चीन मुद्दे पर विपक्ष सरकार के साथ तो आया लेकिन काफी समझाने के बाद

By ललित गर्ग | Sep 22, 2020

गुरुवार को राज्यसभा में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने सीमाओं पर पड़ोसी देश चीन की हरकतों एवं कुचालों पर भारत का पक्ष जिस तरह से पेश किया, उसकी सराहना होनी चाहिए। लेकिन इस अवसर पर विपक्षी दलों ने सुरक्षा एवं अति-संवेदनशील विषय पर भी जिस तरह की अपरिपक्वता का परिचय दिया, उससे ऐसा प्रतीत हुआ कि इन नेताओं के लिये लोकतंत्र का प्रशिक्षण नितांत अपेक्षित है। राज्यसभा के सभापति एम. वेंकैया नायडू ने संसद में शालीनता, संयम एवं परिपक्वता के लिये जो रास्ता बताया, उससे लोकतंत्र की गरिमा बढ़ी है। विपक्षी नेताओं ने सुरक्षा एवं अति-संवेदनशील मुद्दे पर अनावश्यक रूप से परेशान करने वाले या देश की सुरक्षा को खतरे में डालने वाले सवाल पूछने से भी कोई गुरेज नहीं रहा। उन्होंने जिस तरह से अलोकतांत्रिक स्थिति खड़ी की और इस स्थिति को भारतीय लोकतंत्र के लिये किसी भी कोण से उचित नहीं कहा जा सकता। विपक्ष को सरकार की घेरेबंदी करने के लिए ऐसे सवाल करने से बचना चाहिए।

इसे भी पढ़ें: चीन ने युद्ध छेड़ा तो उसका सामना नये भारत की सशक्त सेना से होगा

रक्षामंत्री का पड़ोसी देश के प्रति जहां दृढ़ता का स्वर स्वाभाविक था, वहीं ऐसे समय में भी सुधार के प्रति संवेदना साफ तौर पर सामने आई। तानाशाह पड़ोसी की मनमानियों के बावजूद उनका बयान देश के बड़प्पन को ही जाहिर करता है। रक्षामंत्री का बयान जितना महत्वपूर्ण था, उससे कहीं ज्यादा जरूरी था राज्यसभा के सभापति एम. वेंकैया नायडू का लोकतंत्र की मजबूती एवं गरिमा को बनाये रखने का सुझाव। भारत-चीन संदर्भ में कुछ नेता अतिरिक्त प्रश्न पूछना चाहते थे, इस पर उप-राष्ट्रपति ने रक्षामंत्री से कहा कि वह प्रमुख नेताओं को अपने कक्ष में बुलाकर जानकारी दें। उप-राष्ट्रपति का यह परिपक्व रुख सराहनीय एवं लोकतंत्र की बुनियाद का मजबूती देने का उपक्रम है। आजकल हर तरह के सवाल पूछने का चलन हो गया है, भले ही ऐसे सवाल संसद के पटल पर पूछने से देश की सुरक्षा खतरे में पड़े। ऐसे लोगों का संयम में रहना सबसे जरूरी है और इसके बावजूद अगर वे सवाल पूछना चाहते हैं, तो उप-राष्ट्रपति ने सार्वजनिक रूप से रास्ता बता दिया है।


इस अवसर पर उप-राष्ट्रपति ने सांसदों को जिस ढंग से समझाया, कायदे से उसकी जरूरत नहीं पड़नी चाहिए थी। उन्होंने याद दिलाया कि यह एक संवेदनशील मुद्दा है और सेना सीमा पर खड़ी है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दुष्प्रचार चल रहा है कि भारत में इस मुद्दे पर मतभेद है। उप-राष्ट्रपति ने उचित ही कहा कि हमें इस सदन के माध्यम से ऐसा संदेश देना चाहिए कि पूरा देश और संसद सेना के साथ एकजुट है। उन्होंने यह भी कहा कि भारत की परंपरा और संस्कृति वसुधैव कुटुंबकम और सर्वे भवन्तु सुखिनाः पर आधारित रही है। हजारों साल के इतिहास में हमने कभी किसी देश पर हमला नहीं किया है। उप-राष्ट्रपति के ऐसे प्रेरणास्पद भाषण से माहौल बदला, विपक्ष को समझ आया और विपक्षी नेता भी देश की एकता और अखंडता की दुहाई देने लगे। राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष गुलाम नबी आजाद ने तो यहां तक कह दिया कि ‘उनकी पार्टी चीन के साथ विवाद सुलझाने के मुद्दे पर पूरी तरह से सरकार के साथ खड़ी है।’

इसे भी पढ़ें: ड्रैगन अब बातचीत से नहीं समझने वाला, भारत को कड़ा रुख बरकरार रखना होगा

उप-राष्ट्रपति के समझाने पर ही विपक्ष की समझ में आया, इसका अर्थ है कि वह लोकतंत्र की मर्यादा एवं सीमाओं से परिचित नहीं है। सिर्फ विरोध के लिये विरोध करना लोकतंत्र के लिये युक्तिसंगत नहीं है। संसद भारत के सवा सौ करोड़ लोगों की आवाज को स्वर देने का मंच है, जहां का प्रतिक्षण न केवल मूल्यवान है बल्कि इस मूल्यवान समय को अपनी प्रतिभा से चुने हुए प्रतिनिधि नया आयाम देते हैं, भारत के विकास का आगे बढ़ाते हैं, और सेना का मनोबल बढ़ाते हैं। जब-जब इस सर्वोच्च मंच पर राजनीति करने के प्रयास हुए, तब-तब भारतीय लोकतंत्र न केवल शर्मसार हुआ बल्कि उसके उज्ज्वल अस्तित्व पर दाग भी लगे हैं। इसलिये संसद के पटल पर बहस को शालीन एवं संयमित किये जाने की अपेक्षा की जाती है। अक्सर ऐसा होता रहा है जब यहां होने वाली कार्रवाई एवं बहस में राजनीति कहीं दूर पीछे छूट जाती है और दोनों ही सदनों में सिर्फ मजबूत और पुख्ता तथ्यों के आधार पर शालीन तरीकों से सत्ता और विपक्ष एक-दूसरे को घेरते हैं, स्वस्थ चर्चा करते हैं और देश के विकास एवं सुरक्षा के मुद्दों को जगह देते हैं। संसद में इस तरह का सकारात्मक वातावरण बनने की जगह यदि किसी चुनावी सभा का वातावरण बन जाता है तो हमें सोचने के लिए मजबूर होना पड़ेगा कि हम उस लोकतन्त्र को लज्जित कर रहे हैं जिसने हमें इन महान सदनों में बैठने के काबिल बनाया है। गुरुवार को जैसे असंसदीय माहौल में उप-राष्ट्रपति को विपक्ष को संयम बरतने का पाठ पढ़ाने को विवश होना पड़ा, वैसा अवसर दुबारा संसद के इतिहास में न आये, इस पर चिन्तन जरूरी है।


आग्रह, पूर्वाग्रह और दुराग्रह- ऐसे लोग गिनती के मिलेंगे जो इन तीनों स्थितियों से बाहर निकल कर जी रहे हैं। पर जब हम आज राष्ट्र की राजनीति संचालन में लगे अगुओं को देखते हैं तो किसी को इनसे मुक्त नहीं पाते। आजादी के बाद सात दशक बीत चुके हैं, लोकतंत्र के सारथियों की परिपक्वता नहीं पनप पा रही हैं, साफ चरित्र जन्म नहीं ले पाया है, लोकतंत्र को हांकने के लिये हम प्रशिक्षित नहीं हो पाये हैं। उसका बीजवपन नहीं हुआ या खाद-पानी का सिंचन नहीं हुआ। आज आग्रह पल रहे हैं- पूर्वाग्रहित के बिना कोई विचार अभिव्यक्ति नहीं और कभी निजी और कभी दल स्वार्थ के लिए दुराग्रही हो जाते हैं। कल्पना सभी रामराज्य की करते हैं पर रचा रहे हैं महाभारत। महाभारत भी ऐसा जहां न श्रीकृष्ण है, न युधिष्ठिर और न अर्जुन। न भीष्म पितामह हैं, न कर्ण। सब धृतराष्ट्र, दुर्योधन और शकुनि बने हुए हैं। न गीता सुनाने वाला है, न सुनने वाला।

इसे भी पढ़ें: क्या है Hybrid Warfare, जिसे जीतने के लिए चीन जुटा रहा है भारतीयों की जानकारी

विपक्षी दल अनावश्यक आक्रामकता का परिचय देंगे तो सरकार उन्हें उसी की भाषा में जवाब देगी। इसके चलते अब संसद के सत्रों के दौरान कहीं अधिक शोर-शराबा होने लगा हैं। ऐसा होने का सीधा मतलब है कि संसद में विधायी कामकाज कम, हल्ला-गुल्ला ज्यादा होता है। कायदे से इस अप्रिय स्थिति से बचा जाना चाहिए। विचार और मत अभिव्यक्ति के लिए देश का सर्वोच्च मंच भारतीय संसद में भी आग्रह-दुराग्रह से ग्रसित होकर एक-दूसरे को नीचा दिखाने की ही बातें होती रहे तो यह दुर्भाग्यपूर्ण ही हैं। दायित्व की गरिमा और गंभीरता समाप्त हो गई है। राष्ट्रीय समस्याएं, सुरक्षा और विकास के लिए खुले दिमाग से सोच की परम्परा बन ही नहीं रही है। यह मानने के अच्छे-भले कारण हैं कि विपक्षी दल पहले से इस तैयारी में थे कि सीमा मुद्दे पर संसद को न चलने देने के जतन करना है। जब मानसिकता दुराग्रहित है तो ”दुष्प्रचार“ ही होता है। कोई आदर्श संदेश राष्ट्र को नहीं दिया जा सकता।


भारतीय रक्षामंत्री ने संकेतात्मक ढंग से सीमा पर सुरक्षा की चर्चा करते हुए देश के बल, सुरक्षा एवं सैन्य तैयारियों से जुड़े तथ्यों को संयमित ढंग से प्रस्तुत किया। उन्होंने जहां स्वयं न झुकने की बात कहीं, वहीं यह भी कह दिया गया कि हम दूसरे का मस्तक भी नहीं झुकाना चाहते। किसी भी पड़ोसी देश की संप्रभुता का इससे ज्यादा सम्मान नहीं हो सकता। ऐसे समय में भी हम जिस स्तर की शालीनता, संयम और समझदारी का परिचय दे रहे हैं, दुनिया देख रही है। चीन का लहजा सामने कुछ होता है व पीठ पीछे कुछ और। वह वार्ता में सहमति बनाने की बात करता है, लेकिन जमीन पर उग्रता बढ़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ता। चीन के पूरे संदर्भ में रक्षामंत्री का बयान एक लोकतांत्रिक और संतुलित देश की ओर से दिया गया माकूल जवाब है। ऐसे बयान की उम्मीद शायद चीन को भी नहीं होगी। उसे खासतौर पर अपनी कथनी और करनी के अंतर को दूर करने के कोशिश जरूर करनी चाहिए। इन स्थितियों में समूचे विपक्ष की भूमिका महत्वपूर्ण है और उसे इसकी गंभीरता को समझते हुए अपने आपको प्रस्तुत करना चाहिए। लेकिन लगता है कि आज वह लोकतांत्रिक आदर्श नहीं, मजबूरियां जी रहा है। अपने होने की सार्थकता को वह सिद्ध नहीं कर पा रहा है। अच्छे-बुरे, उपयोगी-अनुपयोगी का फर्क नहीं कर पा रहा है। मार्गदर्शक यानि विपक्ष शब्द कितना पवित्र व अर्थपूर्ण था पर वह अब कोरा विवाद खड़े करने का सबब बन गया है।


-ललित गर्ग

(लेखक, पत्रकार, स्तंभकार)

All the updates here:

प्रमुख खबरें

Olympic Ice Hockey में Team Canada का तूफान, France को 10-2 से रौंदकर मचाया तहलका।

IND vs PAK मैच में हार का डर? बीच में ही स्टेडियम छोड़कर निकले PCB चीफ Mohsin Naqvi

T20 World Cup: भारत से हार के बाद पाकिस्तान में गुस्सा, प्रशंसकों ने टीम पर उठाए सवाल

IND vs PAK: महामुकाबला बना एकतरफा, Team India ने Pakistan को 61 रन से धोकर 8-1 की बढ़त बनाई।