Bharat Jodo Yatra Analysis: 136 दिनों के इस सफर में किसको क्या हासिल हुआ?

By नीरज कुमार दुबे | Jan 30, 2023

कांग्रेस नेता राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा का समापन हो चुका है। 136 दिनों तक चली इस यात्रा पर सरसरी नजर डालें तो यह अपने नाम के विपरीत नजर आई क्योंकि बात भारत जोड़ो की हो रही थी और इसमें ऐसे लोग शामिल रहे जो अलगाववादी और टुकड़े-टुकड़े वाली मानसिकता रखते हैं। इसके अलावा इस यात्रा के जरिये ना तो कांग्रेस एकजुट हो पाई ना ही विपक्ष। यात्रा के दौरान ही कई राज्यों में कांग्रेस नेताओं ने पार्टी छोड़ी और यात्रा के समापन पर विपक्ष की एकता का जो शक्ति प्रदर्शन किया जाना था उस उद्देश्य पर पानी नहीं फिरा बल्कि पूरी बर्फ ही जम गयी। यात्रा के समापन अवसर पर शामिल होने के लिए 21 राजनीतिक पार्टियों को कांग्रेस ने न्यौता भेजा था लेकिन सिर्फ 6 ही दलों से नेता आये। जिन दलों से नेता आये उनमें द्रमुक को छोड़कर नेशनल कांफ्रेंस, पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, रेवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी और इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग जनता की अदालत में पिटे हुए दल हैं।

साथ ही इस यात्रा के दौरान जो लोग राहुल गांधी के सहभागी बने उनके नामों को देखें तो कहीं से नहीं लगता कि यह भारत जोड़ो यात्रा थी। हम आपको बता दें कि केरल में बीफ पार्टी करने वाले कांग्रेस नेता जहां यात्रा में शामिल हुए वहीं राहुल ने उन पादरी जॉर्ज पुनिया का भी आशीर्वाद लिया, जिन्होंने कहा था कि वे भारत की धरती को अपवित्र मानते हैं। तमिलनाडु में तमिल पृथकता के पक्षधर एसपी उदय कुमार राहुल गांधी के साथ चले तो टुकड़े टुकड़े गैंग के प्रमुख सदस्य कन्हैया कुमार इस यात्रा के प्रमुख किरदार रहे। देश के प्रमुख आंदोलनजीवी योगेंद्र यादव भी इस यात्रा में राहुल के साथ रहे। इसके अलावा मेधा पाटकर जैसी विकास विरोधी, 370 हटा तो कोई तिरंगा उठाने वाला नहीं होगा कहने वालीं महबूबा मुफ्ती और फारूक अब्दुल्ला, नरेंद्र मोदी के घोर विरोधी रघुराम राजन, हर्ष मंदर और प्रशांत भूषण जैसे लोग इस यात्रा में शामिल हुए। तमिलनाडु की जनता की ओर से बुरी तरह नकारे गये कमल हासन यात्रा में शामिल भी हुए और उन्होंने विभिन्न मुद्दों पर राहुल गांधी का साक्षात्कार लेकर खुद को और राहुल को विशेषज्ञ राजनीतिज्ञ साबित करने का असफल प्रयास भी किया। यही नहीं यात्रा में ग्लैमर लाने के लिए पिटे हुए फिल्मी कलाकारों- स्वरा भास्कर, उर्मिला मातोंडकर, पूजा भट्ट, प्रकाश राज, रश्मि देसाई, रिया सेन, अक्षय शिम्पी, अमोल पालेकर, मोना अम्बेगांवकर, दिगांगना सूर्यवंशी, आकांक्षा पुरी, काम्या पंजाबी, निर्माता- ओनिर, गायक- टीएम कृष्णा, निर्देशक संध्या गोखले आदि की भी मदद ली गयी। इन नामों में अधिकांश ऐसे लोग हैं जो समय-समय पर विवादों से घिरे रहे हैं।

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राहुल गांधी ने यात्रा के दौरान नफरत के बाजार में मोहब्बत की दुकान खोलने जैसा लोकप्रिय नारा तो दे दिया लेकिन यदि उनके पहले दिन से लेकर यात्रा के अंतिम दिन तक के भाषण पर गौर किया जाये तो सिर्फ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के खिलाफ उनके मन की नफरत ही रोजाना नजर आई। इसके अलावा राहुल गांधी ने अर्थव्यवस्था और चीन से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बिना तैयारी के घेर कर अपनी खिल्ली ही उड़वाई है। यात्रा के दौरान राहुल गांधी की तपस्वी के रूप में ब्रांडिंग करने की बहुत कोशिश की गयी लेकिन उसमें कांग्रेस पार्टी सफल नहीं हो पाई क्योंकि उनके ही कई नेता हिंदू और हिंदुत्व के खिलाफ अनर्गल बयान समय-समय पर देते रहे। यही नहीं कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने तो सर्जिकल और एयर स्ट्राइक के सबूत फिर से मांग कर राहुल गांधी को बैकफुट पर ला दिया। राहुल गांधी ने टीशर्ट में ही रहने और जब तक ठंड नहीं लगेगी, तब तक जैकेट नहीं पहनने का जो संकल्प लिया था वह भी कश्मीर जाते ही टूट गया और पहले ही दिन रेनकोट और यात्रा के अंतिम दिन कश्मीरी फेरन पहन कर उन्होंने दर्शा दिया कि ठंड सबको लगती है।

बहरहाल, भारत जोड़ो यात्रा संपन्न हो गयी है। यात्रा के दौरान कांग्रेस पार्टी को नया अध्यक्ष भी मिल गया है। देखना होगा कि आने वाले दिनों में राहुल गांधी को पार्टी क्या भूमिका देती है। वैसे यात्रा के दौरान विभिन्न साक्षात्कारों के जरिये राहुल गांधी यह तो साफ कर ही चुके हैं कि यदि वह प्रधानमंत्री बने तो क्या-क्या करेंगे। देखना होगा कि उनकी महत्वाकांक्षाओं को देखते हुए विपक्ष के अन्य दल क्या उनके नेतृत्व को गंभीरता से लेते हैं? राहुल गांधी का राजनीतिक भविष्य इस बात पर भी निर्भर करेगा कि उनके नेतृत्व में कांग्रेस पार्टी इस साल होने वाले विधानसभा चुनावों में कितनी सफलता अर्जित कर पाती है? वैसे राहुल इस यात्रा के जरिये अपनी पार्टी के संगठन को भले खड़ा ना कर पाये हों लेकिन इतना तो उन्होंने कर ही दिया है कि जो कांग्रेस पार्टी मीडिया की खबरों से एकदम गायब हो गयी थी उसे अब प्रमुखता मिलने लगी है।

-नीरज कुमार दुबे

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