Chai Par Sameeksha: फडणवीस को क्यों आई औरंगजेब की याद, शरद पवार ने भतीजे अजित को कैसे लगाया किनारे

By अंकित सिंह | Jun 12, 2023

प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क के खास साप्ताहिक कार्यक्रम चाय पर समीक्षा में इस सप्ताह महाराष्ट्र के घटनाक्रमों और पटना में होने वाली विपक्षी दलों की संयुक्त बैठक को लेकर चर्चा की गयी। इस दौरान प्रभासाक्षी संपादक ने कहा कि महाराष्ट्र उन कुछ चुनिंदा राज्यों में से है जहां वैचारिक मतभेदों के बावजूद राजनीति कभी भी निचले स्तर पर नहीं आई है। पक्ष-विपक्ष के नेताओं के बीच आपसी सम्मान की भावना महाराष्ट्र में सदैव बनी रही है। इस प्रगतिशील राज्य की शांति और विकास के माहौल को बिगाड़ने की जो साजिशें चल रही हैं उनको विफल करना बहुत जरूरी है। 

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शरद पवार का बड़ा दांव

इसके अलावा, प्रभासाक्षी संपादक ने कहा कि एनसीपी अध्यक्ष शरद पवार ने प्रफुल्ल पटेल और सांसद सुप्रिया सुले को पार्टी का कार्यकारी अध्यक्ष बनाकर साफ संकेत दे दिया है कि पार्टी पर वर्चस्व की लड़ाई में उनके भतीजे अजीत पवार पिछड़ गये हैं। पहले से ही माना जा रहा था कि पवार की राजनीतिक विरासत को उनके परिवार का ही कोई व्यक्ति संभालेगा लेकिन वह व्यक्ति अजित होंगे या सुप्रिया, इसको लेकर अटकलें थीं। सुप्रिया को कमान सौंपने के लिए पवार ने रणनीति बनाकर काम किया। उन्होंने पहले अध्यक्ष पद से इस्तीफे का ऐलान किया, जिसके चलते पूरी पार्टी उनके नेतृत्व में एकजुट हो गयी और सही समय आने पर उन्होंने बेटी को आगे बढ़ा ही दिया।

शरद पवार को राजनीति का माहिर आदमी माना जाता है और उन्होंने एक बार फिर से इसे सिद्ध कर दिया है। प्रभासाक्षी संपादक ने इस बात को भी स्वीकार किया कि कहीं ना कहीं अजित पवार के पास महाराष्ट्र में बड़ी जिम्मेदारी है। लेकिन यह देखना भी दिलचस्प होगा कि अब उनका आगे का रुख कैसा रहता है। 

विपक्षी एकता सिर्फ फोटो सेशन

इसके अलावा, प्रभासाक्षी संपादक ने कहा कि बिहार के सीएम नीतीश कुमार भ्रष्टाचार से लड़ने की बजाय विपक्षी एकता पर ज्यादा जोर दे रहे हैं इसीलिए उनके राज्य में पुल तो भरभरा कर गिर ही रहे हैं साथ ही बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में नीतीश कुमार ने अब तक जो साख कमाई थी वह भी गिर गयी है। पटना में विपक्षी दलों की बैठक पर प्रभासाक्षी के संपादक ने साफ तौर पर कहा है कि यह फोटो खिंचवाने से ज्यादा कुछ भी नहीं है। भले ही नेता एक मंच पर जरूर आ जाए लेकिन क्या वे आगे एकजुट रहेंगे, इसकी संभावना बेहद कम दिखाई दे रहे हैं। सवाल यह भी है कि कांग्रेस को बिहार में लड़ने के लिए जदयू और राजद के नेता कितनी सीटें देंगे? क्या कांग्रेस इतनी सीटों पर मान जाएगी? डीएमके जो विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को सिर्फ 5 सीटें ही तमिलनाडु में दे रही थी, क्या लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को ज्यादा सीटें देगी? ऐसे तमाम सवाल हैं जिनका जवाब निकालने की आवश्यकता होगी और शायद यह वही सवाल है जिसकी वजह से विपक्षी एकजुटता दिखाई नहीं देगी। उन्होंने कहा कि जिस तरीके से बंगाल में तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस आमने-सामने है, उससे कहीं ना कहीं विपक्षी एकता की वर्तमान स्थिति साफ तौर पर दिखाई देती है।

- अंकित सिंह

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