आखिर नफरत भरे भाषण पर कब सजग और सक्रिय होंगे हमारे हुक्मरान? यक्ष प्रश्न

By कमलेश पांडे | Mar 21, 2026

नफरत भरे भाषण, किसी भी सभ्य समाज के लिए वैचारिक कैंसर और सामाजिक एड्स के जैसा जानलेवा है, लेकिन दुनियावी तर्ज पर भारतीय लोकतंत्र में भी यह एक बुनियादी राजनीतिक-सामाजिक फैशन बनता प्रतीत हो रहा है। कोढ़ में खाज यह कि 'बहुमत की भूखी' संसद और उसके 'इशारे पर कुछ कुछ फैसले लेने के आदी बन चुके' सुप्रीम कोर्ट ने आजादी के 8वें दशक में भी विषाक्त बयानबाजियों के खिलाफ कोई कड़ा राष्ट्रवादी स्टैंड नहीं लिया ताकि राष्ट्रीय एकता व अखंडता पर अनवरत रूप से जारी साम्राज्यवादी वैचारिक हमले की धार कुंद की जा सके!

ऐसा इसलिए कि इनकी भी अपनी विवशता है! चूंकि पद और गोपनीयता की शपथ लेने वाले अधिकार संपन्न लोग ब्रितानी नौकरशाही और राजशाही के इशारे पर बने "भारतीय संविधान" को मानने को अभिशप्त हैं और अपनी व्यवहारिक और मौलिक सोच को ताखे पर रख चुके हैं, इसलिए हर जनतांत्रिक बीमारी लाइलाज हो चुकी है और भारत माता अपनी ही संतानों को निरंतर मुखाग्नि देते देते थककर बूढ़ी हो चली है। 

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राष्ट्रीय दुर्भाग्य यह कि पहले मुस्लिम शासकों और फिर अंग्रेजी नौकरशाहों ने भारत को जातीय, साम्प्रदायिक, भाषाई-क्षेत्र और लिंग के लिहाज से बांटकर निरंतर कमजोर रखने की जो साजिश रची, उसे अँग्रेजों के लाभुक इशारों पर चलने वाले भारत के आजादी कालीन नेताओं ने बहुमत प्राप्ति का लोकतांत्रिक आधार बना दिया। पहले अखंड भारत को खंडित किया और फिर जाति-धर्म-भाषा की तुष्टीकरण वाले अंग्रेजी कानूनों को हूबहू स्वीकार कर लिया। इससे सामाजिक विखण्ड की प्रक्रिया तेज हुई।

चौंकाने वाली बात तो यह कि कांग्रेस को कमजोर करने के लिए समाजवादियों और राष्ट्रवादियों ने भी जाति-धर्म-भाषा-क्षेत्र से जुड़े जनभावनाओं को भड़काया और बहुमत पाकर सत्ता हथियाया। लेकिन भारतीयों की नीतिगत एकजुटता की बात मील का पत्थर बनकर रह गई। मतलबी सरकारें बदलती रहीं, भारत माता की आत्मा पर अनगिनत प्रहार जारी हैं, लेकिन हमारी संसद और सुप्रीम कोर्ट प्रबुद्ध और सुसंस्कृत भारत के निर्माण की जगह यूरोपीय और अरबी कलह को भारत पर थोपने की मूर्खता प्रदर्शित कर रही है, जो दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है।

यह कितनी मूर्खतापूर्ण बात है कि आजाद भारत में गरीबी और अपराध को जातीय चश्मे से देखा जाता है, सवर्ण यानी सामान्य जाती विरोधी कानून बनाये जाते हैं और सुप्रीम कोर्ट भी ऐतिहासिक सामाजिक अन्याय का जिक्र करते हुए वर्तमान और भविष्य के सवर्ण विरोधी सामाजिक अन्याय किये जाने के निकृष्ट जनतांत्रिक विचारों पर मोहर लगाता है। खासकर भारतीय संविधान से जुड़े संवैधानिक अनुच्छेद (14, 15, 19, 21, SC/ST Act) की तर्क संभाव्यता, आदि) को भी विस्तार से देखने और इनपर पुनर्विचार की जरूरत है। 

अन्यथा, देर सबेर सामान्य जातियों के बीच भी संसद और सुप्रीम कोर्ट का अप्रासंगिक होना तय है। यक्ष प्रश्न है कि आखिर बहुमत की राजनीति के लिए समाज को कब तक झुलसाया जाएगा, क्योंकि जब सहिष्णुता के विचार बदलेंगे तो व्यवस्था बदलते देर नहीं लगेगी! चूंकि प्रभावित पक्षों के लिए भारतीय संविधान का पक्षपाती दृष्टिकोण एक ऐसा 'मटमैला पन्ना' है, जो जाति, सम्प्रदाय, भाषा, क्षेत्र, लिंग आदि में वैधानिक विभेद रचता है और उसे सामान्य जातियों के खिलाफ ऐतिहासिक सामाजिक अत्याचार का प्रतिफल करार देता है। 

हैरत की बात है कि संविधान जिन लोगों को कानूनी संरक्षण देता है, उनके व्यक्तिगत और सामाजिक उत्पातों पर से भी प्रशासन अपनी आंखें फेर लेता है, यह जमीनी  हकीकत है, इसलिए कतिपय सवाल लाजिमी है। बहरहाल, नफरती भाषण सम्बन्धी जनहित याचिका सुप्रीम कोर्ट का स्टैंड व्यावहारिक है, और संवैधानिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो काफी संतुलित और सही माना जा सकता है, लेकिन यह बिना विवाद के नहीं है—विशेषकर जातिगत भावनाओं के मामले में। 

सवाल है कि नफरत भरे भाषण सुप्रीम कोर्ट का रुख क्या था? तो जवाब होगा कि सुप्रीम कोर्ट ने ब्राह्मण समुदाय के खिलाफ नफरती भाषण को अलग से “जाति आधारित दंडनीय अपराध” घोषित करने की भी याचिका पर विशेष निर्णय देने से इनकार कर दिया और याचिका को खारिज कर दिया। न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना ने स्पष्ट कहा कि “केवल ब्राह्मण ही क्यों, किसी भी समुदाय के खिलाफ नफरती भाषण स्वीकार्य नहीं है”, यानी एक विशेष जाति को अलग सा “हेट स्पीच” खंड के तहत नहीं रखा जाना चाहिए। लिहाजा, नेताओं को भी इसी भावना से सख्त कानून बनाना चाहिए।

सवाल है कि आखिर क्यों सुप्रीम कोर्ट का यह स्टैंड तर्कसंगत है? तो जवाब होगा कि भारतीय संविधान और फिलहाल लागू कानून (जैसे दंड संहिता की धाराएँ, आईटी एक्ट, निर्वाचन कानून, आदि) में दंगे, भड़काऊ भाषण और जाति आधारित उत्पीड़न के खिलाफ पहले से ही दंड का प्रावधान है; लिहाजा, कोर्ट ने इन्हीं तंत्रों को इस्तेमाल करने पर ज़ोर दिया, बजाय एक नई जाति विशेष श्रेणी बनाने के।

मसलन, न्यायपालिका का यह तर्क रहा कि अगर हेट स्पीच को रोकना है तो वह “समुदाय विशेष” के लिए नहीं, बल्कि सभी समुदायों के लिए एक समान और संवैधानिक ढांचे में होना चाहिए, अन्यथा यह न्याय की बराबरी के सिद्धांत के खिलाफ जाएगा। जहां तक आपत्तियाँ और चिंताएँ की बात है तो ब्राह्मण समुदाय के कुछ तबकों का तर्क है कि आज की राजनीतिक और जन चेतना में ब्राह्मणों के खिलाफ घृणा का एक विशेष और संगठित स्तर बना है, इसलिए उसे अलग से चिह्नित कर रोकने की ज़रूरत है; जबकि कोर्ट का रुख उनके अनुभव को “सामान्य” मानकर छोटा करने जैसा लगता है।

इसके उलट, दूसरे तरफ से यह डर भी जताया जाता है कि अगर एक जाति को विशेष तौर पर “नफरती भाषण” के खिलाफ संरक्षित श्रेणी में रखा जाए, तो इसे राजनीतिक रूप से हथियार बनाया जा सकता है और अन्य पिछड़े या अल्पसंख्यक समुदायों के हेट स्पीच विरोधी बचाव को नरम करने का तर्क भी बन सकता है।

संक्षेप में यदि इस स्टैंड पर मूल्यांकन किया जाए तो सैद्धांतिक तौर पर सुप्रीम कोर्ट का स्टैंड प्राकृतिक न्याय, समानता और घुमावदार राजनीतिक जातिगत हथियारबंदी से बचाव के लिए उचित और संयमित लगता है। हालांकि, व्यावहारिक तौर पर यह यह भी दिखाता है कि नफरती भाषण को रोकना “सिर्फ एक जाति की शिकायत” से उठकर इस तरह के घृणा विरोधी कानूनों की दृढ़ और निष्पक्ष अमलीकरण तक जाना चाहिए, चाहे निशाना कौन सा समुदाय हो।

कहना न होगा कि सुप्रीम कोर्ट ने अलग अलग समुदायों (खासकर धार्मिक और जातीय) के खिलाफ हेट स्पीच पर लगातार एक ही मूल सिद्धांत बनाए रखा है: धर्म/जाति के आधार पर घृणा फैलाने वाला भाषण अस्वीकार्य है, लेकिन इसका नियंत्रण “समान रूप से लागू” कानूनों से होना चाहिए, न कि हर समुदाय के लिए अलग अलग राजनीतिक कानूनी व्यवस्था बनाकर।

मुसलमान समुदाय के खिलाफ हेट स्पीच: 21 अक्टूबर 2022 को सुप्रीम कोर्ट ने भारत सरकार और कई राज्य सरकारों को निर्देश दिया कि वे ऐसे लोगों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करें, जो विशेष रूप से मुसलमानों के खिलाफ नफरत भरा भाषण देते हैं या भड़काऊ रैलियाँ करते हैं। इस आदेश का मुख्य तर्क था कि धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ नफरती भाषण सम्प्रदायिक तनाव और हिंसा को बढ़ाता है, इसलिए पुलिस और प्रशासन को ऐसे मामलों में तुरंत FIR दर्ज करना और जरूरी धाराएँ लगाना चाहिए, उन्हें “आम सियासी भाषण” की छवि में नहीं ढकना चाहिए।

अलग अलग समुदायों के लिए “समान संरक्षण” का सिद्धांत: एक लंबित और बहु दायर लिटिगेशन में कोर्ट ने जोर दिया है कि हेट स्पीच रोकने के लिए न्यायपालिका “हर छोटी घटना” पर मौन सुनवाई नहीं कर सकती, बल्कि यह राज्य/पुलिस का काम है; लेकिन यह भी कहा है कि धर्म या जाति के आधार पर नफरत फैलाने वाला भाषण भारत की धर्मनिरपेक्ष ढांचे के खिलाफ है। इस मामले में कोर्ट का तर्क रहा है कि अगर हेट स्पीच को रोकना है, तो वह एक एक जाति/धर्म के लिए अलग याचिका देकर नहीं, बल्कि सभी समुदायों के लिए एक ही मानक (IPC, चुनाव कानून, आईटी एक्ट आदि) के तहत किया जाना चाहिए; यानी ब्राह्मण, मुसलमान, दलित, आदिवासी—सभी एक समान ढांचे में संरक्षित हों।

राज्य स्तरीय और राजनीतिक नेताओं के खिलाफ मामले: 2023 के कुछ आदेशों में सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकारों (जैसे असम, उत्तर पूर्वी राज्य) को निर्देश दिए कि वे धर्मनिरपेक्ष देश में धर्म के आधार पर नफरत फैलाने वाले भाषणों के लिए उचित कानूनी कार्रवाई करें, चाहे भाषण राज्य मंत्रियों या सामाजिक संगठनों के नेताओं के मुंह से निकले। इन मामलों में कोर्ट ने यह भी जोर दिया कि न्यायपालिका “हर छोटी घटना” पर नजर रखने की जगह राज्य अपने अधिकार और नैतिक जिम्मेदारी से नफरती भाषण को रोकने के लिए प्रभावी तंत्र बनाएँ, जैसे SHRC या विशेष समितियाँ, बजाय निरंतर जनहित याचिकाओं पर निर्भर रहने के।

निष्कर्ष रूप से यह कहा जा सकता है कि पहले के मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने अलग अलग समुदायों (मुसलमान, अन्य अल्पसंख्यक, धर्मनिरपेक्षता बनाए रखने के लिए अस्पष्ट ग्रुप) के खिलाफ हेट स्पीच को गंभीर लिया है और राज्य अपराध के रूप में कार्रवाई की आवश्यकता पर जोर दिया है, लेकिन “हर एक जाति के लिए अलग अलग नियम/याचिका” बनाने की तरफ नहीं गया। इसी के संदर्भ में ब्राह्मण समुदाय के खिलाफ नफरती भाषण वाली ताजा याचिका पर भी कोर्ट ने यही तर्क दोहराया: “कोई भी समुदाय नफरती भाषण का निशाना नहीं होना चाहिए, इसलिए सभी के लिए एक ही संवैधानिक और कानूनी ढांचा चाहिए, न कि जाति विशेष व्यवस्था।”

संक्षेप में कहें तो हेट स्पीच के लंबित जनहित याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला अभी आने वाला है, लेकिन निश्चित तारीख अभी तय नहीं की गई। सवाल है कि क्या फैसला “सुरक्षित” रखा गया है? तो यह जान लीजिए कि जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की खंडपीठ ने 20 जनवरी 2026 को हेट स्पीच संबंधी कई रिट याचिकाओं पर अपना आदेश/फैसला सुरक्षित रख लिया था। कोर्ट ने सभी पक्षकारों (केंद्र, राज्य सरकारें, याचिकाकर्ता आदि) से लिखित दलीलें और संक्षिप्त नोट्स दो हफ्ते के भीतर दाखिल करने को कहा था; इसके बाद मामले पर फिर सुनवाई होनी है, जिस पर अंतिम आदेश आएगा।

जहां तक अनुमानित समय सीमा की बात है तो रिपोर्ट्स के मुताबिक, कोर्ट ने संकेत दिया है कि अधिकांश 2021 से लंबित हेट स्पीच याचिकाओं को बंद करने की दिशा में जा रहा है, और जल्द ही अंतिम आदेश आने वाला है। हालाँकि, कोई फिक्स्ड तारीख या महीना अभी ऐलान नहीं किया गया; अभी तक बस इतना कहा गया है कि “निर्णय जल्द ही आएगा” (shortly) और पुराने बैच के मामले बंद किए जाएँगे, जबकि नोएडा के एक विशेष हेट क्राइम मामले पर निगरानी जारी रहेगी। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, अगर अभी तक फैसला नहीं आया है तो यह जल्द जल्द (महीनों के अंदर) आने की संभावना है, न कि सालों तक टलने की।

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने हेट स्पीच से जुड़े लंबित मामलों पर फिलहाल अंतिम आदेश सुरक्षित रख लिया है, लेकिन दिशा निर्देशों के रूप में कुछ स्पष्ट बिंदु दिए हैं, जिनका मूल विचार है: “हेट स्पीच को रोकना ज़रूरी है, लेकिन न्यायपालिका हर छोटी घटना का निरीक्षक राज्य नहीं बनेगी; राज्य और कानून तंत्र अपनी जिम्मेदारी निभाएँ।” जहां तक मुख्य दिशा निर्देश और तर्क आधार की बात है तो कोर्ट एकसमान ढांचा बनाने का पक्षधर है, इसलिए जाति विशेष पर जोर नहीं दिया गया है।

बेंच ने ज़ोर दिया कि धर्म/जाति के आधार पर नफरत भरा भाषण सभी समुदायों के लिए अस्वीकार्य है, इसलिए कोई एक जाति (जैसे ब्राह्मण) के लिए अलग सा “हेट स्पीच” कानून नहीं बनाया जाना चाहिए; सभी के लिए भादवि (आसीपीसी), चुनाव कानून, आईटी एक्ट जैसे मौजूदा ढांचे लागू रहने चाहिए।

राज्य प्रशासन की जिम्मेदारी पर ज़ोर: कोर्ट ने पुलिस और राज्य सरकारों को यह निर्देश दिया कि जहाँ धार्मिक/जातीय नफरत फैलाने वाला भाषण हो या जानबूझकर सम्प्रदायिक तनाव पैदा करने की कोशिश हो, वहाँ त्वरित तौर पर प्राथमिकी दर्ज करनी चाहिए और उचित धाराएँ लगानी चाहिए, उसे “सिर्फ राजनीतिक भाषण” की ढाल नहीं दिखानी चाहिए। 

हेट स्पीच याचिकाओं की प्रक्रियात्मक दिशा: लंबित याचिकाओं को नियंत्रित करने का इरादा: बेंच ने इशारा दिया कि 2021 से लंबित अधिकांश हेट स्पीच याचिकाओं को बंद करने की दिशा में जाने का विचार है, ताकि एक एक घटना पर जनहित याचिकाओं का बोझ न बढ़े; बल्कि मामले नीचे के स्तर पर विशेष रूप से गंभीर हेट क्राइम और हिंसा जोखिम वाले मामलों पर केंद्रित रहें।

नए मामले से जुड़ी निगरानी: इसी बीच नोएडा के एक विशिष्ट हेट संबंधित आपराधिक मामले पर निगरानी रखने का निर्देश दिया गया, जिससे यह संकेत मिलता है कि जहाँ स्पष्ट हिंसक प्रवृत्ति और धर्मनिरपेक्ष ढांचे के लिए गंभीर खतरा हो, वहाँ कोर्ट निश्चित रूप से दखल दे सकती है।

अन्य संदर्भों में उसी बेंच का अनुभव: आपराधिक मुकदमों को सुचारु बनाने के लिए यह बेंच ने निचली अदालतों को निर्देश दिया है कि फैसलों के अंत में गवाहों, दस्तावेजों और सामग्रियों के विवरण वाले चार्ट/टेबल जोड़े जाएँ, ताकि जटिल आपराधिक केस ट्रैक करने में आसानी हो; यही दृष्टिकोण उन हेट स्पीच मामलों पर भी दिखता है—प्रक्रियागत स्पष्टता और अधिक कुशल निगरानी।

सरल निष्कर्ष यह निकलता है कि जस्टिस विक्रम नाथ बेंच का मुख्य दिशा निर्देश है: हेट स्पीच दंडनीय और नियंत्रित होनी चाहिए, लेकिन इसे “सभी के लिए एक ही लागू ढांचा + राज्य/पुलिस की जिम्मेदारी + न्यायपालिका की चुनिंदा निगरानी” के भीतर रखा जाए, न कि जाति विशेष या हर छोटी घटना पर अलग अलग न्यायिक दखल के रूप में।

- कमलेश पांडेय

वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक

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