Gyan Ganga: जब प्रभु की गोद पाकर बालि का हृदय भी भक्तिभाव से भर गया

By सुखी भारती | May 11, 2021

महान आश्चर्य कि बालि ने श्रीराम जी के दिव्य दर्शन क्या किए वह तो महान ज्ञानी बन गया। ऐसा ज्ञानी कि विश्वास नहीं हो रहा, कि क्या बालि वही व्यक्ति है, जिसने कुछ ही क्षण पहले श्रीराम जी की इस प्रकार से अवमानना की थी। बालि का यूँ पलक झपकते से बदल जाना, हमारे मन-मस्तिष्क में जिज्ञासा उत्पन्न करता होगा कि आखिर ऐसे भी कोई आमूल-चूल परिर्वतित हो सकता है क्या? सज्जनों निश्चित ही इसका उत्तर ‘हाँ’ ही है। माना कि संसार में हमने किसी काले कौवे को हंस की तरह उजला होते नहीं देखा होगा। लेकिन अध्यात्म विषय ही ऐसा है कि प्रभु की कृपा हो जाये, तो प्रभु रास्ते में पड़े किसी भी कंकर को शंकर बना सकते हैं। गुरुबाणी में महापुरुष बयाँ करते हैं-

जा तिसु भावै नानका कागहु हंसु करेइ।।

प्रभु का तो दरबार ही निराला है। जब प्रभु हिसाब करने पे आते हैं तो पाई-पाई का हिसाब करते हैं। लेकिन जब दयालु होते हैं तो समस्त लेखों को ही फाड़ देते हैं। धर्मराज भी बगलें झाँकने लगता है कि मैं अब इस जीवात्मा का क्या हिसाब-किताब करूँ। क्योंकि जब सबूत ही फट गये तो सजा का तो प्रावधान ही समाप्त हो जाता है। देखा जाये तो गिद्ध पक्षी की भी कोई जाति होती है क्या? पक्षियों में अगर कोई महा अधम पक्षी होता है तो वह गिद्ध ही होता है। उड़ान उसकी इतनी ऊँची होती है कि आसमाँ में उड़ता वह विशालकाय गिद्ध बिल्कुल नन्हीं-सी चिड़िया प्रतीत होता है। ऐसा भी नहीं कि गिद्ध की उड़ान कोई दो चार घंटे की हो। गिद्ध अपने आप में एक ऐसा अनोखा पक्षी है जो एक बार उड़ान भरने के पश्चात महीनों-महीनों आसमाँ में बिता देता है। परन्तु ऐसी विलक्षण उड़ान होने के पश्चात् भी उसकी दृष्टि मृतक जीवों पर ही होती है। ऐसी तीक्षण दृष्टि भी पाई और उस दृष्टि में तलाश भी की तो किसकी? प्रभु की नहीं, अपितु दुर्गंध मारते मृत प्राणियों की। हम कभी कल्पना भी नहीं कर सकते कि एक गिद्ध भी सम्मान का पात्र हो सकता है। लेकिन प्रभु की दरियादिली तो देखिये, श्रीराम जी ने अपने पिता को वह अधिकार नहीं दिया जो एक गिद्ध को दे दिया। आप सोच रहे होंगे कि वह कैसे? दरअसल जब राजा दशरथ जी की मृत्यु हुई तो श्रीराम जी को निश्चित् ही अपने पिता जी के अंतिम संस्कार में पहुंचना चाहिए था। मर्यादा पुरुषोत्तम होने के नाते उनका यह करना प्रासंगिक भी था। लेकिन प्रेम की रीति देखिए, प्रभु अपने पिता होने का सम्मान व पद एक गिद्ध को देते हैं। श्रीगिद्धराज जटायु जब प्रभु सेवा में अपने प्राणों की बाज़ी लगा देते हैं, तो प्रभु पिता की भाँति ही गिद्धराज जटायु जी का अंतिम संस्कार करते हैं।

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कहने का तात्पर्य कि हमारा जन्म व कर्म भले ही कितना ही नीच क्यों ना हो, लेकिन अगर जीवन में, हमारे किसी कर्म से प्रभु रीझ गये, तो समझ लीजिए कि बिना प्रयास के ही बेड़ा पार है। और बालि के साथ भी कुछ यही होने जा रहा था। वह बालि जिसके सिर पर सदैव अहंकार का ही छत्र झूला। आज वहाँ प्रभु का हाथ टिक चुका था। उसके शीश अहंकार का छत्र नहीं अपितु करतार का छत्र झूल रहा था। प्रभु ऐसे मोम हृदय हैं कि रोते ही जा रहे हैं। कहने को तो बाण बालि को लगा है लेकिन पीड़ा से श्रीराम जी व्याकुल हो रहे हैं। प्रभु ने बालि का सिर उठाकर अपनी गोद में रख लिया। अपने पावन हस्त कमलों से प्रभु बालि का शीश सहला रहे हैं। मानो केवल शीश ही न सहला रहे हों अपितु सिर से समस्त पाप कर्मों की गठड़ी भी उतार रहे हों।

बालि प्रभु को बड़े प्यार से निहार रहा है। मानो कहना चाह रहा हो कि प्रभु आप भी कैसी बातें कर रहे हो। आप उस तन की रक्षा करने की बात कर रहे हो जिस तन से मैंने अनेकों अपराध किए। जिस तन को पाकर मैं पापों की दलदल में ऐसा धंसा कि आज तक निकल ही नहीं पाया, क्या मैं अब भी इस अधम तन के प्रति आकृष्ट रहुँ? किसी कुटिया में साक्षात सूर्यदेव का आगमन हो जाये और तब भी कोई अंधकार का पुजारी बना रहे तो उसके महाअभाग नहीं तो और क्या कहेंगे? प्रभु मैं तब तक ही अज्ञानी था, जब तक आपका बाण मेरी छाती में नहीं लगा था। क्योंकि पाप अधर्म से एकत्रित अन्न व धन से सृजित रक़्त ने ही मेरी बुद्धि नाश किया हुआ था। लेकिन आपके बाण ने मेरा वह समस्त मलिन रक़्त नस नाड़ियों से बाहर निकाल दिया है। अब रक़्त नहीं अपितु आप मेरी नाड़ियों व रोम-रोम में बसे हो। मेरी प्रत्येक धड़कन के आप ही स्वामी हो। इसलिए मुझे इस नश्वर तन को सहेजने में कुछ भी सार नहीं लगता। बात रखने की ही है, तो फिर आप को ही मैं हृदय में क्यों न रखूँ। जिसे हृदय में रखने में परमानंद की अनुभूति हो, आठों पहर उत्सव हो और जीर्ण-शीर्ण भाग्य चमक उठे, भला उसे मैं क्यों न धारण करूँ। प्रभु मैंने देखा है कि बड़े-बड़े ऋषि मुनि जन्मों-जन्मों तक कठिन तपस्या व योग साधते हैं, मंत्र-तंत्र में पारंगत होते हैं। रह-रहकर बस यही प्रयास रहता है कि अंत समय में ईश्वर का ध्यान आ जाये। परन्तु तब भी उनके हाथ केवल असफलता ही लगती है। आपकी मनमोहक छवि उनकी आँखों के समक्ष नहीं उभर पाती- 

‘जन्म जन्म मुनि जतन कराहीं।

अंत राम कहि आवत नाहीं।।’

इधर मेरा भाग्य देखिए, कि बिना प्रयास के ही इस विकट काल में आप मेरे समक्ष हो, और ऐसे में आप में से ध्यान हटाकर, मैं तन की रक्षा में व्यस्त हो जाऊँ। यह तो बिल्कुल वैसे हुआ जैसे कोई मूर्ख व्यक्ति कल्पवृक्ष को काटकर उसकी बाड़ बना ले और उससे बबूल के पेड़ की रक्षा करे।

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‘मोहि जानि अति अभिमान बस प्रभु कहेउ राखु सरीरही।

अस कवन सठ हठि काटि सुरतः बारि करिहि बबूरही।।’

प्रभु मुझे अभिमान वश जानकर ही आपने यह कहा था, न कि मैं शरीर की रक्षा करूँ, लेकिन सुन लीजिए अब मैं मूर्ख नहीं हूँ। हो चुकी जितनी मूर्खता होनी थी। अब मुझे घाटे का सौदा नहीं करना। कयोंकि अब मैं संसार का बालि नहीं अपितु आपका बालि हूं। 

आगे श्रीराम जी और बालि की क्या चर्चा होती है, जानेंगे अगले अंक में---क्रमशः

-जय श्रीराम

- सुखी भारती

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