Gyan Ganga: वीर अंगद को फ्री हैंड देकर लंका क्यों भेजा था भगवान श्रीराम ने?

By सुखी भारती | Apr 27, 2023

है न बड़े आश्चर्य की बात! श्रीराम जी के विराट हृदय में कैसा अदम्य साहस है। वे लंका पर चढ़ाई करने को, वानरों की सेना तो लाखों-करोड़ों में लेकर आये हैं, लेकिन जब भी वे अपने दूत को लंका भेजने पर आते हैं, तो भेजते किसी अकेले वानर को ही हैं। इससे पूर्व श्रीहनुमान जी को भी अकेले ही भेजा था, और अब वीर अंगद को भी अकेले ही भेज रहे हैं। उस पर भी एक और आश्चर्य है। वह कि श्रीहनुमान जी को तो श्रीराम जी ने समझा बुझा कर भेजा था। कहा था, कि हे हनुमान! जाकर श्रीसीता जी को मेरे बल व विरह का वर्णन करना। लेकिन यहाँ वीर अंगद को तो, प्रभु पूर्णतः ‘फ्री हैंड’ करके भेज रहे हैं। प्रभु श्रीराम वीर अंगद को कहते हैं, कि हे अंगद, तुम्हें मैं भला क्या समझाऊँ? तुम तो पहले ही इतने समझदार हो, मुझे कुछ समझाने की आवश्यक्ता ही नहीं। मैं जानता हूँ, कि तुम परम चतुर हो। जाओ, और शत्रु से वही बातचीत करना, जिससे हमारा काम हो, और उसका कल्याण हो-

परम चतुर मैं जानत अहऊँ।।

काजु हमार तासु हित होई।

रिपु सन करेहु बतकही सोई।।’

ऐसे में वीर अंगद के स्थान पर हम होते, तो अवश्य ही मन में यह भावना आने की संभावना रहती, कि अब तो श्रीराम जी ने मुझे अपने कुछ वचनों में भी नहीं बाँधा। तो क्यों न मैं कुछ ऐसा विलक्षण व महान करूँ, जो कि श्रीहनुमान जी भी न कर पाये हों। फिर देखना, प्रत्येक जिह्वा पर श्रीहनुमान जी का नाम नहीं, अपितु मेरी ही महिमा होगी। निश्चित ही हम स्वयं की तुलना, श्रीहनुमान जी से करने लगते। मन में अहंकार व प्रतिसर्पधा का विष उबलने लगता। लेकिन कितना आश्चर्य है, कि वीर अंगद के मन में ऐसा कुछ भी विचार नहीं आया। और वे बड़े विनम्र भाव से प्रभु के श्रीचरणों में सीस रखते हुए कहते हैं-

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‘प्रभु अग्या धरि सीस चरन बंदि अंगद उठेउ।

सोइ गुन सागर ईस राम कृपा जा कर करहु।।’

अर्थात हे प्रभु! आप जिस पर अपनी कृपा करें, वही गुणों का सागर हो जाता है।

वीर अंगद लंका में जाने के लिए पूर्णतः तैयार हैं। निःसंदेह वे स्वभाव से ही निर्भीक हैं। और उन्हें रावण से भेंट करने में भय होना भी नहीं चाहिए। वीर अंगद को यहाँ एक मनोविज्ञानिक लाभ भी प्राप्त है। वह यह, कि वीर अंगद जिस प्राणी को मिलने जा रहे हैं, उसे उनके पिता ने एक बार छह बार, अपनी कांख में दबाकर विश्व भ्रमण कराया था। ऐसे में वीर अंगद के मन में यह सकारात्मक मनोवैज्ञानिक भाव सहज ही था, कि हम तो उस व्यक्ति को मिलने जा रहे हैं, जिसका हमारे पिताश्री ने ऐसा जुलूस निकाला था। लेकिन वीर अंगद की विनम्रता देखिए। वे मन में ऐसा भाव लेकर चलते ही नहीं, कि मुझे मेरे पिता के बल पर, रावण पर प्रभुत्व पाना है। अपितु वे एक मुख्य कार्य करते हैं। वह यह, कि वे अपने हृदय में, प्रभु की प्रभुता को ही धारण करते हैं। उन्हें लगता है, कि वे लंका जैसी विकट स्थली पर भी कहीं अकेले नहीं हैं। प्रभु श्रीराम तो सर्वत्र हैं। वे अयोध्या में हैं, तो लंका के कण-कण में भी हैं। मैं न तो यहाँ अकेला हूँ, और न ही लंका में प्रभु की छत्र छाया से विहीन होऊँगा। ऐसा सोच कर वीर अंगद जी ने एक और महान कार्य किया। वे जब चलने लगे, तो प्रभु के साथ-साथ अपने साथीयों को प्रणाम करके चलते हैं। मानों कह रहे हों, कि साथियों! ऐसा नहीं कि मुझे आज प्रभु लंका भेज रहे हैं, तो मैं कुछ विशेष हूँ। मैं आप ही में से एक हूँ। बल्कि मैं तो यह कहना चाह रहा हूँ, कि आप मुझसे भी कहीं श्रेष्ठ हैं। यह तो प्रभु ने मुझे आज्ञा दी, तो आज मैं जा रहा हूँ, और कल आप को आज्ञा होगी, ता कल आप भी होंगे-

‘बंदि चरन उर धरि प्रभुताई।

अंगद चलेउ सबहि सिरु नाई।।

प्रभु प्रताप उर सहज असंका।

रन बाँकुरा बालिसुत बंका।।’

वीर अंगद लंका में जैसे ही अपने चरण रखते हैं, तो कदम रखते ही एक ऐसा बडे़ वाला धमाका कर देते हैं। जिसकी गूँज रावण के कानों तक भी पहुँचती है। पूरी लंका में हाहाकार मच जाती है। क्या था वह धमाका? जानेंगे अगले अंक में---(क्रमशः)---जय श्रीराम।

-सुखी भारती

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