जब ज़िंदगी में एटीएम आयो (व्यंग्य)

By संतोष उत्सुक | Aug 24, 2021

अब जबकि एटीएम मशीन को ही उखाड़ अपनी गाड़ी में डाल कर घर ले जाने जैसी बैंकिंग शुरू कर ली गई है बैंकिंग के पुराने किस्से बहुत याद आते हैं। किसी ज़माने में लोग बैंकों पर विश्वास नहीं करते थे। एक बार ऐसा हुआ खाते में पैसे जमा करवाने के कुछ दिन बाद पैसे निकालने आए एक बुजुर्ग ने दिए गए नोट लौटाते हुए कहा मैंने यह नोट जमा नहीं करवाए वही नोट दो जो मैंने उस दिन दिए थे। बड़ी मुश्किल से उन्हें समझाया कि इन नोटों की कीमत भी उतनी ही है। अपरिचित व्यक्तियों को इदेन्तिफ़्य करवाने ताकि भुगतान सही व्यक्ति को जाए एक व्यक्ति ने चैक के पीछे लिखा मैं राम प्रसाद को जानता हूं इसके पिता कृष्ण लाल को भी बचपन से जानता हूं

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शुरू में जब एटीएम सुविधा शुरू हुई तो पैसे जमा करवाने की सुविधा थी। शुरू में ठीक रहा फिर हमारे भार्ई लोगों ने फटे पुराने, टुकड़े टुकड़े या फिर नकली नोट भी रखने शरू कर दिए तो सुविधा परेशान हो गई । कार्ड डालो पैसा निकालो, शुरू में डर सा लगा रहता। लोग एटीएम कार्ड बनवाने में हिचकिचाते अब कार्ड क्लोन करना पुरानी बात हो गई है। पहले कोई पासवर्ड भूल जाता, किसी को दरवाज़ा खोलना नहीं आता तो कई बंदे लॉक ओपन करना भूल अंदर ही बंद हो गए। उन्हें बाहर निकलने जाना पड़ता।  नोट उठाने में देर होती तो नोट वापिस मशीन में। 


खैर रामसिंह, नीलेराम, यहलाल, वहकुमार यहां तक कि इसने और उसने भी एटीएम कार्ड जारी करवा लिए। वहकुमार पैसे निकालने गए तो भूल कर उलझ गए। हाथ आपस में रगड़ कर अंगुलियों में थूक लगाकर टच स्क्रीन को छुआ मगर कोई हरकत नहीं हुई। आठ दस बार कार्ड उल्टा सीधा डाला मगर नहीं। दोनों हाथ जोड़ कर निवेदन किया मगर बात नहीं बनी तो परेशान, बैंक वालों को  गालियां देते बाहर निकले।


नीलेराम बाइक की तरह आए और अंदर घुस गए, पैग अंदर, देर रात, गरमी खूब। अंदर मौसम कूलकूल रहा,सब भूल कर सुस्ताते, नींद आ गई। लाईट गई, नींद टूटी और नशा भी। भूल गए बाहर कैसे निकलें, पहलवानी लात जमाई शीशा तोड़ कर आज़ाद हुए। जूता सेफ रहा मगर लात जख्मी हुई। डाक्टर के चक्कर में आना पडा। अख़बार वालों को ब्रेकिंग न्यूज़ मिल गई, टूटे शीशे की फोटो छपी।

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रामसिंह को बताया था कि एटीएम कक्ष में एक समय में एक ही ग्राहक को जाना चाहिए। पत्नी का कार्ड आया तो जाना ही था आजमाने। पत्नी बोली अंदर अकेली जाएंगी,गई, रामसिंह बाहर से बताने लगे, ऐसे कर वैसे कर। ऐसे कैसे बनती बात, दूसरे ग्राहक ने कहा तब अंदर गए। आराम देवी अपनी पोती के साथ एटीएम कार्ड लेकर आई तो बोली बिटिया वैसे अच्छे वाले नोट ही निकालना जो उस दिन तुम्हारे दादा ने दिए थे और मैंने बैंक में जमा करवाए थे। हरकुछकरू पैसे लेने गए तो कैश खत्म था, चिट निकली ‘सौरी, अनेबल टू प्रोसेस’। किसी ने हिन्दी में समझाया तो कहने लगा, कुछ ले दे के करा ले यार। अभी बस पकड़नी है जेब में किराया भी नहीं है।


लोगों को एटीएम अच्छा लगने लगा, ‘ऑल टाइम मैजिक’ , एक दोस्त हमेशा हाज़िर। बैंक वाले एटीएम में कभी कैश खत्म होने की नौबत कम ही आने देते । एक दिन आया बहुत ज़्यादा प्रयोग के कारण एटीएम के बाहर लगा लॉक खराब हो गया। गरीबदास के पास एटीएम से निकालने को कुछ था नहीं, सो वह कभी कभार देर रात एसी में सपने देखने वहीं घुस जाता और नींद उसे आगोश में ले लेती। कितनी बार समझदार लोग भी शायद गर्मी के मारे वहां पाए गए कुछ वर्दी में कुछ आपे से बाहर। नए ‘भाई’ प्लान बनाने लगे एटीएम को अगवा कैसे करें। पहले औजारों से तोड़फोड़ कर पैसे निकालने की कोशिश करते थे अब मशीन ही घर ले जाते हैं। इंसान की सुविधाएं बढाते रहो तो वह ज़्यादा बिगड़ता जाता है।


- संतोष उत्सुक

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