीवंत प्रदर्शन रहा। यह युद्ध उस नई दुनिया का संकेत दे गया जहां लड़ाइयां केवल सीमा पर खड़े सैनिकों से नहीं, बल्कि तकनीक, गति, सूचना और मनोवैज्ञानिक दबाव से जीती या हारी जाएंगी। भारत के लिए यह युद्ध बहुत कुछ सीखने का अवसर दे रहा है क्योंकि हमारे पड़ोस में चीन और पाकिस्तान जैसे दो दुश्मन देश हैं।
लेकिन ईरान ने बिना विचलित हुए जिस तेजी से जवाब दिया, उसने यह साबित कर दिया कि आधुनिक युद्ध में प्रारंभिक बढ़त अंतिम जीत की गारंटी नहीं होती। ईरान ने सैकड़ों बैलिस्टिक मिसाइलों और ड्रोन का इस्तेमाल करते हुए जवाबी हमला किया। कई हमले सफल रहे और उन्होंने यह दिखाया कि सीमित संसाधनों वाला देश भी महाशक्तियों को चुनौती दे सकता है।
अगर सैन्य नुकसान की बात करें तो यह युद्ध दोनों पक्षों के लिए महंगा साबित हुआ है। अमेरिका और इजराइल को अपनी तकनीकी श्रेष्ठता के बावजूद नुकसान उठाना पड़ा है। उनके आधुनिक लड़ाकू विमान मार गिराये गये, सैन्य हेलिकॉप्टर और कई ड्रोन नष्ट हुए और शुरुआती चरण में मित्र देशों की गलती से भी कुछ विमान गिर गए। इजराइल के लिए सबसे बड़ी चुनौती उसके ड्रोन और इंटरसेप्टर सिस्टम की सीमाएं रहीं। उसके कई ड्रोन ईरानी वायु रक्षा प्रणाली के सामने टिक नहीं पाए।
दूसरी ओर, ईरान को भी भारी नुकसान झेलना पड़ा। उसके कई शीर्ष सैन्य नेता मारे गए, नौसेना के बड़े हिस्से को क्षति पहुंची और मिसाइल हमलों की क्षमता में कमी आई। लेकिन इसके बावजूद वह पूरी तरह टूट नहीं पाया। उसके कई मिसाइल लॉन्चर अभी भी सक्रिय हैं और वह लगातार हमले करने में सक्षम है। ट्रंप की सभ्यता समाप्त कर दूंगा वाली धमकी के सामने भी ईरान जिस तरह सीना तान कर खड़ा रहा वही इस युद्ध की सबसे महत्वपूर्ण सीख है कि पूर्ण विनाश अब भी एक कठिन लक्ष्य है।
रणनीतिक दृष्टि से देखें तो अमेरिका और इजराइल ने एक अत्यंत आक्रामक और तेज रणनीति अपनाई। उन्होंने युद्ध की शुरुआत ही इतनी तीव्रता से की कि दुश्मन को संभलने का मौका न मिले। साइबर हमलों के जरिए ईरान के संचार नेटवर्क को बाधित किया गया, जिससे उसकी प्रतिक्रिया क्षमता प्रभावित हुई। इसके बाद हवाई हमलों के माध्यम से लगातार दबाव बनाया गया और नेतृत्व को निशाना बनाया गया।
इसके विपरीत, ईरान ने लंबी लड़ाई की रणनीति अपनाई। उसने सीधे मुकाबले की बजाय धीरे धीरे थकाने वाली नीति अपनाई। उसने कम लागत वाले ड्रोन और मिसाइलों का इस्तेमाल कर बार-बार हमले किए, जिससे दुश्मन के महंगे रक्षा सिस्टम पर दबाव बना। यह रणनीति खासतौर पर प्रभावी रही क्योंकि हर इंटरसेप्टर मिसाइल की कीमत एक ड्रोन से कई गुना अधिक होती है। इस तरह ईरान ने आर्थिक और सैन्य दोनों मोर्चों पर संतुलन बनाने की कोशिश की।
इस युद्ध में इस्तेमाल हुए हथियारों का विश्लेषण करना भी बेहद जरूरी है। सबसे प्रभावी हथियारों में ड्रोन सबसे ऊपर रहे। कम लागत, अधिक संख्या और लगातार हमले करने की क्षमता ने उन्हें निर्णायक बना दिया। बैलिस्टिक मिसाइलों ने भी भारी नुकसान पहुंचाया और मनोवैज्ञानिक दबाव बनाया। साइबर हमले एक और महत्वपूर्ण हथियार साबित हुए, जिन्होंने बिना सीधे युद्ध के दुश्मन की क्षमता को कमजोर किया।
इसके विपरीत, कुछ हथियार अपेक्षित परिणाम नहीं दे पाए। महंगे इंटरसेप्टर सिस्टम की सीमाएं भी सामने आईं। जब बड़ी संख्या में सस्ते ड्रोन और मिसाइलें एक साथ आती हैं, तो इन सिस्टमों पर भारी दबाव पड़ता है और उनकी लागत युद्ध को महंगा बना देती है। इसी तरह केवल हवाई वर्चस्व हासिल कर लेना भी निर्णायक साबित नहीं हुआ, क्योंकि जमीन पर और अन्य क्षेत्रों में युद्ध जारी रहा।
इस पूरे संघर्ष से भारत के लिए जो सबसे बड़ा सबक निकलता है, वह यह है कि भविष्य का युद्ध बहुस्तरीय होगा। भारत पहले ही पारंपरिक युद्ध की तैयारी से आगे बढ़ चुका है। पाकिस्तान और चीन जैसे पड़ोसियों के साथ तनावपूर्ण संबंधों को देखते हुए यह वैसे भी जरूरी था। भारत को ईरान युद्ध से सबक लेते हुए जो कदम तत्काल उठाने चाहिए, यदि उनका जिक्र करें तो सबसे पहला बदलाव ड्रोन युद्ध क्षमता में होना चाहिए। भारत को बड़ी संख्या में सस्ते और प्रभावी ड्रोन विकसित करने होंगे। झुंड आधारित ड्रोन तकनीक, जहां सैकड़ों ड्रोन एक साथ हमला करते हैं, वह भविष्य की लड़ाई का अहम हिस्सा बनने जा रही है। अगर भारत इस क्षेत्र में पीछे रह गया, तो भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है।
दूसरा महत्वपूर्ण क्षेत्र मिसाइल रणनीति का है। केवल रक्षा प्रणाली पर निर्भर रहना अब पर्याप्त नहीं है। भारत को दुश्मन के लॉन्चर और ठिकानों को नष्ट करने की आक्रामक क्षमता विकसित करनी होगी। युद्ध में सबसे अच्छा बचाव कई बार आक्रमण ही होता है। एक अन्य महत्वपूर्ण क्षेत्र साइबर युद्ध का है। आने वाले समय में बिजली, बैंकिंग, संचार और रक्षा प्रणाली सब साइबर हमलों के दायरे में होंगे। भारत को न केवल अपनी सुरक्षा मजबूत करनी होगी, बल्कि आक्रामक साइबर क्षमता भी विकसित करनी होगी। एक और सबक लंबी लड़ाई की तैयारी का है। ईरान ने यह साबित कर दिया कि कमजोर देश भी लंबी लड़ाई लड़ सकता है। भारत को अपने गोला बारूद, ईंधन और संसाधनों का पर्याप्त भंडारण करना होगा। साथ ही घरेलू उत्पादन क्षमता को बढ़ाना होगा ताकि युद्ध के दौरान बाहरी निर्भरता कम हो। वैसे भारत ने हाल में सर्जिकल स्ट्राइक, एअर स्ट्राइक और ऑपरेशन सिंदूर जैसे अभियानों के जरिये दुनिया को यही संदेश दिया है कि दुश्मन को सबक सिखाने के लिए लक्षित कार्रवाई ही पर्याप्त है। पूर्ण युद्ध की अवस्था में जाना सबके लिए नुकसानदेह है। चार साल से लड़ाई लड़ रहा रूस अब तक यूक्रेन को परास्त नहीं कर पाया है और 40 दिन से ज्यादा समय से ईरान से मिलकर लड़ रहे अमेरिका तथा इजराइल अब तक पूरी तरह अपने मंसूबों में कामयाब नहीं हो पाये हैं।
इसके अलावा, भारत को ईरान युद्ध से जो सबक सीखना चाहिए उनमें एक अहम पहलू नेतृत्व और कमान संरचना की सुरक्षा का है। आधुनिक युद्ध में नेतृत्व को निशाना बनाना एक आम रणनीति बनती जा रही है। इसलिए अपने सैन्य और राजनीतिक नेतृत्व की सुरक्षा के साथ-साथ दुश्मन के नेतृत्व पर सटीक हमला करने की क्षमता विकसित करनी होगी। एक और बेहद महत्वपूर्ण मुद्दा दो मोर्चों पर युद्ध की तैयारी का है। भारत को यह मानकर चलना होगा कि भविष्य में उसे एक साथ चीन और पाकिस्तान दोनों का सामना करना पड़ सकता है। इसके लिए संयुक्त रणनीति, बेहतर समन्वय और संसाधनों का सही उपयोग आवश्यक होगा।
बहरहाल, देखा जाये तो इस युद्ध ने यह स्पष्ट कर दिया है कि आधुनिक युद्ध केवल हथियारों का नहीं, बल्कि सोच का भी होता है। जो देश तेजी से बदलते हालात के अनुसार खुद को ढाल लेगा, वही विजेता बनेगा। भारत के पास संसाधन, जनशक्ति और क्षमता है, लेकिन उसे अपनी रणनीतिक सोच में और तेजी तथा आक्रामकता लानी होगी।