पर्यावरण को नुकसान पहुँचाने का खामियाजा भुगत रही है पूरी दुनिया

By डॉ. रमेश ठाकुर | Jun 05, 2021

बीते दो वर्षों में कुदरत ने हमें बहुत कुछ सिखाया है। कुदरती आपदाओं की झड़ी लगी हुई, तूफानों का आना, पहाड़ों का गिरना, बादल फटना आदि प्रकृति में होते नित बदलावों ने हमें चेता दिया है कि सुधर जाओ, वरना अंजाम अच्छा नहीं होगा। हमने अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए धरा को उजाड़ दिया है। पेड़-पौधों को कीड़े मकौड़ों की भांति वीरान कर दिया है। ये नहीं उजाड़े होते तो आज शायद ऑक्सीजन के बिना लोगों की आकस्मिक मौतें भी नहीं हुईं होतीं। कोविड का आगमन भी कहीं न कहीं बिगड़ते पर्यावरण का ही रौद्र रूप है। दरअसल, हमने पर्यावरण को पराया समझ लिया था। मान बैठे थे कि उसके बिना हम रह सकतें हैं और सांसें ले सकते हैं। पर, ऐसा सोचना शायद हमारी मूर्खता थी। इंसानी जीवों ने अपनी आकांक्षाओं और उपभोक्तावादी संस्कृति के चलते पर्यावरण का क्या हाल कर डाला है, शायद बताने की जरूरत नहीं? पर, गनीमत कहो लॉकडाउन की जिसने कराहते पर्यावरण को एक बार फिर हरा भरा कर दिया।

पिछले दो महीनों से पर्यावरण कुछ हद तक साफ है। आकाश में जहां धुंध के गुब्बार दिखते थे, वहां का नजारा साफ दिखने लगा है। नदी, तालाब, नाले सभी शीशे की भांति चमक उठे हैं। कई समय बाद ऐसा नजारा देखने को मिला जब दिल्ली जैसे प्रदूषित शहर के ऊपर उमड़ता आकाश भी नीला दिखाई दिया। तीन-चार दिन पहले बारिश हुई, तब दिल्लीवासियों को इंद्रधनुष के भी दीदार हुए। परिंदों की चहलकदमी और उनके चहकने का दृश्य देखकर बच्चे भी खुश हुए। कोरोना और लॉकडाउन का बहाना अगर न होता तो प्रकृति को रौंदने के लिए मानवीय हिमाकतें शायद ही थमतीं। दूषित पर्यावरण किन कारणों से है यह सरकारों को पता होता है पर, हाथ पर हाथ रखे बैठी रहती हैं। धड़ल्ले से बड़ी-बड़ी कंपनियां बिना किसी भय के धरती का सीना फाड़कर गगनचुंबी ईमारतों का निमार्ण करती हैं। एक्शन इसलिए नहीं होता कि कंपनियां हुकूमतों, जनप्रतिनिधियों और खिलाफ में आवाज उठाने वालों को मोटा माल देकर चुप करा देती हैं। यही कारण है कि पर्यावरण संबंधित कानून भी तब बौने हो जाते हैं।

बिजली की लगातार बढ़ती खपत और नीचे जाता पानी का स्तर हमें सोचने पर मजबूर करता है कि आने वाली पीढ़ी के लिए हम क्या छोड़कर जाएंगे? इसके अलावा हिंदुस्तान की एक चौथाई जमीन बंजर हो चुकी है और यही रफ्तार रही तो सूखा प्रभावित क्षेत्र की करीब 70 प्रतिशत जमीन कुछ ही समय में बंजर हो जायेगी। अभी भी करीब अस्सी देश ऐसे हैं जहां सूखे से हालात बन चुके हैं। हमारे कुछ राज्य तो पहले से पीड़ित हैं जिनमें महाराष्ट्र व बुंदेलखंड बेपानी हो ही चुके हैं। समस्या पर अंकुश लगाने के लिए कागजी प्रयासों और गाल बजाने वालों की कमी नहीं है। पर, जमीन पर सब शून्य? बड़े-बड़े कल-कारखानों की चिमनियों से निकलने वाला विषैला दुआं, रेलगाड़ी व अन्य मोटर वाहनों के पाइपों और इंजनों से निकलने वाली गैस, रसायनों की गंध व कचड़ा, अवशिष्ट रासायनिक पानी परमाणु भट्ठियों से निकलने वाले जहरीले तत्व से वायु-जल प्रदूषित हो चुके हैं।

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‘जल ही जीवन है’ बगैर इसके जिंदगी संभव नहीं? कुछ साल पहले वर्षा जल संरक्षण के लिए कई विशाल जलाशय बनाए गए थे। इनको सिंचाई, विद्युत और पेयजल की सुविधा के लिए हजारों एकड़ वन और सैंकड़ों बस्तियों को उजाड़कर बनाया गया था, मगर अब दम तोड़ रहे हैं। केंद्रीय जल आयोग ने इन तालाबों में जल उपलब्धता के जो ताजा आंकड़े दिए हैं, उनसे साफ जाहिर होता है कि आने वाले समय में पानी और बिजली की भयावह स्थिति सामने आने वाली है। इन आंकड़ों से यह साबित होता है कि जल आपूर्ति विशालकाय जलाशयों (बांध) की बजाए जल प्रबंधन के लघु और पारंपरिक उपायों से ही संभव है, न कि जंगल और बस्तियां उजाड़कर। बड़े बांधों के अस्तित्व में आने से एक ओर तो जल के अक्षय स्रोत को एक छोर से दूसरे छोर तक प्रवाहित रखने वाली नदियों का वर्चस्व खतरे में पड़ गया है।

विश्व पर्यावरण दिवस को सिर्फ पांच जून को ही नहीं, बल्कि रोजाना मनाना चाहिए। क्योंकि बिना दुरुस्त पर्यावरण के मानव जीवन संभव नहीं है। धरा को किसी भी तरह से बचाना होगा। आने वाली पीढ़ियों के लिए सहजना होगा। प्रकृति ने पृथ्वी पर जीवन के लिये प्रत्येक जीव की सुविधानुसार उपभोग संरचना का निर्माण किया है। परन्तु मनुष्य ऐसा समझता है कि इस पृथ्वी पर जो भी पेड़-पौधे, पशु-पक्षी, कीट-पतंगे, नदी, पर्वत व समुद्र आदि हैं, वे सब उसके उपभोग के लिये हैं और वह पृथ्वी का मनमाना शोषण कर सकता है। यद्यपि इस महत्वाकांक्षा ने मनुष्य को एक ओर उन्नत और समृद्ध बनाया है तो दूसरी ओर कुछ दुष्परिणाम भी प्रदान किये हैं, जो आज विकराल रूप धारण कर हमारे सामने खड़े हैं। वर्षाजल के भूमि में न समाने से जलस्रोत सूख रहे हैं। नतीजतन, सैंकड़ों की संख्या में गांवों को पेयजल किल्लत से जूझना पड़ रहा तो सिंचाई के अभाव में हर साल परती भूमि का रकबा बढ़ रहा है। नमी के अभाव में जंगलों में हर साल ही बड़े पैमाने पर लगने वाली आग से वन संपदा तबाह हो रही है।

-डॉ. रमेश ठाकुर

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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