Jan Gan Man: भारत के पड़ोसी देश अचानक से China की धुन पर क्यों नाचने लगते हैं? Maldives के भारत विरोधी रुख का असली कारण क्या है?

By नीरज कुमार दुबे | Jan 10, 2024

भारत और मालदीव के राजनयिक रिश्ते इस समय तनावपूर्ण दौर से गुजर रहे हैं लेकिन देखा जाये तो मौजूदा स्थिति कोई अचानक से पैदा नहीं हुई है, बल्कि यह वहां विदेशी ताकतों की ओर से लंबे समय से भड़काई जा रही भारत विरोधी भावना का परिणाम है। कोविड महामारी के बाद के मालदीव के राजनीतिक परिदृश्य पर गौर करें तो देखने को मिलता है कि विपक्ष के भारत-विरोधी अभियान तेजी से आक्रामक हुए। वर्तमान राष्ट्रपति जब विपक्ष में थे तब उनके नेतृत्व में विपक्ष ने न केवल भारतीय सेना को हटाने की मांग की थी बल्कि भारत से सांस्कृतिक और सामाजिक दूरी बनाने पर भी जोर दिया था। देखा जाये तो मालदीव में पिछली एमडीपी सरकार भारत समर्थक थी, लेकिन कोविड काल के दौरान जो विपक्षी राजनीति तेज हुई, वह ‘भारत के खिलाफ’ घूमती रही। वर्तमान राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू किस कदर भारत विरोधी हैं इसका उदाहरण तब भी देखने को मिला था जब वह राजधानी माले के मेयर थे। माले में सांस्कृतिक कार्यक्रमों के आयोजन के लिए पार्कों और सामुदायिक केंद्रों तक भारतीयों की पहुंच बहुत आसान थी, लेकिन मालदीव के वर्तमान राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू के माले के मेयर बनने के बाद, यह आसान पहुंच काफी हद तक कम हो गई थी।

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वैसे देखा जाये तो मालदीव के लोग भारत के प्रति मित्रवत हैं और भारतीय संगीत, बॉलीवुड और संस्कृति के बहुत प्रशंसक हैं। लेकिन वहां बहुत गरीबी भी है इसलिए अक्सर भीड़ को कपड़े, भोजन और धन देकर ऐसे विरोध प्रदर्शनों में भाग लेने के लिए राजी किया जाता है। ऐसी कई रिपोर्टें मालदीव से सामने आई हैं जहां कपड़े, भोजन और पैसे की खातिर कुछ लोग पूरे परिवार के साथ भारत विरोधी प्रदर्शनों में शामिल होने के लिए तैयार हो जाते थे। जाहिर है यह पैसा चीन से ही वहां के नेताओं को मिलता था ताकि जनता के बीच भारत विरोधी भावना का प्रसार हो लेकिन इस सबकी परवाह नहीं करते हुए भारत अपने पड़ोसी देश के भले के लिए लगातार काम करता रहा। भारत जानता है कि मालदीव कई मायनों में उस पर निर्भर है इसलिए वह उसकी मदद करता रहेगा।

साथ ही सिर्फ मालदीव ही नहीं, भारत के कई अन्य पड़ोसी देशों को देखेंगे तो वहां भी ऐसा ही रुझान देखने को मिलेगा। नेपाल, श्रीलंका, बांग्लादेश में अक्सर देखने को मिलता है कि वहां कभी भारत समर्थक सरकार बन जाती है तो कभी भारत विरोधी सरकार सत्ता में आ जाती है। दरअसल भारत के पड़ोसी देशों में कई राजनीतिक दलों को चीन की ओर से फंडिंग मिलती है। इस फंडिंग के जरिये वहां भारत विरोधी प्रदर्शन कराये जाते हैं और दुष्प्रचार को हवा दी जाती है। जब वह दल सत्ता में आ जाते हैं तो चीन के इशारों पर भारत के खिलाफ बयानबाजी करने लग जाते हैं या पुराने समझौतों को रद्द करने लग जाते हैं। लेकिन सियासत से हट कर देखेंगे तो यही सामने आता है कि किसी भी पड़ोसी देश की जनता भारत के खिलाफ नहीं है। बल्कि पड़ोसी देशों की जनता यह जानती है कि जब भी जरूरत पड़ी सबसे पहले निस्वार्थ भाव से मदद के लिए भारत ही उनकी मदद के लिए खड़ा हुआ है।

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