By सुखी भारती | Mar 14, 2026
अर्श से फर्श तक आ गिरने पर किसी जीव की मनोस्थिति कैसी हो जाती है, इसका अत्यंत सजीव चित्रण हमें नारद मुनि के इस प्रसंग में देखने को मिलता है। कौन कल्पना कर सकता था कि जिन श्रीहरि में नारद मुनि के प्राण बसते थे, उन्हीं प्रभु के प्राणों के प्यासे होकर वे कभी दिशाओं में भटकते फिरेंगे।
नारद मुनि की चेतना में ऐसी दुर्गंध भर गई थी कि सुगंधित इत्र भी उन्हें सड़ांध सा प्रतीत होने लगा। अर्थात जिन श्रीहरि को वे कभी परम करुणामय मानते थे, अब वही उन्हें कपटी और छलिया दिखाई देने लगे।
नारद मुनि ने प्रभु को केवल उलाहने ही नहीं दिए, अपितु जितना कठोर और कटु कहा जा सकता था, उतना सब कह डाला। सुना जाता है कि कलह में भी एक मर्यादा होती है। क्योंकि जब झगड़े के पश्चात मेल-मिलाप होता है, तब मनुष्य को यह ग्लानि न हो कि उसे इतने निम्न स्तर के शब्दों का प्रयोग नहीं करना चाहिए था।
परंतु नारद मुनि धीरे-धीरे उसी सीमा को लाँघ चुके थे। प्रभु को कपटी कह तो वे पहले ही चुके थे, किंतु अब उन्होंने एक और आश्चर्यजनक आरोप लगाया—
‘परम स्वतंत्र न सिर पर कोई।
भावइ मनहि करहु तुम्ह सोई।।
भलेहि मंद मंदेहि भल करहु।
बिसमय हरष न हियँ कछु धरहु।।’
अर्थात — हे हरि! आप तो पूर्णतः स्वतंत्र हैं। आपके ऊपर कोई नहीं है जो आपको रोक सके या कुछ कह सके। इसलिए आपके मन में जो भी आता है, आप वही कर बैठते हैं। आप भले को बुरा और बुरे को भला बना देते हैं। और आश्चर्य तो यह है कि आपके हृदय में अपने कर्मों के प्रति न हर्ष उत्पन्न होता है और न ही विषाद।
भगवान विष्णु ने मुनि की यह वाणी सुनी तो वे क्षणभर विचारमग्न हो उठे। निस्संदेह प्रभु परम स्वतंत्र हैं, किंतु जहाँ भक्त का प्रेम-पाश होता है, वहाँ बँध जाना ही वे अपना सौभाग्य मानते हैं। नारद मुनि तो संतों के भी शिरोमणि थे। उनके प्रेम में बँधने में प्रभु को भला कैसी आपत्ति होती?
किन्तु नारद मुनि तो उन्हें परम स्वतंत्र कह रहे थे। शायद इसलिए कि उस समय नारद स्वयं भी अपने मन पर अधिकार खो चुके थे। वे भी एक प्रकार से ‘परम स्वतंत्र’ हो गए थे। तभी उन्हें प्रभु भी वैसा ही प्रतीत हो रहे थे।
नारद मुनि आगे कहते हैं कि — आप जब चाहें किसी भले को बुरा और बुरे को भला बना देते हैं। और विडम्बना यह है कि आपको अपने कर्मों पर तनिक भी पछतावा नहीं होता।
नारद मानो यह सिद्ध करना चाहते थे कि — “मैं तो पहले से ही अच्छा-भला था, किंतु आपने ही मुझे इस दुर्दशा तक पहुँचा दिया। आपने मुझे बंदर का मुख दे दिया। ऐसा तो कोई अपने शत्रु के साथ भी नहीं करता। और ऊपर से उन दो शिवगणों को मेरे पीछे लगा दिया, जो निरंतर मेरा उपहास कर रहे हैं। मुझे तो यह आश्चर्य होता है कि आपको अपने किए पर किंचित भी खेद नहीं है।”
वे और भी व्यथित होकर कहते हैं — “और फिर आप मुझसे पूछते हैं कि मैं व्याकुल होकर क्यों भटक रहा हूँ? प्रभु! मैं तो केवल व्याकुल ही था; यह मेरे धैर्य और सामर्थ्य का ही परिणाम है कि मैं जीवित हूँ। अन्यथा आपने तो मेरी पीड़ादायक मृत्यु की पूरी व्यवस्था ही कर दी थी।”
अपनी वाणी की निर्लज्जता में और भी तीखापन घोलते हुए नारद मुनि बोले—
‘डहकि डहकि परिचेहु सब काहू।
अति असंक मन सदा उछाहू।।
करम सुभासुभ तुम्हहि न बाधा।
अब लगि न काहूँ साधा।।’
अर्थात — हे हरि! आप तो सबको ठग-ठगकर भलीभाँति परख चुके हैं और इसी कारण अत्यंत निडर हो गए हैं। आपके मन में सदा उत्साह बना रहता है, क्योंकि आपको लगता है कि आपको न पाप का भय है और न पुण्य का विचार। आप तो सर्वशक्तिमान हैं, आपको भला कौन क्या कर सकता है?
आपके लिए शुभ-अशुभ का कोई बंधन नहीं है। क्योंकि आप जो भी करते हैं, वही ‘लीला’ कहलाती है। लोग आपकी कपटपूर्ण चतुराई को भी भक्ति-गीत बनाकर गाते हैं।
और इधर हमने जीवन में एक बार राग-रंग की ओर दृष्टि क्या डाल दी, आपने तो हमें बंदर ही बना डाला। लगता है अब तक किसी ने आपको ठीक से समझाया ही नहीं है।
और तब… क्रोध की पराकाष्ठा में नारद मुनि ने वह कह दिया, जिसे शायद किसी बड़े से बड़े दुष्ट ने भी प्रभु से कहने का साहस नहीं किया होगा।
नारद के उस वचन ने तो मानो प्रभु की समस्त लीला की दिशा ही परिवर्तित कर दी।
आखिर नारद मुनि ने ऐसा क्या कह दिया?
यह जानेंगे अगले अंक में।
- सुखी भारती