LokSabha Elections 2024: बसपा के मुस्लिम प्रत्याशी किसे पहुचायेंगे फायदा किसका करेंगे नुकसान

By संजय सक्सेना | May 07, 2024

लखनऊ। भारतीय जनता पार्टी किसी भी चुनाव में एक-दो अपवाद को छोड़कर मुसलमान प्रत्याशी नहीं उतारती है। इसके पीछे बीजेपी का दो टूक कहना है कि उसे मुस्लिम वोट मिलते ही नहीं हैं। मुसलमान क्यों बीजेपी को वोट देने से कतराता है, इसकी तह में जाया जाये तो यही लगता है कि बीजेपी का हिन्दुत्व के प्रति नरम और तुष्टिकरण की सियासत के खिलाफ सख्त रवैया मुस्लिम वोटरों को रास नहीं आता है। यह सब तब हो रहा है जबकि मोदी सरकार ने तत्काल तीन तलाक जैसी रूढ़िवादी विचारधारा के खिलाफ कानून बनाकर मुस्लिम महिलाओं को काफी मुश्किल हालातों से बचा लिया है। इसी तरह से मोदी और योगी सरकार की तमाम लाभकारी योजनाओं का फायदा सभी समाज के लोग उठा रहे हैं, जिसमें मुस्लिम भी शामिल हैं,फिर भी इनका (मुसलमानों) वोट बीजेपी को नहीं जाता है। इसके उलट तुष्टिकरण की सियासत करने वाले सपा-बसपा जैसे दल बड़ी संख्या में मुस्लिम नेताओं को चुनावी मैदान में उतारते रहे हैं, लेकिन इस बार इन दलों ने भी अपनी रणनीति बदल दी है। अबकी सपा-बसपा जैसे दलों ने भी मुस्लिम प्रत्याशी उतारने से परहेज किया है। इसके पीछे की इन दलों के नेताओं की सोच पर ध्यान दिया जाये तो इन दलों के आलाकमान का मानना है कि मुस्लिम वोट तो उनके हैं ही, प्रत्याशी किसी भी जाति का हो, यह वोट तो उसकी झोली में आ ही जाता है, लेकिन जब मुस्लिम प्रत्याशी मैदान में उतारा जाता है तो हिन्दू वोटर उससे छिटक जाते हैं। इसी लिये अबकी से सपा-बसपा द्वारा मुस्लिम नेताओं को चुनावी सियासत से दूर रखा गया है। इन दलों की यह रणनीति कितनी परवान चढ़ेंगी यह तो 04 जून को नतीजे आने के बाद ही पता चलेगा, लेकिन हाल फिलहाल में समाजवादी पार्टी अपनी इस रणनीति में कुछ हद तक सफल होती नजर आ रही है।

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समाजवादी पार्टी ने 2019 में प्रदेश की 80 में से 37 सीटों पर चुनाव लड़ा था। तब उसने सबसे ज्यादा टिकट यादवों को दिए थे। दूसरे नंबर पर मुसलमान थे। उसके 27 प्रतिशत प्रत्याशी यादव और 11 प्रतिशत मुस्लिम थे। वहीं, कुर्मियों को आठ प्रतिशत टिकट दिए थे। इस बार समाजवादी पार्टी प्रदेश में 62 सीटों पर चुनाव लड़ रही है। इनमें से रॉबर्ट्सगंज को छोड़कर बाकी सभी सीटों पर उसके प्रत्याशी घोषित किए जा चुके हैं। यादव और मुस्लिम मतदाता सपा के आधार वोटबैंक माने जाते हैं। मुस्लिमों की यूपी की आबादी में हिस्सेदारी करीब 20 फीसदी है। पर, सपा ने इस बार टिकटों में उन्हें(मुसलमानों को) आबादी के मुकाबले काफी कम, महज 6.5 फीसदी की ही भागीदारी दी है। पिछड़ी जातियों में आबादी के लिहाज से यादवों की हिस्सेदारी सबसे ज्यादा है, लेकिन अखिलेश ने इस बार यादव प्रत्याशियों के रूप में अपने परिवार के ही पांच नेताओं को उतारा है। वर्ष 2019 के 27 प्रतिशत यादव प्रत्याशियों के मुकाबले यह आंकड़ा मात्र 8 फीसदी ही है। समाजवादी पार्टी ने कुर्मी, मौर्य, कुशवाहा, शाक्य, सैनी जातियों को टिकट देने में प्राथमिकता दी है। पिछड़ी जातियों में कुर्मी-पटेल की हिस्सेदारी 7.5 प्रतिशत है, जबकि सपा ने इस बिरादरी के 10 प्रत्याशी उतारकर उन्हें टिकटों में 1.6 प्रतिशत की भागीदारी दी है। इसी तरह से ओबीसी जातियों में मौर्य-कुशवाहा-शाक्य-सैनी की भागीदारी सात फीसदी है, जिन्हें सपा ने 10 प्रतिशत टिकट दिए हैं। राजनैतिक पंडित सपा की इस बदली सियासत और अपने आधार वोट बैंक के बजाय अन्य जातियों को तरजीह देना उसकी सोशल इंजीनियरिंग का हिस्सा बता रहे हैं।सपा ने वाल्मीकि, गुर्जर, राजभर, भूमिहार, पाल, लोधी के एक-एक उम्मीदवार उतारे हैं। यानी 1.6 फीसदी हिस्सेदारी दी है। जबकि 2019 में लोधी, वाल्मीकि, कायस्थ, जाटव, कुशवाहा, नोनिया, चौहान, कोल, धानुक के एक-एक उम्मीदवार को मैदान में उतारा था। लेकिन प्रतिशत 2.7 ही था खैर, यादवों और मुसलमानों को उचित प्रतिनिधित्व न देना सपा को भले ही अभी फायदेमंद दिख रहा हो, पर इसके दूरगामी परिणाम नुकसानदायक हो सकते हैं। क्योंकि मुसलमानों के मन में अभी से यह बात ‘घर’ करने लगी है कि सपा वोट तो मुसलमानों का लेती है मगर मुस्लिम नेताओं की चुनाव में भागीदारी देने में कंजूसी करती है।

उधर, मुसलमानों को टिकट देने के मामले में बसपा का रिकार्ड सपा से काफी बेहतर नजर आ रहा है। बसपा ने अपना ही पुराना रिकार्ड तोड़ दिया है। मायावती ने मुस्लिम समुदाय को टिकट देने में अब तक के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। बसपा ने इस बार के लोकसभा चुनाव में 23 मुस्लिमों को प्रत्याशी बनाया है जबकि पिछले चुनाव में सिर्फ 6 टिकट मुस्लिमों को दिया था। ऐसे में सभी की निगाहें इस बात पर है कि मायावती ने 2024 में मुस्लिमों पर सियासी दांव खेलकर क्या अपना खेल बनाएंगी या फिर इंडी गठबंधन का गेम बिगाड़कर बीजेपी की राह आसान करेंगी? मायावती ने सूबे की 80 में से 78 सीट पर उम्मीदवारों के नाम का ऐलान किया है जबकि देवरिया और कुशीनगर सीट पर अभी अपने पत्ते नहीं खोले हैं. बसपा के उम्मीदवारों की लिस्ट देखें तो बसपा ने 78 सीटों में से अब तक 23 मुस्लिम और 15 ब्राह्मणों को टिकट दिया है। मायावती मुस्लिमों के टिकट देकर इंडिया गठबंधन की चिंता बढ़ा दी है तो ब्राह्मण दांव खेलकर एनडीए की टेंशन बढ़ा रखी है। माया मुस्लिम दांव के जरिए बसपा दलित और मुस्लिम समीकरण बनाने की कवायद में है, लेकिन यह पहली बार नहीं है जब मायावती ने इतनी बड़ी संख्या में मुस्लिमों को टिकट दिया है। पिछले दो सालों में हुए लोकसभा चुनाव में बसपा के मुस्लिम प्रत्याशियों के आंकड़ों पर नजर डाले तो 2024 में सबसे ज्यादा है। बसपा ने 2004 में 20 मुस्लिम प्रत्याशी उतारे थे तो 2009 में 9 मुस्लिमों को टिकट दिया था। मायावती ने 2014 में 19 सीटों पर मुस्लिमों को टिकट दिया था और 2019 में सिर्फ छह सीट पर ही मुस्लिम प्रत्याशी उतारे थे।

2019 का लोकसभा चुनाव सपा-बसपा ने मिलकर लड़ा था। प्रदेश की 80 में से 10 सीट पर सपा-बसपा गठबंधन ने मुस्लिम उम्मीदवार उतारे थे। सपा ने अपने कोटे की 37 में से 4 सीट पर  तो बसपा ने अपने कोटे की 38 में से 6 सीट पर मुस्लिमों को टिकट दिया था। इस बार सपा ने फिर से चार सीटों पर मुस्लिम को प्रत्याशी बनाया है और दो सीट पर कांग्रेस ने टिकट दिया है, लेकिन बसपा ने 23 मुस्लिमों को प्रत्याशी बनाकर समाजवादी पार्टी खेमें में खलबली मचा दी है।

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