मुस्लिम नेता जिन्ना जैसे कट्टर क्यों होते हैं ? कलाम जैसे सहृदय क्यों नहीं बनते ?

By तरूण विजय | Jan 03, 2020

पिछले दिनों एक टीवी वार्ता में भाजपा सांसद तथा तेजतर्रार प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी ने कट्टरपंथी मुस्लिम नेता ओवैसी से पूछा कि 1947 में पाकिस्तान से युद्ध में शहीद होने वाले पहले भारतीय मुसलमान सैनिक वीर का नाम बताइए। ओवैसी सकपका गए और थोड़ा सोचकर बोले, अब्दुल हमीद। सुधांशु त्रिवेदी ने कहा गलत, अब्दुल हमीद 1965 में शहीद हुए थे, 1947 में पहले मुस्लिम सैन्य वीर शहीद हुए थे ब्रिगेडियर उस्मान। ओवैसी की बोलती बंद हो गई। वजह यह है कि इन कट्टरपंथी बड़बोले मुस्लिम नेताओं की आंखों में देशभक्त मुस्लमानों के लिए कोई इज्जत ही नहीं है। जो भी कट्टरपंथी है, भारत विरोधी है और जो भी भारत की अस्मिता के खिलाफ बोलता है वह आज मुखर मुसलमानों का चहेता हीरो बन जाता है। लेकिन जो मुसलमान भारत-भारतीयता की बात करे, इस्लाम का विद्वान हो, वतन परस्ती का झंडा उठाकर चले, भारतीय सभ्यता और संस्कृति के प्रति सम्मान रखे, अर्थात् जो इस्लाम को आस्था के रूप में माने लेकिन स्वयं को भारत माता की संतान समझे वह इन मुसलमानों के लिए खलनायक बन जाता है और उसे वह अस्वीकार कर देते हैं। 

मोहम्मद अली जिन्ना किसी भी दृष्टिकोण से मुसलमान होने की परिभाषा में आते ही नहीं थे। उन्हें मंहगी व्हिस्की का शौक था। कभी कुरान पढ़ी नहीं थी, पढ़ भी नहीं पाते थे। कभी रोज़े रखते नहीं थे। नम़ाज पढ़ते नहीं थे। मौलवियों से चिढ़ते थे। लेकिन मुसलमानों के राजनीतिक मामले भड़का कर और हिन्दुओं के खिलाफ हिंसा की अगुवाई कर वे मुस्लिम नेता कहलाए।

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दूसरी ओर मौलाना अबुल कलाम आजाद (पूरा नाम- मौलाना सैय्यद अबुल कलाम गुलाम मुहीयुदीन अहमद बिन खैरुद्दीन अल हुसैनी आजाद) कुरान के विद्वान थे। बाकायदा रोज़े रखते थे। सर्दी, गरमी, तूफान भी हो तो भी नमाज़ छोड़ते नहीं थे। उनकी इस्लाम पर लिखी किताबें मक्का विश्वविद्यालय में पढ़ाई जाती थीं। इस्लाम की विभिन्न धाराओं के शिखर विद्वान थे। 12 साल की उम्र में उनके पास घरेलू पुस्तकालय था। अपने से दुगुनी उम्र के लोगों को वे इस्लाम की शिक्षा देते थे। कुरान और हदीज़ पर उनका कहा हुआ निर्णायक माना जाता था। लेकिन वे गांधी जी के भक्त थे, बंगाल के विभाजन के विरोधी थे। बंगाल, बिहार और बाम्बे में क्रांतिकारी गतिविधियों में हिस्सा लिया।

लेकिन देशभक्त अबुल कलाम आजाद मुसलमानों के नेता नहीं बन पाए।

देशद्रोही और देश तोड़ने वाले जिन्ना को इन तथाकथित कट्टरपंथी मुसलमानों ने सिर-आंखों पर चढ़ाया तथा भारत का विभाजन करवा दिया। 

आज वही बात नागरिकता कानून के विरोध में उठ रही आवाजों के बारे में कही जा सकती है।

जो हिन्दुओं से नफरत करके पाकिस्तान में अत्याचारों की तलवार तले जिंदगी और इज्जत लुटवा रहे हिन्दुओं, सिखों, बौद्धों को भारत में शरण देने का विरोध करते हुए सड़कों पर उतर रहे हैं और ला इलाहा लिल्लाह तथा अल्लाह हु अकबर का नारा लगाते हुए हिन्दुओं की संपत्तियाँ जला रहे हैं, पुलिस पर पत्थर फेंक रहे हैं, वे मौलाना अबुल कलाम आजाद को नहीं बल्कि ओवैसी और अमानतुल्ला को पहचानते तथा मानते हैं। ये वही लोग हैं जो इस्लाम के विद्वान तथा परम देशभक्त मुस्लिम नेता आरिफ मोहम्मद खान को अपना नेता नहीं मानते तथा मंच पर निहायत असभ्यता और अभद्रता दिखाते हुए आरिफ भाई पर हमला करते हैं वह भी तथाकथित इतिहासकार इरफान हबीब जैसे लोग, जिनका इस्लाम और हिन्दुस्तानियत- दोनों से कोई रिश्ता नहीं।

पांचजन्य में एक बार हमने हज़ कैसे होता है, इसकी जानकारी देते हुए कुछ लेख छापे थे तथा इन्हें विश्व प्रसिद्ध इस्लामी विद्वान मौलाना वहीदुद्दीन खान साहब ने लिखा था। वे पांचजन्य के कार्यक्रमों में भी आते थे और दीप प्रज्ज्वलन भी करते थे। बस, उर्दू के अखबारों ने उन्हें पंडित वहीदुद्दीन खान लिखना शुरू कर दिया। हिन्दुओं से इतनी नफरत इन असभ्य कट्टरपंथियों के मन में ठूंसी हुई है कि अगर दुनिया भर में अपने इस्लामी ज्ञान के लिए प्रसिद्ध और प्रतिष्ठित मौलाना साहब हज़ के बारे में जानकारी दें या दीप प्रज्ज्वलन करें तो उन जैसे विद्वान को भी काफिर करार कर दिया जाता है। जो भारतीय मुसलमान इस प्रकार की सोच रखते हैं वे आज भी हमलावरों की विरासत को संभाले हुए हैं। और हिन्दुओं के प्रति उनका दृष्टिकोण वही होता है।

यही कारण है कि भारतीय मुसलमानों ने कभी भी दारा शिकोह को नहीं अपनाया बल्कि औरंगजेब के गुण गाए और औरंगजेब रोड़ का नाम बदलने पर कसमसाए, तिलमिलाए तथा चिल्लाए। इन मुसलमानों के लिए रहीम, रसखान, चांद बीबी काफिर हैं तथा इस्लाम की जानकारी से कोसों दूर राजनीतिक लाउडस्पीकर ओवैसी और अमानतुल्ला बहुत गहरे अपने तथा जानदार लीडर हैं।

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शायद आपको ध्यान हो कि दिल्ली के जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय की स्थापना में मौलाना अबुल कलाम आजाद का बहुत बड़ा योगदान रहा है। लेकिन जामिया मिलिया के कट्टरपंथी छात्रों ने अबुल कलाम आजाद की सीख पर कोई ध्यान नहीं दिया। जिन लोगों का ज्ञान, विज्ञान और जीवन के उत्कर्ष से कोई संबंध नहीं है वे उन पर भारी पड़ गए जिनका सारा जीवन विज्ञान और दर्शन के मार्ग में बीता।

क्या इन लोगों ने कभी डॉ. अब्दुल कलाम के प्रति सम्मान और श्रद्धा दिखाई? डॉ. अब्दुल कलाम ने दारा शिकोह की तरह श्रीमद्भगवत गीता और उपनिषदों का अध्ययन किया था। देशभक्त थे। समस्त भारत के हर क्षेत्र और आस्था के नौजवान उनको अपना आदर्श तथा नायक मानते थे और मानते हैं।

क्या यह आश्चर्य की बात है कि ब्रिगेडियर उस्मान, अब्दुल हमीद, कैप्टन हनीफुद्दीन, डॉ. अब्दुल कलाम या मौलाना अबुल कलाम आजाद जामिया अथवा ओखला बस्ती के आदर्श नहीं बने बल्कि वे ओवैसी और अमानतुल्ला के पीछे चले?

-तरूण विजय

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