Gyan Ganga: जब लंका नगरी आग की भयंकर लपटों से घिरी हुई थी तो वहां के वासी क्या कर रहे थे?

By सुखी भारती | Jun 07, 2022

लंका नगरी को धू-धू कर जलता देख कर पूरी लंका वासियों के, भविष्य के भावी सुंदर स्वप्न भी अग्नि के साथ ही राख हो रहे थे। किसे पता था कि विश्व की सबसे सुरक्षित स्थलि कही जाने वाली लंका नगरी, एक दिवस एक साधारण से दिखने वाले ‘असाधारण वानर’ की चपेट में आकर मृतपरायण हो जायेगी। रावण की शान व सम्मान कही जाने वाली, इस लंका नगरी को बचाने के लिए, त्रिदेवों में से भी कोई यहाँ प्रकट नहीं हो रहा था। भगवान विष्णु जी अगर नहीं पहुँचे, तो इसका कारण समझ में आ रहा है। कारण कि श्रीराम जी तो थे ही श्रीविष्णु जी का अवतार। और मूर्ख रावण ने उन्हीं की धर्म पत्नी, श्रीसीता जी का अपहरण करके, श्रीविष्णु जी के सहायतार्थ हेतु पहुँचने के सारे मार्ग बंद कर लिए थे। ब्रह्मा जी भी अधिक प्रसन्न नहीं थे। क्योंकि मेघनाद ने उनके अस्त्र अर्थात ‘ब्रह्मास्त्र’ कर प्रयोग, ऐसे महान पात्र को बाँधने के लिए किया, जो स्वयं भगवान शंकर जी के अवतार हैं। ऐसे में उनका भी सहायता हेतु न आना समझ आता है। लेकिन भगवान शंकर तो रावण के साक्षात गुरु हैं। वे तो रावण की सहायता के लिए आने ही चाहिए थे। लेकिन भगवान शंकर नहीं आये। उल्टा वे तो पूर्णतः ही मौन से प्रतीत हो रहे हैं। लेकिन सज्जनों, यह सब तो रावण के दृष्टिकोण से विवेचना थी। लेकिन क्या भगवान शंकर सचमुच ही लंका में नहीं पधारे थे? सजगता से चिंतन करें! क्योंकि यह जो लंका नगरी धू-धू कर जल रही है, यह कोई भगवान शंकर जी के बिना पधारे ही थोड़ी न जल रही है। विध्वँस का कार्य तो आदि काल से ही भगवान शंकर जी का माना गया है। तो भला फिर वे दृश्यमान क्यों नहीं हो रहे? सज्जनों, वे तो समस्त ओर दृष्टिपात हो रहे हैं। आप देख क्यों नहीं रहे? जी हाँ! श्रीहनुमान जी साक्षात शंकर जी ही तो हैं। और आप जानते हैं, कि वे रावण के गुरु भी ठहरे। गुरु भले ही किसी भी रूप में क्यों न हों। शिष्य का सदैव भला ही करता है। लेकिन लंका के संदर्भ में ऐसा क्यों नहीं हो रहा। श्रीहनुमान जी का रावण के गुरु होने के नाते, रावण के धन, मान व वैभव की रक्षा तो करनी ही चाहिए थी। लेकिन श्रीहनुमान जी तो संपूर्ण लंका के विनाश पर उतारू हैं। वे रावण के प्रति रक्षा भाव में क्यों नहीं आ रहे। तो इसका उत्तर यही है, कि गुरु कभी भी अपने शिष्य को वह वस्तु अथवा गुण प्रदान नहीं करता, जो उसके पतन का कारण बनता हो। भगवान शंकर तो चाहते थे, कि लंका नगरी का प्रत्येक व्यक्ति स्वर्ण की भांति ही, अपने व्यक्तित्व को भी चमकाये। लेकिन लंका नगरी की जब प्रत्येक इकाई ही कोयले की मानिंद काली हो उठे, तो ऐसे में तो, ऐसी सौगात को ही विनिष्ट कर देना चाहिए। निश्चित ही, इसीलिए ही भगवान शंकर जी, श्रीहनुमान जी के अवतार में प्रकट हो, लंका का दहन कर रहे हैं।

‘तात मातु हा सुनिअ पुकारा।

एहिं अवसर को हमहि उबारा।।

हम जो कहा यह कपि नहिं होई।

बानर रुप धरें सुर कोई।।’

सज्जनों, समाज में आपने भी ऐसी बातें करते हुए, कईयों को सुना होगा। अक्सर बड़े पैमाने पर सार्वजनिक हानि होने पर वे ऐसे ही दावे करते हैं, कि हमें तो पहले ही यह ज्ञान था, कि यह ऐसे ही होने वाला है। लेकिन हमारी सुनता कौन है। इसलिए भईया हम तो चुप ही रहे। लेकिन देखो अब सब पीड़ित हो रहे हैं। हमें क्या है, भुगतो फिर अब। लंका में ऐसे ज्ञानियों की गिनती अग्नि की लपटों की भांति बढ़ती ही जा रही है। जबकि ऐसे बयानकर्ता लगभग वही हैं, जो कि श्रीहनुमान जी की पूँछ को अग्नि दाह करने में सबसे आगे थे। उन्हें भीतर ही भीतर यह लग रहा था, कि शायद उनके ऐसे दावे सुन कर श्रीहनुमान जी हमें दण्डित नहीं करेंगे। लेकिन ऐसे भला कैसे हो सकता था? जब दलाली ही कोयले की हो, और चाहें, कि हमारा मुख काला न हो? तो भला ऐसा कैसे हो सकता था। सभी बयानकर्ता ढंग से और बड़े भयंकर जले। जिन्हें लगता था, कि चलो हम बच रहे हैं, देखा कि अग्नि की लपटें वहीं पहुँच रहीं थी। एक और भी आश्चर्य घट रहा था, जो कि अभी तक हमने पकड़ा ही नहीं था। वह यह, कि संसार में कहीं भी स्वर्ण धातु हो, वह अग्नि के स्पर्श में आकर, अपनी चमक को ओर अधिक बिखरने लगता है। लेकिन एक लंका का ही ऐसा स्वर्ण है, जो अपनी चमक नहीं बिखेर रहा, अपितु काला पड़ रहा है, और राख हो रहा है। किसी को कोई कारण समझ नहीं आ रहा। सब अपनी-अपनी दौड़ा रहे हैं। खुलकर कोई कुछ नहीं कह पा रहा है, कि आखिर इतनी भयंकर सुरक्षित स्थली, इतनी भयंकर अग्नि के क्रोध से कैसे ग्रसित हो गई। किसी के पास कोई ठोस उत्तर नहीं था। लेकिन गोस्वामी तुलसीदास जी, भगवान शंकर जी के माध्यम से लंका नगरी के इस भयंकर विनाश का वास्तविक कारण बता रहे हैं। क्या कह रहे हैं भगवान शंकर, जानेंगे अगले अंक में---(क्रमशः)---जय श्रीराम।

-सुखी भारती

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