भविष्य संकट में है...पश्चिम बंगाल चुनाव के नतीजों से बांग्लादेश के मीडिया में क्यों मची खलबली?

By अभिनय आकाश | May 04, 2026

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने बांग्लादेश की सीमा से लगे कई जिलों में शानदार जीत हासिल की है। यह परिणाम राज्य में आई भाजपा की व्यापक लहर का हिस्सा है, लेकिन इसमें 'बांग्लादेश फैक्टर' की भी भूमिका रही है। बांग्लादेश में हफ्तों तक चली हिंसक घटनाओं के बाद शेख हसीना की सत्ता से बेदखल होने के बाद, इस्लामी ताकतों ने देश पर कब्जा कर लिया और मुहम्मद यूनुस के 18 महीने के शासनकाल में हिंदुओं और अन्य अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा का सिलसिला जारी रहा। पर्यवेक्षकों का कहना है कि इस्लामी अभियान के सीमा पार पश्चिम बंगाल में फैलने की आशंकाओं ने हिंदुओं को एक चुनावी गुट के रूप में एकजुट होने में मदद की। पश्चिम बंगाल में हिंदू कभी भी एक गुट के रूप में मतदान नहीं करते आए हैं, लेकिन पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश पर ध्यान केंद्रित करने वाले लेखक और राजनीतिक विश्लेषक दीप हल्दर के अनुसार, भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) इस बार उन्हें एक गुट में बदलने में कामयाब रहे हैं।पश्चिम बंगाल में हो रहे घटनाक्रम पर बांग्लादेश में बारीकी से नज़र रखी जा रही है, जहां मीडिया संस्थान मतगणना प्रक्रिया को व्यापक कवरेज दे रहे हैं। बांग्लादेश के प्रमुख प्रकाशन ढाका ट्रिब्यून ने बताया कि पश्चिम बंगाल विधानसभा (293 सीटें) सहित पांच राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में हुए चुनावों के लिए मतगणना जारी है। रिपोर्ट में कहा गया है कि इन चुनावों के नतीजे जिनमें देशभर की कुल 823 सीटें शामिल हैं। भारत के राजनीतिक परिदृश्य पर महत्वपूर्ण प्रभाव डाल सकते हैं। बांग्लादेश के स्थानीय अखबार, प्रथम आलो में एक विश्लेषणात्मक लेख प्रकाशित किया गया है जिसका शीर्षक है- पश्चिम बंगाल चुनाव: सिर्फ राज्य का नहीं बल्कि भारतीय गणतंत्र का भविष्य भी संकट में है।

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बंगाल के चुनावी घमासान और उस पर उठते सवालों की आंच अब पड़ोसी मुल्क बांग्लादेश के मीडिया तक भी पहुंच गई है। 'द डेली स्टार' में छपे एक हालिया लेख ने भारतीय चुनाव आयोग की मौजूदा कार्यप्रणाली को सीधे कटघरे में खड़ा कर दिया है। अखबार का मानना है कि भारत के चुनाव आयोग का जो एक गौरवशाली और निष्पक्ष इतिहास रहा है, वह अब कहीं धुंधला पड़ गया है। लेख में मुख्य रूप से मतदाता सूची संशोधन की 'SIR' (स्पेशल इंटेंसिव रिव्यू) प्रक्रिया की आलोचना की गई है। इसमें कहा गया है कि कागज़ों पर यह नीति कितनी भी दुरुस्त क्यों न हो, लेकिन बंगाल में इसके क्रियान्वयन के तरीके ने भारी तादाद में वोटरों को सिर्फ और सिर्फ निराश और क्षुब्ध करने का काम किया है। 

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बांग्लादेशी अखबार ने अपनी रिपोर्ट में बीजेपी के 'मुस्लिम नैरेटिव' पर भी तीखे सवाल उठाए हैं। लेख में बीजेपी नेता शुभेंदु अधिकारी के उन बयानों का ज़िक्र है, जिनमें अक्सर दावा किया जाता है कि बंगाल में करीब एक करोड़ बांग्लादेशी मुसलमान और रोहिंग्या रह रहे हैं। 'द डेली स्टार' ने इस दावे की तार्किकता पर सवाल उठाते हुए पूछा है कि इतनी बड़ी आबादी आखिर राज्य में है कहां? सबसे बड़ा सवाल यह कि कोई घुसपैठिया ऐसे राज्य में क्यों पनाह लेगा, जहां से खुद स्थानीय लोग रोज़गार की तलाश में पलायन कर रहे हों? अखबार ने तंज कसते हुए कहा कि प्रधानमंत्री मोदी के भाषणों और इतनी लंबी-चौड़ी चुनावी कवायद के बावजूद, चुनाव आयोग ज़मीन पर एक भी तथाकथित घुसपैठिए की पहचान नहीं कर सका है। हालांकि, अखबार का नज़रिया पूरी तरह से एकतरफा नहीं है; उसने सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस (TMC) को भी आड़े हाथों लिया है। लेख में साफ़ तौर पर कहा गया है कि टीएमसी का अपना दामन भी दागदार है, और पार्टी लगातार 'सिंडिकेट राज' (वसूली), बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार और गहरी राजनीतिक साज़िशों जैसे गंभीर आरोपों से घिरी हुई है।

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