BJP@46 Part 1: बीजेपी बनने से पहले जब विचारधारा पर हुई बहस, हिंदुत्व-राष्ट्रवाद से लेकर संगठन तक के सियासी ब्रह्मास्त्र, जिसके चक्रव्यूह को नहीं तोड़ पा रहा विपक्ष

By अभिनय आकाश | Apr 06, 2025

एक ऐसा खांटी राजनेता जो लगभग सात दशक तक राष्ट्रीय राजनीति की धुरी बनकर रहा। लेकिन प्रधानमंत्री बनने का उनका सपना सपना ही रह गया। उस राजनेता को एक नया पदनाम पीएम इन वेटिंग मिला। भारत की राजनीति में इस नेता के योगदान को नजरअंदाज करना असंभव है। नेता तो बंटवारे के वक्त पाकिस्तान में अपना सबकुछ छोड़कर भारत आया और जो हिम्मत और हौसला उसके पास बचा था उसे उसने आरएसएस और उसके राजनीतिक संगठन को खड़ा करने में लगाया। एक ऐसा राजनेता जिसने कांग्रेस की जमी जमाई राजनीति के खिलाफ एक मजबूत विपक्ष खड़ा किया। सुषमा स्वराज, अरुण जेटली, प्रमोद महाजन, नरेंद्र मोदी जैसे नेताओं की एक पूरी अगली पंक्ति तैयार की, जो राष्ट्रीय राजनीति में अगले कई दशकों तक राज करने वाले थे। जिन्होंने न केवल कांग्रेस को विपक्ष के पाले में धकेला बल्कि प्रचंज बहुमत के साथ स्थायी सत्ता पक्ष के रूप में खुद को स्थापित भी किया। एक ऐसा नेता जिसकी राम रथ यात्रा पर सवार होकर 2 सीटों से 182 सीटें जीतने वाली पार्टी बनी। लेकिन ऐसा नहीं है कि उस नेता के पास प्रधानमंत्री बनने का मौका नहीं आया। 

6 अप्रैल 1980 को जनता पार्टी छोड़कर अटल बिहारी वाजपेयी, लाल कृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, विजयाराजे सिधिंया, सिकंदर बख्त जैसे नेताओं ने भारतीय जनता पार्टी बनाई थी। तब उन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में ये सपना देखा था कि गांधीवादी समाजवाद के रास्ते वे सत्ता के शिखर तक पहुंचेंगे। अटल बिहारी वाजपेयी भारतीय जनता पार्टी के पहले अध्यक्ष चुने गए। लेकिन 1984 के चुनाव में दो सीटों पर ही सिमट कर रह गई बीजेपी। 1984 की हार ने बीजेपी को रास्ता बदलने पर मजबूर किया। आखिर वाजपेयी तक हार गए थे। थोड़े कट्टर छवि के माने जाने वाले लाल कृष्ण आडवाणी बीजेपी के नए अध्यक्ष बन गए। अब बीजेपी में नेतृत्व आडवाणी का था और नियंत्रण संघ का। इसलिए बीजेपी ने हिंदुत्व का रास्ता अख्तियार किया। इसके बाद ये रास्ता बनता हुआ खुद पर खुद बनता चला गया। 

अटल-आडवाणी-मरली मनोहर, भाजपा के 3 धरोहर

1991 का चुनाव बीजेपी ने राम मंदिर के मुद्दे पर लड़ा और उसने 120 सीटें जीत लीं। इस साल बीजेपी देश की नंबर दो पार्टी बन गई। बीजेपी को लग गया कि सत्ता की संजीवनी चाहिए तो राम नाम से राष्ट्रवाद पर जाना होगा। इसी दौर में बीजेपी में मुरली मनोहर जोशी अध्यक्ष बन गए थे। दिसंबर 1991 में उनकी तिरंगा यात्रा निकली जिसका मकसद 26 जनवरी 1992 को श्रीनगर के लाल चौक पर तिरंगा फहराना था। हिंदुत्व और राम के नाम पर बीजेपी बहुत तेजी से आगे बढ़ रही थी। 1984 में 2 सीटों पर सिमटी महज सात वर्षों में ही देश की नंबर दो पार्टी बन गई थी। ये सब हुआ लाल कृष्ण आडवाणी की बदौलत। साल 1993 में आडवाणी एक बार फिर बीजेपी के अध्यक्ष बनते हैं। आडवाणी को ये अंदाजा था कि पार्टी को नंबर टू से नंबर 1 बनाने और इससे भी आगे प्रधानमंत्री देने के लिए कोई उदार छवि वाला चेहरा चाहिए। 1995 में वाजपेयी जी से बगैर पूछे ही उनको प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया और उनके इस ऐलान के बाद सब के सब हैरान रह गए थे। 

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इंडिया शाइनिंग रहा बुरी तरह फेल

अटल जी के नेतृत्व में बीजेपी सरकार बनाने में कामयाब रही। इसी दौर में भारतीय जनता पार्टी में पितृ पुरुष कहे जाने वाले कुशाभाऊ ठाकरे की बीजेपी के अध्यक्ष पद पर ताजपोशी होती है। मध्यप्रदेश में बीजेपी को मजबूत बनाने में कुशाभाऊ ठाकरे का बड़ा योगदान भी माना जाता है। 2000 में आंध्र प्रदेश से आने वाले बंगारू लक्ष्मण बीजेपी के अध्यक्ष बनाए जाते हैं। लेकिन बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण तहलका कांड में फंसते हैं जिसके बाद न सिर्फ उनकी कुर्सी गई बल्कि पार्टी की छवि पर भी सवाल उठा। बंगारू लक्ष्मण के हटने के बाद 2001 से 2002 तक जेना कृष्णमूर्ति रहे। भारत के वर्तमान उपराष्ट्रपति और 1977 से 1980 तक जनता पार्टी के युवा शाखा के अध्यक्ष रहे वेंकैया नायडू को साल 2002 में  भारतीय जनता पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया जाता है। साल 2004 में इंडिया शाइनिंग के बुरी तरह फेल होने के बाद एक बार फिर से बीजेपी की कमान लालकृष्ण आडवाणी के हाथों में आ जाती है। लेकिन आडवाणी के नेतृत्व में बीजेपी को 2009 के चुनाव में भी शिकस्त ही मिलती है। 

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