Father Of Indian AI | कौन हैं राज रेड्डी, जिन्हें कहा जाता है फॉदर ऑफ इंडियन एआई|Matrubhoomi

By अभिनय आकाश | Jun 11, 2026

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के विकास और वर्चस्व की इस जंग में भले ही अमेरिका और चीन सबसे आगे  हों और भारत उनसे थोड़ा पीछे नजर आ रहा हो, लेकिन इस क्षेत्र के शुरुआती विचारकों और रचनाकारों में आज भी एक भारतीय मूल के वैज्ञानिक का नाम सबसे ऊपर आता है। हम बात कर रहे हैं डॉ. डब्बाला राजगोपाल "राज" रेड्डी की। डॉ. रेड्डी फिलहाल कार्नेगी मेलन यूनिवर्सिटी के कंप्यूटर साइंस विभाग में मोज़ा बिंत नासिर यूनिवर्सिटी प्रोफेसर के पद पर कार्यरत हैं। उनकी रिसर्च का मुख्य केंद्र 'ह्यूमन-कंप्यूटर इंटरैक्शन' (इंसान और कंप्यूटर का आपसी तालमेल) और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस रहा है। इसके साथ ही, वर्तमान में वे 'स्पोकन लैंग्वेज सिस्टम' (आवाज़ पहचानने वाली तकनीक), 'गीगाबिट नेटवर्क', 'यूनिवर्सल डिजिटल लाइब्रेरी' और 'डिस्टेंस लर्निंग ऑन डिमांड' (मांग पर दूरस्थ शिक्षा) जैसे कई क्रांतिकारी प्रोजेक्ट्स पर काम कर रहे हैं। उस दौर में, जब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आज की तरह कोई कल्ट या 'बज़वर्ड' नहीं बना था, इसने एक ऐसे शख्स का ध्यान अपनी ओर खींचा जिनका एकमात्र बड़ा जुनून तकनीक को गरीब और विकासशील देशों तक पहुंचाना था। यहीं से शुरू हुआ एक ऐसा सफर, जिसने आगे चलकर इस विषय की सोच को नए आयाम दिए। विशाल डेटा सेट के बीच पैटर्न तलाशने के लिए एआई का इस्तेमाल भले ही कई दशक पुराना हो, लेकिन आज के दौर में चैटजीपीटी (ChatGPT) और बार्ड (Bard) जैसे प्रॉडक्ट्स ने जो हलचल मचाई है, उसकी सबसे बड़ी वजह 'जनरेटिव एआई' है। दिलचस्प बात यह है कि डॉ. रेड्डी ने पिछले 50 वर्षों में जो काम किया, उसका एक बड़ा हिस्सा इसी जनरेटिव एआई की बुनियाद तैयार करने को समर्पित रहा है।

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एआई में अग्रणी कार्य

डॉ. रेड्डी के कार्यों ने कंप्यूटरों को न केवल लिखित पाठ पढ़ने में सक्षम बनाया, बल्कि बोले गए शब्दों को सुनने और समझने में भी सक्षम बनाया, जिससे मनुष्यों और मशीनों के बीच इंटरफ़ेस में काफी सुधार हुआ। अपनी रिसर्च के दम पर उन्होंने ऐसी बेहतरीन तकनीक विकसित की, जिससे कंप्यूटर आवाज़ के निर्देशों पर काम करने लगे। आज हम जो वॉयस असिस्टेंट और आवाज़ से चलने वाले गैजेट्स देखते हैं, उनकी शुरुआत इसी तकनीक से हुई थी।

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भारत के AI परिदृश्य में डॉ. रेड्डी का योगदान

भारत में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) के अनुसंधान और शिक्षा को वैश्विक स्तर पर पहचान दिलाने में डॉ. रेड्डी का नाम सबसे आगे आता है। अमेरिका में अपनी सफलताओं के इतर, उन्होंने भारत के 'राजीव गांधी यूनिवर्सिटी ऑफ नॉलेज टेक्नोलॉजीज' में एआई रिसर्च की नींव रखने में बेहद अहम भूमिका निभाई। आज यह संस्थान देश में एआई की युवा प्रतिभाओं को तराशने वाले एक बड़े हब के रूप में उभर चुका है। डॉ. रेड्डी के विज़न से प्रेरित होकर आज सैकड़ों छात्र और प्रोफेशनल्स एआई के क्षेत्र में अपना करियर बना रहे हैं, जिसने दुनिया भर में भारत के बढ़ते एआई दबदबे को और मजबूत किया है। डॉ. रेड्डी का प्रभाव केवल किताबी ज्ञान या एकेडमिक्स तक सीमित नहीं है, बल्कि वे स्वास्थ्य, शिक्षा और व्यापार जैसे क्षेत्रों में आम लोगों के जीवन को बेहतर बनाने के लिए एआई के इस्तेमाल के बड़े पैरोकार रहे हैं। उनका उद्देश्य केवल तकनीकी विकास करना नहीं, बल्कि भारतीय शोधकर्ताओं के लिए ऐसे अवसर पैदा करना है जिससे वे वैश्विक मंच पर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा सकें।

भारतीय AI जगत के अन्य दिग्गज चेहरे

एआई के क्षेत्र में भारत को आत्मनिर्भर बनाने के इस सफर में डॉ. रेड्डी अकेले नहीं हैं; देश के कई अन्य दिग्गजों ने भी इस दिशा में क्रांतिकारी काम किए हैं। इसी फेहरिस्त में एक बड़ा नाम आईआईटी खड़गपुर के मशहूर प्रोफेसर पार्थ प्रतिम चक्रवर्ती का है। डॉ. चक्रवर्ती ने इमेज प्रोसेसिंग और मेडिकल इमेजिंग खासकर 'पैटर्न आइडेंटिफिकेशन' और 'कंप्यूटर विज़न' के क्षेत्र में अभूतपूर्व योगदान दिया है। उनकी इसी अग्रणी रिसर्च की बदौलत आज ऐसे आधुनिक एआई सिस्टम तैयार हो सके हैं, जो बीमारियों के सटीक और शुरुआती निदान (डायग्नोसिस) में गेम-चेंजर साबित हो रहे हैं। डॉ. चक्रवर्ती की रिसर्च ने न केवल विज्ञान जगत की कई जटिल गुत्थियों को सुलझाया है, बल्कि उनके काम को दुनिया की शीर्ष बहुराष्ट्रीय कंपनियों के सॉफ्टवेयर टूल्स और इंटरनेशनल टेक्स्टबुक्स में भी शामिल किया गया है। 200 से अधिक रिसर्च पेपर्स के प्रकाशन और दर्जनों पीएचडी छात्रों को मेंटर करने वाले डॉ. चक्रवर्ती आज भी इस फील्ड को नई दिशा दे रहे हैं। विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में देश के सर्वोच्च सम्मान 'शांति स्वरूप भटनागर पुरस्कार' से सम्मानित डॉ. चक्रवर्ती भारत के वैज्ञानिक और शैक्षणिक समुदाय के सबसे प्रतिष्ठित चेहरों में से एक हैं।

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