By अभिनय आकाश | Aug 14, 2026
4 जून 1947... दिल्ली के गर्म कमरों में जब लॉर्ड माउंटबेटन ने 15 अगस्त की तारीख का ऐलान किया, तो मुल्क की सांसें थम गईं। दो सौ सालों की गुलामी की जंजीरें टूटने वाली थीं, सियासत के गलियारों में जश्न की तैयारियां शुरू हो चुकी थीं। लेकिन ठीक उसी वक्त, पूरे हिंदुस्तान के ज्योतिषी पंचांग के पन्नों में सिर झुकाए एक गहरा सन्नाटा महसूस कर रहे थे। लैरी कॉलिन्स और डोमिनिक लापिएर की किताब फ्रीडम एट मिडनाइट के पन्नों को पलटें तो एक चौंकाने वाली हकीकत सामने आती है। जिस दिन भारत अपनी आजादी की सांस लेने वाला था, ज्योतिष की गणनाओं में वो पल किसी नए राष्ट्र की पैदाइश के लिए बेहद मनहूस माना गया था। यह कहानी है सियासत की जिद, कैलेंडर की तारीख और सितारों के उस टकराव की, जिसने 15 अगस्त की उस रात को हमेशा के लिए इतिहास के पन्नों में अमर कर दिया।
हालांकि, तब तक 15 अगस्त की तारीख बदलना व्यावहारिक नहीं था। माउंटबेटन इसकी घोषणा पहले ही कर चुके थे और सत्ता के हस्तांतरण की तैयारियां चल रही थीं। उस दौर की बातों के अनुसार, इसका समाधान उसी तारीख के भीतर एक शुभ मुहूर्त या सही समय ढूंढना था। इंडिया टुडे की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि कैसे चर्चा अभिजीत मुहूर्त की ओर बढ़ी, जिसका ज़िक्र ज्योतिषी केएन राव ने अपनी किताब द नेहरू डायनेस्टी: एस्ट्रो-पॉलिटिकल पोर्ट्रेट्स ऑफ़ नेहरू, इंदिरा, संजय एंड राजीव में किया है। राव के बताए कारणों में एक पुष्य नक्षत्र भी था, जिसे पारंपरिक रूप से किसी भी महत्वपूर्ण काम की शुरुआत के लिए शुभ माना जाता है। इसलिए चर्चा इस बात से हटकर कि क्या 15 अगस्त की तारीख छोड़ दी जाए, इस बात पर केंद्रित हो गई कि क्या भारत की आज़ादी का सही समय हिंदू कैलेंडर के अनुसार ज़्यादा शुभ माना जाने वाला समय चुना जा सकता है।
माउंटबेटन के पास 15 अगस्त चुनने की अपनी वजह थी। फ्रीडम एट मिडनाइट में उनके हवाले से बताया गया है कि यह तारीख उन्होंने इसलिए चुनी क्योंकि वे चाहते थे कि सत्ता का हस्तांतरण जल्द हो। उन्होंने आखिरकार 15 अगस्त को चुना क्योंकि यह दूसरे विश्व युद्ध में जापान के आत्मसमर्पण की दूसरी सालगिरह थी। तारीख पहले ही तय हो चुकी थी, इसलिए भारतीय नेताओं को उसी के हिसाब से काम करना पड़ा, न कि उसे बदलना पड़ा। रिपोर्ट्स के मुताबिक, नेहरू एक दिलचस्प समझौते पर पहुँचे। संविधान सभा की बैठक 14 अगस्त की दोपहर को होनी थी और यह आधी रात तक चलनी थी। राव लिखते हैं नेहरू को एक दिलचस्प समझौता सूझा। उन्होंने 14 अगस्त की दोपहर को संविधान सभा की बैठक बुलाई और इसे आधी रात तक जारी रखा, जब पश्चिमी रीति-रिवाजों के अनुसार 15 अगस्त की शुरुआत हुई और ज़ीरो आवर (मध्यरात्रि का समय) हिंदू कैलेंडर के अनुसार शुभ समय के दायरे में आया।
इस व्यवस्था का मतलब था कि 15 अगस्त ही भारत का स्वतंत्रता दिवस बना रहेगा, जबकि सत्ता का वास्तविक हस्तांतरण आधी रात को होगा। 'फ्रीडम एट मिडनाइट' में बताया गया है कि ज्योतिषियों ने आखिरकार 14 अगस्त को अधिक अनुकूल समय माना और माउंटबेटन ने इस समझौते को स्वीकार कर लिया।