आनंद भी हुए आजाद, आखिर वरिष्ठ नेताओं के स्वाभिमान को ठेस क्यों पहुँचा रही है कांग्रेस?

By नीरज कुमार दुबे | Aug 22, 2022

कांग्रेस ने उदयपुर चिंतन शिविर के दौरान तय किया था कि पार्टी की एकजुटता बनाई रखी जायेगी और युवाओं को ज्यादा मौके दिये जायेंगे तथा अनुभवी नेताओं की सलाह को तवज्जो देते हुए उनका पूरा सम्मान भी किया जायेगा। लेकिन ना तो पार्टी एकजुट नजर आ रही है। ना युवाओं को ज्यादा मौके दिये जा रहे हैं ना ही अनुभवी नेताओं को सम्मान दिया जा रहा है। पार्टी संगठन की हालत यह है कि 2019 के लोकसभा चुनावों में करारी हार के बाद राहुल गांधी ने अध्यक्ष पद से इस्तीफे के बाद इसे जहां छोड़ा था पार्टी आज भी वहीं खड़ी है। यही नहीं 2019 के लोकसभा चुनावों में करारी हार के बाद कांग्रेस ने पुडुचेरी, मध्य प्रदेश और पंजाब में अपनी सरकार गंवा दी और जिस तरह के हालात फिलहाल नजर आ रहे हैं उससे लग रहा है कि उसके पास जिन दो राज्यों- राजस्थान और छत्तीसगढ़ में सरकार है, वह भी अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों में उसके हाथ से निकल जायेंगे। पार्टी को अपने अनुभवी नेताओं की सलाह पर तवज्जो नहीं देना कितना भारी पड़ा है इसे इस बात से भी समझा जा सकता है कि केरल, गोवा और उत्तराखण्ड में कांग्रेस इसलिए चुनाव नहीं जीत सकी क्योंकि पार्टी एकजुट नहीं थी। इसके अलावा, एक ओर जहां सभी पार्टियां 2024 के लोकसभा चुनावों की तैयारी में लग गयी हैं वहीं कांग्रेस अभी तक अपने पार्टी अध्यक्ष का चुनाव भी नहीं करा पाई है।

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हम आपको बता दें कि गुलाम नबी आजाद और आनंद शर्मा कांग्रेस के 'जी 23' समूह के प्रमुख सदस्य हैं। यह समूह पार्टी नेतृत्व का आलोचक रहा है और पार्टी में संगठनात्मक बदलाव की मांग करता आया है। इस समूह में कपिल सिब्बल भी शामिल थे जोकि पिछले दिनों पार्टी से इस्तीफा देकर समाजवादी पार्टी के समर्थन से अब राज्यसभा पहुँच चुके हैं। अभी जब पिछले महीने राज्यसभा चुनाव हुए थे तो कांग्रेस ने सिर्फ गांधी परिवार के वफादारों को उम्मीदवार बनाया था ऐसे में गुलाम नबी आजाद और आनंद शर्मा जैसे नेता फिर से राज्यसभा नहीं पहुँच पाये थे। कुछ समय पहले तक गुलाम नबी आजाद राज्यसभा में कांग्रेस के नेता और आनंद शर्मा उपनेता थे लेकिन अब गांधी परिवार ने इन दोनों ही नेताओं को पूरी तरह किनारे कर दिया है। हम आपको यह भी बता दें कि कुछ समय पहले आनंद शर्मा ने भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा से मुलाकात भी की थी जिसके बाद अफवाहें चलने पर उन्होंने स्पष्टीकरण दिया था कि नड्डा और वह पारिवारिक मित्र हैं इसलिए इस मुलाकात में कुछ गलत नहीं है।

अब हिमाचल प्रदेश में इस साल अक्टूबर-नवंबर में विधानसभा चुनाव होने हैं। हिमाचल प्रदेश के हालिया राजनीतिक परिदृश्य पर गौर करें तो एक बार कांग्रेस और एक बार भाजपा को यहां सरकार बनाने का मौका मिलता रहा है। लेकिन भाजपा इस मिथक को तोड़ने के लिए पूरा दम लगा रही है। वह हिमाचल प्रदेश में दोबारा सरकार बनाकर 'मिथक' को उसी तरह तोड़ना चाहती है जैसे उसने उत्तर प्रदेश और उत्तराखण्ड में तोड़ा था। आम आदमी पार्टी जिस तरह से हिमाचल प्रदेश में अपने कदम बढ़ा रही है और कांग्रेस जिस तरह विभाजित नजर आ रही है उससे चुनावों में भाजपा को लाभ हो सकता है। हालांकि कांग्रेस नेता यहां एकजुट होने की बात तो कह रहे हैं लेकिन अंदर क्या चल रहा है यह बाहर जाहिर हो चुका है।

बहरहाल, तमाम मतभेदों के बावजूद आनंद शर्मा मंगलवार से हिमाचल प्रदेश में जनसंपर्क कार्यक्रम शुरू करने जा रहे हैं और वह कसौली और अन्य जगहों पर अपने समर्थकों तथा पार्टी कार्यकर्ताओं से मुलाकात करेंगे। आनंद शर्मा को हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस के सबसे बड़े नेताओं में से एक माना जाता है। आनंद शर्मा ने पहली बार 1982 में विधानसभा चुनाव लड़ा था। वर्ष 1984 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उन्हें राज्यसभा भेजा था। वह तभी से राज्यसभा सदस्य थे और कांग्रेस तथा केंद्र सरकार में कई प्रमुख पदों पर अपनी सेवाएं दे चुके हैं। देखना होगा कि आनंद शर्मा की नाराजगी कांग्रेस को भारी पड़ती है या कांग्रेस आनंद शर्मा को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाती है।

- नीरज कुमार दुबे

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